बुधवार, 31 दिसंबर 2014

कसमें और वादों का नया साल

    कसमें  और वादों  का  नया साल 

          हर साल कसमें  और वादों की रस्म निभाई जाती है नये साल का स्वागत तो हम कसमों  और वादों  से करते है और अक्सर ही कसमें   टूट जाती है और वादें  भुला दिए जाते है एक नेता की तरह ,देश में यह गुण हर दो पाये वाले प्राणी में पाया जाता है l अपनों से कसम खाता  है और स्वयं से कसम खाकर वादे पर वादे करता है उसका हश्र तो हर कोई जानता है बिरले ही होते है जो  अपनी कसम और वादों  पर खरे उतरते है और अपने आप को धोखा  देकर गये  वर्ष की विदाई और आने वाले साल की अगुवाई करते है l  अपने आप को ही धोखा  देने का काम हर वर्ष करते है और करते रहेंगे ,कसम और वादो को यूँ ही तोड़ते रहेंगे ,जो हमारा जन्म सिद्ध अधिकार है इसको बचपन  से ही जानते है और कर्तव्य मरते दम  तक याद नहीं  आते है l 
                      बांकेलाल जी कहने लगे साल भर का गम भुलाने के लिए पीने  वालो का आंकड़ा लम्बा है और वो ही  बस आज यह आखरी हैं  कि  कसम खाकर इतनी पीते है कि  पीते ही जाते है l हर साल ऐसे ही पी  पी कर  वादो की झड़ी लगाते रहते है l कसम और वादों  की लम्बी उम्र नही रहती है सच्चा कभी इस फेर में पड़ता ही नही है जो जितना झूठा ,मक्कार,आलसी स्वार्थी होगा उतना ही  कसमों  और वादों  के निकट होगा l वह खुद भी जानता है कि मैं  कुछ नही कर सकता पर क्या करें  जाने वाले  साल और आने  वाले साल में यहीं  तो करना है और कर भी क्या सकता है और कोई चारा भी नही  जानता है  वह बेचारा l 


                       वे आगे कहने लगे कसमें   और वादें तो  सिर्फ हाथी दांत की तरह 
दिखाने के लिए होते है साल भर अगले साल के  इंतजार में वही सब कुछ करता है जो नए साल में नही करना  था और उसका आदी   होकर हर साल  यही दोहराता है l होड़ मचती है नए साल में पीने वालों  की   l गाने के बोल  भी है कि  पीने  वाले को पीने  का बहाना चाहिए ……।                     
  बाकेलाल जी कहने लगे कि  संचार क्रांति क्या हुई लोगबाग एक से अधिक संदेश  का आदान प्रदान करने लगे है दिल की दूरी तो बढ़  गई पर इनके कारण कुछ तो कम हुई l दुःख तो  तब  होता है जब रोज मिलने वाला मिलने पर शुभकामनाऍ देने में हिचकिचाता है और ढेर सारे संदेश  भेजकर अपनी  विराट सामाजिकता का परिचय देता  है 
                  सिर्फ और सिर्फ कैलेंडर बदलते है न बदलती है तो सिर्फ आदतें और सोच l  बहती है भावनाऐं  स्वार्थ की कश्ती पर सवार  होकर। नए साल इस तरह  ही  मनाते रहेंगे जिससे न हम बदलेंगे और नहीं  नये साल में कुछ नया होगा ,कसमों  और वादों  को तोड़ने का सिलसिला यूँ ही चलता रहेगा  l  क्योंकि  कसमें तो  होती ही है  तोड़ने  के लिए और वादे  भूलाने के लिए  उपकार फिल्म के गाने  के बोल आज भी सार्थक लगते है --कस्मे वादे प्यार वफा सब बातें हैं बातों का क्या ? 

       

मंगलवार, 18 नवंबर 2014

डायबिटिक की व्यथा कथा [व्यंग्य ]

दिल्ली से प्रकाशित हिंदी दैनिक " प्रजातंत्र लाइव " में आज [18 /11 /14 ]

रेडियो के फिर से अच्छे दिन आने वाले हैं [व्यंग्य ]


            रेडियो के  फिर से  अच्छे दिन आने वाले हैं
[व्यंग्य ]

                सीनियर सिटीजन  का एक समूह नियमित रूप से मॉर्निग वॉक  करने आता है और वॉक  करने के बाद उनकी समूह चर्चा होती  है , न जाने क्यों मुझे  भी बुलाया और एक साथ प्रश्नों  की बौछार कर दी कि  आप  ही बताइये की रेडियो के फिर दिन अच्छे आने वाले हैं  की नहीं  ?मैंने कहा मैं  छोटे मुहँ बड़ी बात कैसे कहूँ और मैंने चुप रहना ही बेहतर समझा क्योंकि  पीढ़ी के अंतर के कारण विचार भिन्नता होना स्वाभाविक था l मैंने उनसे कहा की आप लोग ही बताइये -अब तर्क वितर्क की बौछार होने लगी ---कुल  पांच , सभी सक्रिय  थे  और सब अपने -जोश खरोश के   साथ अपने तेवर दिखाने  के लिए  हौंसले बुलंद थे उनकी विचारशीलता में  तजुर्बा  इठला  रहा था l देख कर लगा कि  आज  युवा विचारों  का कितना खोखला है l उनकी चर्चा की हाईलाइट्स की झलक देखिये ---

प्रथम -    न्यूज़ से ज्यादा विज्ञापन  झेलो ,और विज्ञापन भी ऐसे -ऐसे कि  शर्म आने लगती है परिवार और बच्चों  के   साथ देखने में शर्म और झिझक होने लगी है l इस टेंशन  के साथ  ही रिमोट लेकर न्यूज़ चैनल बदलने  के लिए कितनी मशक्क़त करनी पड़ती है और उसके बाद  कान  आँख और दिमाग खंपाओ और नतीजा सिरदर्द l इससे अच्छा तो रेडियो ..l

द्वितीय - अरे भाई सुनने और देखने में चार अंगुल का अंतर रहता है देखने और सुनने
दोनों का ही  आनंद लेने में बुराई क्या है ? हाँ, पर आपकी बात में दम है रेडियो के बारे
में सोचना ही पड़ेगा ,टीवी चैनलों  ने तो हद ही पार कर दी है और सबको बेचैन कर रखा है l
प्रथम पुनः  बीच में कूद पड़े जैसे संसद में होता है उन्हें रोकते हुए  कहा कि  आप विचार रख चुके है अब सबसे अंत में फिर जो कहना हो कह  सकते हो l
तृतीय - अपन ने तो इसी मगज मारी के  कारण रेडियो पर समाचार  सुनना शुरू कर दिया बढ़िया आनंद आने लगा और फिर जवानी में लौट गए कहीं  भी बैठो और कहीं भी   सुनो न कोई नाराज और अपन  तो अपनी मस्ती  में मस्त l  वापस रेडियो का जमाना तो आएगा  ही  टीवी ने तो टोटल बोर कर दिया l पूजा ,अर्चना ,प्रवचन  ,मिमयाना ,गिगयाना और पुनरावृत्ति के ओव्हर डोज से खतरनाक साइड इफेक्ट होने लगे है l
चतुर्थ - आजकल की पीढ़ी खतरनाक  है गंदे विज्ञापन के बारे में सवाल जवाब ऐसे करती है कि  आप की बोलती बंद हो जाये l  झूठ बोल -बोल  कर  पिंड छुड़ाना पड़ता है अब बुढ़ापे में ये ही  बचा है क्या  ? इसी चक्कर में फेस बुक के आदी  हो गये ,इससे समय मिलें  तो रेडियो सुनना ही अच्छा, नहीं  तो fb ही अच्छी l
पंचम - आप सब की बातों  से मैं  सहमत हूँ चैनल वाले कमाई के चक्कर में क्या -क्या
परोस रहे है भगवान ही मालिक है और ऐसा लगता है की देश को ये ही चला रहे है सीट के बँटवारे से लेकर मंत्री मंडल के गठन तक तर्क ,वितर्क और कुतर्क से सतर्क
करते रहते है दिमाग पर जर्क पर जर्क देते रहते  है उनके मन और उनके चैनल की विचार धारा  के अनुकूल उत्तर पाने के लिए कितनी जद्दोजहद करते है सब मौलिकता को खत्म कर दते है l अब उकता  गए है ये अपने फायदे के लिए ,समाज और देश दोनों को हानि  ही पहुँचाते है l रेडियो के फिर से अच्छे दिन क्यों नही आयेंगे ?एक दूसरे को टेली करने में लगे है विजन तो कब का ही मर चुका है l
प्रथम - निष्पक्षता के बड़े -बड़े दावे करते हैं  और आजकल तो  मीडिया वाले अपनी दुकानदारी चलाने के लिए नई नई भूमिका निभाने की प्रतियोगिता में लगे हुए है
निष्पक्षता  तो  पहले से ही संदिग्ध  लगती है अब तो सेल्फ़ी के दौर में सेल्फ़ी लेकर
चौथे स्तम्भ को कमजोर करने में लगे है l देश की चिंता के बजाय अपनी छवि को चमकाने में लगे  है सेल्फ़ी की खुमारी इस तरह बढ़  गई है  हर कोई इसका दीवाना हो रहा है और सब न्यूज़ चैनल वाले  झिलाने में कसर  नही छोड़ रहे है l   वह दिन दूर नहीं  रेडियो की ईमानदारी की छवि में चार चाँद लगेंगे l
  मैंने यह कहकर विदा ली कि आप  सभी  वृद्धजनों  का आभार , ज्ञान की अमृत वर्षा कर मेरे भी चक्षु खोल दिए अब मैं  भी अपना कीमती समय बचाऊंगा और रेडियो से नाता जोड़कर सरदर्द और रिमोट के लिए घरवाली और बच्चों  से होने वाली किट -किट से मुक्ति पाऊंगा l   और मेरे  उपेक्षित पड़े  रेडियो के भी  फिर अच्छे दिन आयेंगे l            


रविवार, 26 अक्तूबर 2014

जहां दिखा फायदा वहां छोड़ा कायदा [व्यंग्य ]

जहां दिखा फायदा वहां  छोड़ा  कायदा [व्यंग्य ]
      


      सिंद्धांत ओर नैतिकता पर स्वार्थ किस तरह हावी हो गया है इसे हिंदी साहित्य के महान लेखक प्रेमचंद जी इस तरह  लिख गए है  कि  - विचार और व्यवहार में सामंजस्य का न होना ही धूर्तता है ,मक्कारी  हैं l जहां दिखा फायदा वहां छोड़ा कायदा यह हर काल  में नासूर बनकर अपना प्रभाव दिखाता  आ रहा है वर्तमान काल  भी इससे अछूता नहीं  है और रंग बदलने के लिए सिर्फ गिरगिट का उदाहरण देकर अपने कर्तव्य की इतिश्री करना फैशन सा हो गया है रंग बदलने  की अति से  तो गिरगिट भी शर्मिंदा होने लगे है उन्हें  भी गुस्सा आने लगा है पर नेताओं  को  इसका  कुछ  भी मलाल नहीं  है l  एक प्रेस कांफ्रेंस में गिरगिट समिति  के प्रवक्ता ने  जानकारी देते हुए बताया कि  सिर्फ  रंग बदलने  के गुण  के कारण  हमारी तुलना  पल-पल रंग बदलने  वाले नेताओं  से होने लगी है जो की  गिरगिट   जाति  का  घोर अपमान है और  इसे बहुत सह  लिया है अब और बर्दाश्त  नही करेंगे l यह हमारी प्रजाति की मान हानि है l किसी प्राणी  की भांति जब नेता अपना गुण धर्म बदल सकते है  तो हम क्यों नहीं   ? आगे बताया कि शीघ्र और अतिशीघ्र  एक महा सम्मेलन का आयोजन कर  जो अपने स्वार्थ के खातिर रंग बदल कर हमारी प्रजाति को  रोज -रोज   प्रताड़ित  और  बदनाम कर रहे है   अत: इसके लिए रंग बदलने के संबंध में एक प्रस्ताव पारित कर कड़ाई से पालन करने की शपथ दिलाई जाएगी  और एक उप समिति का गठन  कर सभी पर कड़ी नजर रखी जाएगी कि  गिरगिट प्रजाति रंग न बदल  कर एकता का परिचय देकर नेताऑ को अपनी गलती का अहसास कराये l
   
   यह खबर सुनते ही राजनीति  में हड़कम्प मच गया कि  गिरगिट प्रजाति अगर ऐसा करेगी  तो नेताओं  का अपमान होगा और लोग कहेंगे नेता की तरह रंग बदलता है l पर नेताओं  में एक से एक बुद्धिजीवी   भरे पड़े है  उनमें  एक जो  कि इस कला के सूक्ष्म जानकार थे और जिन्हें  गैंग के  मुखिया की तरह बॉस कहा  जाता था कहने लगे कि यह उनका कॉपी राइट थोड़े ही है ,हम ऐसा  नहीं  करेंगे  तो क्या करेंगे अरे समझो राजनीति  का  यह सिद्धांत है कि जिधर हवा  का रुख हो उसी तरफ चलना तो  ही जल्दी मंजिल तक पहुंचने में आसानी होगी , यही तो  समझदारी है ओर समय का तकाजा भी है l वे कहने लगे जिनको शर्म करना है वो करें  ,हम तो जिस उदेश्य के लिए राजनीति  में आये है उसे  पूरा करेंगे ,हमे लोग क्या कहेंगे का  तनिक  भी अफ़सोस नहीं  होता है ,हम तो  वो है जो जानते है कि "जिसने की  शरम उसके फूटे करम " के ब्रह्म वाक्य का पालन   मजबूती से करना  इस क्षेत्र में जरूरी है और  जहां मिले फायदा वहां छोड़ो क़ायदा तब ही तो टिक पायेंगे  इस प्रतिस्पर्धा के दौर में, अपना उल्लू  सीधा करने में l अपने मुँह मिंया  मिट्ठू बनने में महारथ होना जरूरी है तभी उनके मोबाइल की  घंटी बजी  वे अपना रुतबा दिखाने  के लिए  जोश में आकर कहने लगे ये महाशय अपने आप को राजा हरिश्चंद्र का वंशज  मानते है राजनीति  में सुपर फ्लॉप साबित हुए है ये  राजनीति में बहुत पुराना  पर  बहुत लाचार है दुम हिलाना ,चमचा गिरी से कोसों  दूर है सोचो भला ये  आदमी कैसे आगे बढ़ेगा ? आखिर उनका फोन रिसीव  न करके यह जताने  की  भरपूर कोशिश  की ऐसे लोगों  की  हमें  कोई परवाह नहीं  है l काम होगा तो दस बार लगाएगा l ऐसे तो कई पट्ठे  पाल रखे है l
             मै  यह सब बड़े ही बेबस होकर सुनता रहा मुझे लग रहा था कि पूरा  वातावरण
ही इसकी गिरफ्त  में  है  दिन दूनी रात चौगुनी की गति से बेईमान फल फूल रहे हैं  जहां दिखा फायदा वहां  छोड़ा  कायदा के अनुयायियों   की बड़ी जमात है और वे फूले नहीं  समाते  और ईमानदार बेचारा खडूस की उपाधि पाकर मन मसोस कर अपनी व्यथा के कड़वे घूंट पीने  को मजबूर है l सिद्धांतहीनता की लहर जब चलती है तो सिद्धांत को मानने  वाले भी लहर से प्रभावित तो होते ही है l एक दूसरे की शक्ल से घृणा करने वाले जब एक थाली में खाने लगे एक दूसरे को गले लगाने लगे तो  दिल  और दिमाग एक साथ सक्रिय  होकर कह  उठता है कि  जहां दिखा फायदा वहां छोड़ा कायदाl

वाह रे काला धन [व्यंग्य ]

वाह रे काला धन [व्यंग्य ]


                    
                  रोज -रोज सनसनी फैलाई जाती है कोई कहता है काला धन आयेगा  कोई कहता है  नहीं  आएगा और आम जनता इसके गहन अंधकार से प्रकाश की ओर कब लौटेगी या यूँ ही उल्लू  बनाविंग चलता रहेगा ,सब अपनी -अपनी रोटी सेंकने में व्यस्त है और गरीब तो बेचारा रोटी का इंतजार ही करता रह जाता है एक अर्थशास्त्री इसे मायाजाल बनाम भ्रम जाल कहते है और अपनी पीड़ा को कुछ इस तरह व्यक्त करते  है -धन की अपनी चमक होती है और उसी चमक से प्रभावित इसकी चाहत में लोग धृतराष्ट्र की तरह अंधे हो गए और कुछ ने गांधारी की तरह आँखो पर पट्टी बांध ली है l
                      काले धन के कारण आये दिन राजनीति  में हुद -हुद  आता है और  काले धन का कमाल रोज होता है ये  मीडिया  में छाया  रहता है और बयान वीर अपने आरोप -प्रत्यारोप का दौर चलाते रहते है झेलने की क्षमता ही खत्म हो गई है और जनता अब कहने लगी है कि  विदेश से काला धन वापस आना मुश्किल ही नहीं  नामुमकिन लगने लगा है l
                          अर्थशास्त्री कहने लगे अरे भाई काले धन की चिंता है तो देश में ही
काले धन की अपार सम्भावनायें  छिपी है उस पर दांव लगाने में क्या बुराई है अभी केवल तमिलनाडु की  नेता ही धराई  है ऐसे  लाखों  होंगे l काले धन  के स्वामी में इतनी ताकत है कि इनकी   तरफ देखने की क्या सोचने की  हिम्मत कोई नहीं करता है अपने काले धन  की शक्ति से सब को अपना बना लेता है l वे कहने लगे सपने में आकर काला  धन कहने लगा कि  काला है तो क्या हुआ दिल वाला है जो दिल लगाता है  उसका दिल नहीं  तोड़ता हूँ ,अच्छे -अच्छे के इमान डिगा देता हूँ ,हर क्षेत्र में मेरा ही बोल -बाला है सभी राजनीतिक पार्टियों  और नेताओं  को जान से प्यार हूँ जो जैसा चाहे  उपयोग कर रहा है और मैं मौन होकर  सब  सह  रहा हूँ मेरे भाई सफेद धन के अपमान से मै  आहत होता हूँ क्योकि ज्यादा तर दीवाली पर मेरी  ही पूजा होती  है lमाता के वाहन  उलूक को अंधकार से प्रेम होने से वह  मेरी और ही आकर्षित होता है और अँधेरे  का लाभ  उठाकर मैं  फलता फूलता रहता हूँ l

   मेरा रंग तो हर किसी के साथ बदल जाता है फिर भी काला  ही कहलाता हूँ ,जब जब मेरे चर्चे होते है , मैं भी कैद से बाहर निकल कर दीन दुखियों  के काम आना चाहता हूँ l पर मुझ पर इतने पहरेदार रहते है कि मैं  कुछ नहीं  कर सकता lसंत्री से मंत्री तक ने मुझे जकड़ रखा है l भ्र्ष्टा आचरण से मुक्ति ही मेरी मुक्ति का मार्ग है ,यदि  मुझे ईमानदारी से मुक्त कर दिया जाये तो देश की दशा और दिशा दोनों बदल जाएगी और फिर से  मेरा यह देश सोने की चिड़िया कहलाने लग जाएगा l
               जब नींद खुली तो उनका   सपना टूटा   कहने लगे काले  धन की मन की और बातें   अधूरी  रह गईl  काले धन की महिमा तो अपरम्पार है सुबह फिर से  अख़बार  में वही फिर काले अक्षर में काले धन की  खबर मुख्य खबर बनीं ,यही  काले धन का कमाल है l सिर्फ और सिर्फ खबर ही बनता है वाह रे काले धन--l

हाथ की धुलाई [व्यंग्य ]

हाथ  की धुलाई  [व्यंग्य ]

      मुझसे मेरे पड़ोसी  कहने लगे कि    विश्व हाथ धुलाई   दिवस मनाया गया और  हाथ की सफाई का महत्व समझाया गया l ,इस अभियान के बहाने हाथ  साफ़ करने के लिए कौन सी कम्पनी का हैंडवॉश अच्छा है इसका प्रचार कंपनियों द्वारा किया गया और कौनसा हाथ में छिपे  अदृश्य कीटाणु धो डालने के लिए उपयुक्त है ,कीटाणुओं का   खौफ  बताकर और  इमोशनल ब्लेक मेल कर  हैंड वाश बनाने वाली कंपनियों  ने बहती गंगा में हाथ धोने  की लोकोक्ति को चरितार्थ कर अपने -अपने हैंड वाश से  हाथ धोने के महत्व  को प्रतिपादित किया l बच्चों ने  जोश और खरोश से हाथ  धोये   और सोचा कि  अच्छे से हाथ धो लिए जाए फिर  अगले  ही साल मौका आएगा ,अभियान में  फोकट  के हैंडवाश से हाथों को धोने का   मजा कुछ ही  और है  ऐसा उनके हाव -भाव देख कर माना जा सकता था , सरकारी स्कूलों में कई की हालत तो ऐसी है पानी ही नसीब नहीं  है हाथ धोना तो दूर की बात है l  टीवी पर न्यूज़ देख कर  तो ऐसा लग रहा था कि  , जैसे बेचारे बच्चे  हाथ धोना  ही नहीं  जानते है पड़ोसी  हसंते  हुए कहने लगे कि  बहती गंगा में हाथ धोना और हाथ साफ़ करने में ज्यादा ही माहिर है वर्तमान पीढ़ी l

        वे  कहने लगे कि  जिनके हाथ गंदे कारनामों  से सने पड़े है क्या उनके लिए भी  कोई अभियान चलाया जायेगा  ,उनके हाथ और मन का मैल  कब धुलेगा ,ऐसे ही लोगों  ने बहती गंगा में हाथ धोकर गंगा के साथ ही राजनीतिक ,समाज और संस्कृति को इस कदर गंदा कर रखा है कि  कोई भी वाशिंग पावडर काम नहीं  आ रहा है और उलटे केमिकल युक्त होने के कारण प्रदूषण बढ़ाने में सहायक हो रहा है l और ये ही  हैं कि   हर क्षेत्र में हाथ  की सफाई से  हाथ साफ़  कर जाते है हम हाथ मलते ही रह जाते है l
                             मैंने  कहा आप खामख्वाह  क्यों अपनी आत्मा को कष्ट देते रहते है,ऐसा करने वालों  को तो  जरा भी आत्म ग्लानि  नहीं  है   और वे  तो गंदगी से अपने हाथ धोते रहेंगे, और अपने आप को हाथ की सफाई का सरताज मानते रहेंगे जब तक बुद्धिजीवी हाथ पर  हाथ धरे बैठे रहेंगे l जैसे सावन के अंधे को हरा -हरा ही नजर आता है ,सफाई के अंधों  को सब साफ ही नजर आता है l
     हम लोग   साल में एक बार हाथ धुलाई अभियान मनाकर बच्चों  के संस्कारवान बनाने का भरसक प्रयास करते रहेगें और हम मन के सच्चे बच्चों   के हाथ धुलवाते रहेगें ,किसी भी अभियान  की जान और शान होते है बच्चें  और रस्म भी ईमानदारी से निभाते है l लेकिन    यह यक्ष प्रश्न हमारे सबके सामने हमेशा खड़ा रहेगा कि  जिनके हाथ गंदे कारनामों से   गंदे है उनके हाथ धुलने का एक अभियान कब चलेगा ?

दोस्त दोस्त ना रहा ....[व्यंग्य ]

        दोस्त दोस्त ना रहा ....[व्यंग्य ]
                                                लद गए वो जमाने जब यह  गाना  हिट हुआ करता था कि  ये दोस्ती हम नहीं  तोडेंगे ,तोडेंगे दम मगर तेरा साथ न छोड़ेगे l स्वार्थ  है जहां दोस्ती  नहीं  वहां l स्वार्थ हमारा जन्म सिद्ध अधिकार हो गया हैl स्वहित की भावना  के सर्वोपरि चलते  दोस्ती कभी -कभी बेमानी सी लगने लगती है l न काहू से दोस्ती न काहू से बैर भी एक लोकोक्ति है पर राजनीति के धरात्तल पर सटीक नही बैठती  रोज नए समीकरणों से रोज नए दोस्त को पकड़ना और छोड़ना आदत सी हो गई है कई बार मजबूरी में बेमेल दोस्ती का बोझ ढोना पड़ता है l
      मेरा एक  दोस्त  कहने  लगा  कि  'मेरे दोस्त पिक्चर अभी बाकी है'.. आने वाली है लेकिन आज के दुश्मन कल के दोस्त और आज के दोस्त कल के दुश्मन बनने में वक्त कहाँ लगता है मेरा एक लगोंटिया दोस्त  है , गहरे  मित्र के लिए एक कहावत  प्रचलित है" एक दाँत से रोटी तोड़ने वाले " हम थे  पर जब से मैं मोहल्ले की एक सामाजिक और धार्मिक संस्था का सचिव क्या बन गया वह मेरा क़टटर दुश्मन हो गया हर बात काटना और मेरे बारे में लोगों  को उल्टा -सीधा बकने लगा ,जबकि उस संस्था से मुझे आर्थिक लाभ क्या  बल्कि जेब हल्की करनी पड़ती थी, मौके -मौके पर l और  हंसकर  बोला   फोकट में ये  हाल   है अगर  गलती से लाल बत्ती  मिल जाती  तो क्या करता मेरा परम मित्र l   ऐसा दोस्त कहां किसी के पास होता है…कुछ दोस्त पल भर में भुला दिये जाते हैं कुछ दोस्त पल पल याद आते हैंl
     अजीब दाँस्ता है दोस्ती की  अब वह  कहने  लगा पर कलमुंही राजनीति  ने ऐसा प्रभाव छोड़ा  की दोस्ती भी इससे प्रभावित हुए बिना नहीं  रही l कभी -कभी विज्ञान का  सिद्धांत भी फेल हो जाता है और  समान ध्रुवों  में आकषर्ण और असमान ध्रुव  में विकर्षण पैदा हो जाता है यह  केवल राजनीति  मे ही सम्भव है देखो बिहार और महाराष्ट्र में यहीं तो हुआ lमैंने उसे समझाया कि राजनीति तो अपने ऊपर  से जाती है ये सब राजनीति  की बातें  छोड़ो अपने काम से काम रखोऔर उसी में मस्त रहो l
 फिर से  अपना राजनीतिक   ज्ञान बघारते हुए बोला कि  दिन भर न्यूज़ पर राजनीति की चर्चा सुनकर दिमाग तो खराब हो ही जाता है अब यह रोज सहने के आदि हो गए हैं फिर   चिंतित होकर कहने लगा कि क्या होगा  मैंने कहा  वो तो फिर  मिल जायेंगे अपने   स्वार्थ  अनुरूप l अपुन ने तो रेडियो  का रुख किया जबसे तबसे बहुत सुकून में हूँ l इसके दो फायदे  हैं एक तो रिमोट की भीख नहीं मांगनी  पड़ती और दूसरे आँखों और दिमाग दोनों  पर जोर नहीं  पड़ता l वो  कहने लगा कि  निःस्वार्थ दोस्ती तो सुदामा और कृष्ण की थी l वह एक  दोस्ती की मिसाल है l आज के आधुनिकता भरें युग में सच्ची दोस्ती के गुणों को लोग भूल ही गये हैं।दोस्त शब्द दो तत्वों से बना  है, एक सच्चाई और दूसरा कोमलता।पर आजकल दोनों ही गायब है जैसे घोड़े के सर से  सींग  l जैसे किसी ने सही ही तो  कहा  है सबसे कमज़ोर आदमी वह है जो अपने लिए दोस्त न खोज पाए और उससे भी कमज़ोर आदमी वह है जो अपने दोस्तों को खो दे। फिर इस गाने के बोल सच लगते है ---दोस्त दोस्त ना रहा .. ज़िंदगी हमें तेरा  ऐतबार ना रहा l
   मैने  कहा कि  आप जैसे मित्र  ही हमारे जीवन में बने रहें  और समय -समय पर दोस्ती का रसपान कराते  रहे l .

चायना का चटका [व्यंग्य ]

    चायना का चटका   [व्यंग्य ]



      हमारे मल्टीकलर कल्चर में चायना ने मारी एंट्री और   सबके दिल में बजने लगी चायनीज खाने की घंटिया l बच्चों  से लेकर बड़े  सभी दीवाने चायनीज फ़ूड के l इसकी  बढ़ती लोकप्रियता को देखते हुए मैंने इसकी तह  तक जाने का  मन बनाया आखिर इसमें ऐसा क्या है ?यह तो मानना पड़ेगा की चायना बेसिक सिंद्धांत पर काम करता है उसने पहले चायनीज फ़ूड के माध्यम से पेट पर कब्जा कर लिया ,कहते है कि  प्यार का रिश्ता तो पेट से होकर  ही जाता है l चायना प्रेम का आलम यह  है कि खिलौनों  से लेकर हर प्रकार के  सामान से बाजार  पटा पड़ा है सस्ता तो है पर टिकाऊ नहीं  है सब चलता है क्योंकि  हम यूज एन थ्रो की संस्कृति के इतने मुरीद हो गए है तथा इसका प्रभाव मानवीय रिश्तों  को भी तार -तार कर रहा है रिश्ते भी चायना के सामान की तरह कब तक चले कोई ग्यारंटी नहीं  l सस्ता रोये बार बार महंगा रोये एक बार को इस तरह परिवर्तित कर दिया कि सस्ता लाओ उपयोग करो और फेंक  दो और खुश रहो l

                              
      मैंने  चायनीज फ़ूड की प्रेमी एक आधुनिका से पूछा कि  चायनीज  फ़ूड खाने वालों  की संख्या निरंतर बढ़  रही है और और पूरे भारत में इसको चटकारे लेकर  लोगबाग सूत रहे हैं  और भारतीय व्यंजन को चिढ़ा रहे है l आपका क्या कहना है इस बारे में तो  वे कहने लगी देखिये  चायनीज फूड की कुछ विशेषता है जैसे
 ऑइली , स्पाइसी कम होते  है जिससे हेल्थ कॉन्शियस  लोग खाने लगे है ,बनाने में आसान ,खाने में हाथ गंदे नही होते ,बच्चे भी आसानी से खा लेते है और भारतीय खाने
के मुकाबले  में कम समय  ,कम लागत और कम मेहनत लगती है  तो क्यों न खाए
चायनीज फ़ूड l मैंने कहा  मेडम जी आप जैसे लोगों  के चोचलों  के कारण ही यह सब हो रहा है l तो वे कहने लगी मैं  समझी नहीं  l मैंने  कहा मुझे जो समझ में आया वह यह है कि सिर्फ आलस्य की अधिकता और समय की मार ने हमें  इसका आदी  बना दिया है l
        हेल्थ कॉन्शियस शब्द ने मेरे दिमाग को इतना  झकझोर  दिया कि  चायनीज खाने के गुण और अवगुण का पता लगाने निकल पड़ा स्वास्थ्य की दृष्टि  से मैंने  एक आहार विशेषज्ञ  से सम्पर्क किया ये ढेरों  मिलते है l अपनी समस्या बताकर उनका पक्ष जाना उनके अनुसार अगर सही तरीके से  इसे बनाया जाय तो ठीक है अन्यथा  आवश्यक अवयवों  के असमान मिश्रण से ये चायनीज फ़ूड कई बीमारियों  को जन्म देते है  कुछ होटल वाले स्वाद  बढ़ाने  के चक्कर में  जरूरत से अधिक तत्व  मिक्स  कर देते है  खाने वाले को संपट  नही पड़ती ,ऊँची दुकान और फीके पकवान   होते है परिणाम दिमाग में  डैमेज  ,हार्ड डीसिस ,मोटापे और  शारीरिक  असंतुलन का खतरा भी  रहता है l पर  ये दिल है कि  मानता ही नहीं  है l कहते है न कि  आधा अधूरा  ज्ञान ही विनाश का कारण बनता है परिणाम आने में समय तो लगता है देर सबेर कभी  तो नींद खुलेगी l मैंने कहा कि  नकल में भी अकल  लगानी पड़ती है l
            हमारे भारतीय व्यंजनों की क्या  कोई कमी है ?फिर भी चायना  का चटका जोरों  पर है l यह हमारी विडंबना  है कि  इडली डोसा ,खम्मन ढोकला ,छोला पूरी ,बडा पाव  ,दाल बाटी कुछ विशेष क्षेत्र तक ही इनकी सीमायें  है l देशी खाना देख कर नाक भौं  सिकोड़ने वालों  को चायनीज फ़ूड  देख कर  मुहं में पानी आने  लगता है l नूडल्स,हाका नूडल्स,चाउमिन ,मंचूरियन और मोमोज़ का नशा   चायना से चलकर पूरे  देश के लोगों  के दिलों और दिमाग पर चढ़कर बोलने लगा  है जैसे घर की खांड किरकिरी  लगे और बाहर  का गुड़ मीठा l
          हम विदेशी संस्कृति पर इस कदर फ़िदा है कि  खान पान ,रहन सहन को अपनाने  की प्रति इतनी शीघ्रता  दिखाते है कि  बाकि सब  गौण कर देते है lविदेशी शासन से मुक्त होने के बाद भी हम आज भी मानसिक गुलामी से मुक्त नही हुए है l आँखों पर पड़ा पर्दा  हटाना बहुत जरूरी है पूरी दाल ही काली हो गई है l

                    चायना का चटका यह सब सोचने को मजबूर करता है कि   हमारे बाजार में चायना सामान की , दावतों में चायनीज  फ़ूड के साथ ही सीमा पर  भी घुसपैठ
करने की कला में  चायना सिद्ध हस्त है l मुझे विचलित देखकर मेरी पत्नी ने गीता का ज्ञान झाड़ते हुए कहा कि   " क्यों व्यर्थ चिंता  करते हो  "हम किसी से कम नहीं  ,हमारे  व्यंजनों और हमारी संस्कृति को मिटा दें  , ऐसा किसी में दम  नहीं l

हौले -हौले से झाड़ू चलती है ...... [व्यंग्य ]

हौले   -हौले से  झाड़ू चलती है ...... [व्यंग्य ]
      
                  जब  किसी सफाई अभियान में झाड़ू लगायी  जाती है  तो  झाड़ू हौले -हौले  से  चलती  दिखती है .झाड़ू लगाने वाले के चेहरे पर विजयी  मुस्कान के साथ ही उनके हाथ में विशेष प्रकार की झाड़ू होती है लगाने वालों का पूरा ध्यान कैमरों की और होता है l घर की सफाई तो बिना नहाये व पुराने कपड़े पहन  कर की जाने की परम्परा है लेकिन अभियान तो  प्रेस किये कपड़े ,पॉलिश किये हुए जूते विशेष प्रकार की खुशबू वाले  .परफ्यूम. से महकता रहता है क्योकि यह तो सांकेतिक अभियान है सफाई तो वो ही करेंगे जिन्हे करना है l इस अभियान से देश और जनता में जागरूकता आयी लेकिन  जिन्होंने अपनी नौकरी के अंतिम पड़ाव तक कभी अपनी टेबल पर भी कपड़ा न  मारा हो उनके हाथो में झाड़ू देखकर अधिनस्थ  कर्मचारी  मन ही मन सोचते होंगे कि  अब आया ऊंट पहाड़ के नीचे l
   कुछ दृश्य ऐसे भी थे जिनमें  एक झाड़ू पकड़े हुए को चार पांच लोग घेरे हुए थे यह सीन ऐसा लग रहा था जैसे  मानो बेट्समेन को चार - पांच फील्डर घेरे हुए है l कुछ  सीन तो साफ करे हुए को साफ़ करने का अभिनय कर रहे थे l  ऐसा लग रहा था कि  केवल औपचारिकतावश मजबूरी में निभा रहे है
               सफाई करने वाले  साहबों के हाथ में  झाड़ू देख कर हर कोई अभिभूत थे ऐसे में एक महाशय कहने लगे चलो कुछ तो समझ आयेगा कि  खाली पिली सफाई -सफाई का खौफ पैदा करने से कुछ नहीं  होता है  बंद अक्ल का  ताला भी खुलेगा ऐसे ही कदम -कदम मिलाकर  सफाई करने से ही कुछ होगा खाली चिंता से कुछ नही l आज मेरा अरमान पूरा हुआ साहब के हाथों  में झाड़ू देखकर  ,कुछ हो या न हो सफाई  करने पर यह तो समझेंगे की गंदगी नही करना है तो भी आधी  समस्या हल  हो जाएगी l
                       एक नेताजी कहने लगे कि  हमने शपथ ली है की न गंदगी करूंगा
और न करने दूंगा ,मैंने  कहा शपथ लेना तो आसान है पर पालन करना कठिन है सविंधान की शपथ खाकर भी तोड़ने वालों  की कमी नही है   तो इस शपथ का क्या होगा?
नेताजी कहने लगे  देखते हैं  क्या होता है हर क्षेत्र तो गंदगी से पटा पड़ा है लोगों  के दिमाग के जालों  की सफाई की भी जरूरत है केवल शपथ और अभियान से कुछ नहीं होना है जब तक हर आदमी  न सुधरें  l
                         मेडिकल  शॉप वाला कहने लगा कि  बाम की  खपत बड़ गयी जब से ऐसे लोगों ने झाड़ू उठा ली  कुछ की तो  कमर ही  लचक  गई और कुछ को तो शर्म व भय के मारे सरदर्द होने लगा कि कल से क्या होगा कहीं हमें   कमरे और टेबल की सफाई  भी न करना पड़े l
                            कई साहबजादों  की पत्नियां  इस अभियान से अति प्रसन्न  थी
की चलो गुरुर तो टूटा जब ऑफिस और रोड की सफाई की तो घर की  तो आराम से  करवा सकते  है मैंने कहा  कि  पहले न्यूज़ चैनल से बात कर लीजियेगा  सफाई तो तभी कर पायेंगे  क्योकि कैमरा देख कर अच्छे -अच्छों को जोश आ जाता है l वह कहने लगी घर की मुर्गी दाल बराबर होती है अब हमें   रास्ता  तो मिल ही गया है हौले -हौले सब करवा लेंगे l जब बाहर   हौले -हौले झाड़ू चला सकते है तो  घर  पर क्यों नही ?  घर पर हम भी चलवा लेंगे  l हमारे अच्छे दिन की शुरुआत हो गई है इस अभियान से  ऐसा मान सकते है l अभी तक पद का रूतबा दिखा कर कन्नी काटते थे , अब थोड़ी जागृति आयेगी हमें  भी थोड़ी  राहत तो  मिलेगी l  प्राथमिकता  से  घर में भी   सफाई होगी तब ही तो बाहर की कर पाएंगे …। l हौले -हौले झाड़ू चलती रहेगी ...अब न थमेगी अब केवल घिसेगी  और  झाड़ू पर झाड़ू बिकती रहेगी l

ऑन लाइन मजा या सजा [व्यंग्य ]

  ऑन लाइन मजा या सजा [व्यंग्य ]
        
      लाइन ,लकीर और कतार  यूं तो इनका  अर्थ एक ही है  लेकिन जीवन में अलग  -अलग तरह से अपना प्रभाव दिखाती है मनुष्य नाम के प्राणी का  इनसे गहरा सम्बन्ध हैl लाइन तोड़ने और  लाइन मारने का  वरदान तो लगभग सभी को गॉड गिफ्ट होता है भले ही प्रतिशत भिन्न -भिन्न  हो सकता है lनामी -गिरामी ,विख्यात ,प्रख्यात और कुख्यात तो लाइन मारने में  महारथी पर लाइन में लगने को अपनी  तौहीन  समझते है और इससे बचने के लिए  जुगाड़ तंत्र का सहारा लेते हैं  l हाथ की लाइन के सहारे सपने देखने की मानसिकता रखने वाले भरे पड़े है लकीर के फकीर  जो ठहरे l सीता जी के लिए लक्ष्मण द्वारा खींची लाइन तो लांघने का हश्र राम -रावण का युद्ध हुआ l लकीर को पीटना राजनीति का प्रमुख अंग है l आजकल  ऑन लाइन रहना आधुनिकता की निशानी है जो जाल का जंजाल बनता जा रहा है l
           मुझ से लाइन में रहना रे  , यह वाक्य  अक्सर  बचपन  से आज तक  कानों  में गूँजता  है जब भी किसी की किसी से लड़ाई होती है तो  हमेशा  दोनों पक्षों की और से चेतावनी स्वरूप इन शब्दों का प्रयोग दोनों  ही ओर से किया जाता है आज भी बड़े बूढ़े प्रेम के अभिभूत होकर  लाइन में रहने की नसीहत देते रहते है l समय बदला और  जमाना ही ऑन लाइन रहने का  हो गया l ,छोटे से लेकर बड़े तक  सब के सब  ऑन  लाइन रहने लगे है ऑन लाइन  रहने का नशा इस कदर छा  गया है कि  लगने लगा है  इसके  बिना जीवन अधूरा  है नेट के बिना जिंदगी भी नेट लगने लगी है l लाइन  [ब्राड बेंड ] और बे-लाइन दोनों पर ही ऑन लाइन रहने लगे है l
                          ऑन लाइन में मजा और सजा दोनों ही है सुबह सबसे पहले उठकर ईश्वर का ध्यान किया जाना  परम्परा थी कुछ आज भी करते है जो नहीं  करते है वे ऑन लाइन होकर नई परम्परा का निर्वाह करते है l आज हर चीज  ऑन  लाइन उपलब्ध है l पुरानी चीजे भी ऑन लाइन बिकने लगी है नया हो या पुराना ,खाने का हो या पीने का ,ओढ़ने का हो या पहनने  का ओर  तो ओर भगवान से लेकर चन्द्र दर्शन भी ऑन  लाइन होने लगे है l ऑन लाइन शॉपिंग ने तो महिलाओ के प्रिय गुण बार्गेनिंग की बाट ही लगा दी  पर इसका कहर सब्जी वालों  पर बरपने  लगा है l ऑन लाइन इश्क  रिस्क  ही तो है जब रिस्क लेकर   इश्क परवान चढ़ता है बिन मंगनी ब्याह  रचा लेता है तब  हकीकत में  ऑन लाइन रिश्ते की  लाइन गड़बड़ा जाती है l
       ऑन लाइन से परेशान एक समाज सेवी कहने लगे कि भाई लाइन मारने और
फ्लर्ट दोनों ही ऑन लाइन  होने लगा है l यह  तो गनीमत है कि गुरु दक्षिणा  एकलव्य की तरह अंगूठा देने की परम्परा होती तो क्या होता आज ? अंगूठा तो ऑन लाइन पर रहने की जान है l वे चिंतित और विचलित होकर कहने लगे मुझे डर लगता है की कहीं अंतिम संस्कार की प्रक्रिया  भी ऑन लाइन न हो जाए क्योकि समय किसके पास है दुनिया के किसी भी कोने से सम्पन्न किया जा सकेगा lऔर १३ दिन का  काम १३ मिनिट में हो जाया  करेगा l
      वे आगे कहने लगे कि  इस ऑन  लाइन रहने की बीमारी ने कई कम्पनियों  और आफिसों में  आउट पुट को कम किया है इससे कई संस्थानों में इन पर पूर्णतया प्रतिबंध लगाने को मजबूर होना पड़ा l ऑन  लाइन की मनोवृति मनोविकार में बदल गई है फेसबुक ,ट्विटर और वाट्स एप पर लगातार ऑन  लाइन रहने वाले को जब नेटवर्क  नहीं  मिलता है तो यह  बैचेनी ,परेशानी  हताशा का सबब बन जाता  है l जीवन  में उतार चढाव बहुत ज़रूरी हैं l चिकित्सा विज्ञानं में  ईसीजी  के अनुसार एक सीधी  लाइन  मौत की निशानी होती है तो  क्यों न हम लाइन तोड़ने और लाइन मारने वाली  जैसी ज़िग -ज़ैग भरी जिंदगी जिए और जीने दें  l
                                 
    होड़ लगी है ऑन लाइन की कोई ले रहा मजा तो कोई पा  रहा है सजा l सरकारी  साइट्स की  लाइन का हमेशा व्यस्त रहना सर्वर नाट  फाउंड का  ऑप्शन भी ऑन लाइन रहता है घंटो की मशक्क़त  के बाद भी जीरो बटे सन्नाटा ही नजर आता है lएक प्रसिद्ध लोकोक्ति है नादान की दोस्ती ने  जीव का जंजाल यह पूरी तरह ऑन लाइन
रहने वाले नादानों के लिए सटीक बैठती है l

गुरुवार, 2 अक्तूबर 2014

बहस रावण दहन पर [व्यंग्य ]

बहस रावण दहन पर [व्यंग्य ]---हैदराबाद से प्रकाशित डेली हिंदी मिलाप में प्रकाशित मेरा व्यंग्य [02/10/14]

शुक्रवार, 26 सितंबर 2014

मंगल पर दंगल का अखाड़ा

आज दिनांक 26.09. 14 जनवाणी [उत्तरप्रदेश व उत्तराखंड के प्रमुख समाचार पत्र ]में प्रकाशित-

सोमवार, 8 सितंबर 2014

फू और थू की संस्कृति


"""
फू और थू की संस्कृति """[व्यंग्य ]कल्पतरु एक्सप्रेस --में प्रकाशित दिनाक 09 /09/14 [उत्तर प्रदेश केप्रमुख शहरों ----मथुरा ,लखनऊ ,कानपुर ,आगरा से प्रकाशित दैनिक] —

शुक्रवार, 5 सितंबर 2014

"शिक्षक ही तो राष्ट्र निर्माता है

"शिक्षक ही तो राष्ट्र निर्माता है["व्यंग्य ]कल्पतरु एक्सप्रेस --में प्रकाशित दिनाक 05 /09/14 [उत्तर प्रदेश केप्रमुख शहरों ----मथुरा ,लखनऊ ,कानपुर ,आगरा से प्रकाशित दैनिक] —

सोमवार, 1 सितंबर 2014

सावधान ! मैं किताब लिख रहा हूँ [व्यंग्य]

जनसंदेश टाइम्स--में प्रकाशित दिनाक 02/09/14 [उत्तर प्रदेश केप्रमुख शहरों ----वाराणसी ,लखनऊ ,कानपुर ,गोरखपुर एवं इलहाबाद से प्रकाशित दैनिक]



 

शनिवार, 23 अगस्त 2014

जनसंदेश टाइम्स[में प्रकाशित दिनाक 24/08/14[वाराणसी। इलाहाबाद ,लखनऊ ,कानपुर एवं गोरखपुर का प्रमुख समाचार पत्र ]


शुक्रवार, 22 अगस्त 2014

मूड़ है की मानता नहीं [व्यंग्य ]

मूड़  है की मानता  नहीं [व्यंग्य ]

                           
               
                  जिस प्रकार चायना के  मॉल का कोई भरोसा नहीं  रहता है फिर भी इसका
उपयोग करना हमारी जिन्दादिली  है ,उसी तरह आजकल मूड़  का कोई भरोसा  नही   कब खराब हो जाये   यह  एक गंभीर  समस्या  बन गई है किसका  मूड़ कब  खराब हो जाये  कुछ  भी कहा  ही नहीं  जा सकता l वैज्ञानिकों  का  भी  खोज -खोज करते -करते मूड खराब हो जाता है कि  इसे टेंशन की एक अवस्था कहा जाये  या इसे मानसिक विकार की श्रेणी में रखा जाये  इस पर चर्चा करते -करते मूड खराब हो जाने के कारण अन्तिम निष्कर्ष बार बार  टल  जाता है l जिसको  देखो उसका मूड खराब है यह एक तकिया कलाम सा बन गया है ,किसी   हँसते  हुए से यह पूछ लिया और क्या हाल है  ?उत्तर मिलेगा मूड़ ख़राब है न जाने वायुमंडल में क्या  ऐसा प्रभाव हुआ की मूड़  ख़राब रहना मनुष्य का स्वाभाविक गुण हो गया है l
              मूड़ खराब होने की गुत्थी मेरे दिमाग में बार -बार  उलझती जा रही थी इसे सुलझाना  तो बहुत दूर  यह समझ से परे थी l मैं  सोच ही रहा था कि  क्या किया जाय तब अचानक मेरे दिमाग में कौन बनेगा करोड़पति में लाइफ़ लाइन के एक  ऑप्शन फोन अ फ्रेंड का विचार आया कि  क्यों न किसी मित्र को फोन लगाकर  जानकारी ली जाए  अब किसे फोन लगाया जायें ? फिर एक प्रश्न खड़ा हुआ ,मैंने  मन बनाकर मनोचिकित्सक   डॉ  साहब को फोन लगाया और पूछा की सर जी क्या हाल है
डॉ ,साहब  बोले -क्या बताऊँ  मूड़   बहुत खराब है
मैने पूछा क्या हो गया ?
डॉ साहब का उत्तर था-बस यूँ  ही क्या कहूँ  दिमाग काम नहीं  कर रहा है l
मैंने  सर पीटते हुए कहा  गई भेंस पानी में l
 और  पूछा की ऐसा क्यों  होता है कि  किसी  का कहीं  भी  कभी भी  मूड़ खराब  हो जाता है ? डॉ साहब के बोलने का लहजा अब रुखा होता जा रहा था और मैं  बैचेन था  मैंने  कहा डॉ  सा.कृपया मेरी  सहायता करिये--वे बोले समय हो तो इधर ही आ जाओ l मैंने   कहा आता हूँ ,मैंने तो कमर कस ली थी इस मूड नामक  बीमारी को समझने की  l मैं  उनके घर जा धमका  l मुझे देख कर  गंभीर होकर डॉ साहब ने थोड़ी तेज आवाज में पूछा कि बोलो क्या काम है ?

   मैंने  जिज्ञासा भरे लहजे में कहा कि  सर जी  आजकल मूड खराब होना  बचपन से पचपन और उसके आगे भी ,संत्री से मंत्री ,छात्र से लेकर अध्यापक ,मरीज से लेकर डॉ तक सब इसी बीमारी से ग्रस्त है कहीं यह महामारी न बन जाए ,सरकारें भी इस बीमारी से अनभिज्ञ है  इसके लिए तत्काल सर्वे की जरूरत न पढ़  जाए l  डॉ साहब अपना मूड़  संभालते हुए बोले कि आये दिन इस अज्ञात बीमारी के मरीज निरंतर बढ़  रहे है वे  कहने लगे कि  क्या इलाज करूँ  ?मैंने  कहा यह तो आपका क्षेत्र है l  वे मूड़ खराब  होने  का ज्ञान बांटने   को तैयार हो गए और मैं  मौन धारण करके सुनता रहा क्योंकि  बीच में बोलने से डॉ साहब के मूड़  ख़राब होने का खतरा मंडराता हुआ नजर आ रहा था l


                     डॉ साहब अब अच्छे मूड़  में दिख रहे थे कहने लगे -आजकल सुबह की शुरुआत ही बेड हो जाती है  उठते ही बेड टी  की आदत जो हो गई है फिर हाथ में आता है बलात्कार,खून  अपराध ,भ्रष्टाचार  ,बढ़ती महंगाई  से भरा अख़बार  मूड खराब करने को काफी है मूड़  खराब करने की दूसरी बड़ी समस्या या वजह जाम का आम होना ,और यह लेट पहुँचने से  बॉस  की आँख  की किरकिरी  बनकर हमेशा तिरस्कार का भागी बनकर मूड़  खराब होने  की यातना को  भोगता है साथ ही हर जगह चमचों  के  हमलों का प्रकोप, काम का दबाव ,कम मेन पॉवर में ज्यादा  काम भी मूड खराब के सूचकांक में वृद्धि करता है l शाम को फिर वही जाम फिर बुरा अंजाम और  अब घर वालों   की अपेक्षा पर  खरा  उतरने  की जद्दोजहद क्या करें  कोई कितना ही  बुलंद हो फिर भी मूड़ खराब  हो ही जाता है,l मूड़ खराब  का साइड इफेक्ट  से मानसिकता कमजोर हो जाती है और  गुस्से की उत्पत्ति   हो जाती है जैसे आये दिन  सदन में भी ऐसे दृश्य   देखे जाते है  मुद्दे से हटकर बोलने लगते है इन सबकी जड़ तो मूड़  ही  है मैने बीच में  टोकते हुए  कहा कि  डॉ आपने इसकी महिमा का गुण  गान किया है अब कोई उपाय  तो बताइये तो -डॉ साहब ने टालते हुए कहा की मित्र अगली बार l मैंने  मन ही मन कहा कि  खुद ही इससे पीड़ित है  क्या बताये   इलाज ?मूड अच्छा करने के लिए लोगबाग क्या-क्या जतन करते  है पीने वाले को पीने  का बहाना चाहिये है कुछ तो नेट पर चेट और मोबाइल से ही चिपके रहते है मूड़ को ठीक करने के लिए l
                दिल क्या करे मूड  है कि मानता  नहीं   और हम डूबेंगे सनम आप को भी ले डूबेंगे खराब मूड़  में --- मेरा मूड़  खराब है तेरा खराब न कर दूं तो मेरा नाम नहीं  l

गुरुवार, 21 अगस्त 2014

आत्म चिंतन पर चिंतन [व्यंग्य ]

आत्म चिंतन पर चिंतन [व्यंग्य ]

                किसी भी विषय पर चिंतन करना समाज और देश के लिए बहुत जरूरी है पर देश में चिंतन का वातावरण ही नहीं  है सब के सब चिंता में ही लगे हुए है चिंता और चिता में एक बिंदी का ही अंतर है जो हर मनुष्य के लिए घातक है चिंता की बजाय चिंतन को बढ़ाने के प्रयास बहुत जरूरी है  l  एक न्यूज़ की कटिंग  लेकर भटकते हुए एक चिंतक आये और कहने लगे कि  थोड़े दिन में देश में चिंता को छोड़ कर चिंतन करने वाले बढ़ जायेंगे तो  मैंने  कौतूहलवश पूछ लिया कि ऐसा क्या चमत्कार होने वाला है
 तो वे कहने लगे सब को आत्म चिंतन केंद्र की सुविधा जो  मिलेगी ,
मैंने  फिर पूछा-यह क्या होता है ?
वे बोले आपको नहीं  मालूम कि शौचालय को हिंदी में "आत्म चिंतन केंद्र" कहते है
वे सबके लिए बनाये जायेंगे  जिससे चिंतन को नई गति मिलेगी , अभी जिनके पास है
वे अपने आप को  अच्छा और विकसित मानते है और जिनके पास नही है  उन्हें तुच्छ और पिछड़ा माना जाता है वे कहने लगे अधिकतर मनुष्य नाम के प्राणी अपने आप को ज्यादा  तनाव मुक्त वहीं  पाते होंगे  I  देश की हर समस्या का चिन्तन  उसी आत्म चिन्तन केंद्र  में करते होंगे शायद तभी विवादित बयानों की  इतनी बौछार होती है  बेचारा  वह क्या  चिंतन करेगा जिसके पास चिंतन केंद्र ही नही है उसके लिए तो यह अभिशाप है वैसे यह चिन्तन केंद्र  आजकल बहुतायत में पाए जाते हैं  पर सबका स्वरूप भिन्न -भिन्न  होता है जेसे वी . आई .पी .लोगों  .का पांच सितारा , .जन सामान्य का  साधारण .गरीबों  का सार्वजनिक ,और बाकी  बचे हुए  लोग  खुले  स्थान  की और रुख करने को मजबूर है l  खुले में चिंतन करने में  प्रकृति  के दृश्य विघ्न पैदा करते है ,और जीव जंतु का भय  सताता सो अलगl
  
         अत: चिंतन  का दायरा भी अलग अलग होता है  एक मंत्री ,नेता ,कवि ,लेखक ,पत्रकार ,व्यापारी ,अधिकारी और  सबका अपने  चिन्तन का विषय अपने  कार्यानुसार होताहै I  मैंने  कहा बेचारा गरीब आदमी ...तो अपनी रोजी -रोटी और बढती  महंगाई का चिन्तन कर दुखी होता है और चारा ही क्या है,आजादी की बाद से ही यह मुख्य मुद्दा रहा है सबने भुनाया और बाद में भुलाया  , फिर भी ढाक के तीन पात l  लगातर उनका चिंतन का बखान जारी था उनका कहना थी कि सरकारें   केवल चिंता  करती है और ठोस योजना का अभाव ही रहता है , इस समाचार के मुताबिक सबको यह सुविधा मिलेगी ऎसी  आशा अधिक  व विश्वास तो कम ही   है कि ऐसा  हो पायेगा बायचांस अगर हमारे देशवासियों के पास १०० प्रतिशत ऐसे केंद्र हो तो सब चिंतनशील हो जायेंगे  और सरकार के  हर कदम का  चिंतन  करेंगे ओर जिससे कर्णधारों  को सबसे ज्यादा  नुकसान होगा वे इस दर्द को समझते है  लेकिन  इसके प्रति चिंता को दर्शाना  उनका कर्तव्य है और  चिंता की रस्म  अदायगी कर अपने कर्तव्य की इति श्री कर लेते हैं  l
                  ऐसे केंद्र समाज और देश के विकास का आयना होते है मैंने  उन्हें कहा कि
आपने जो अपना चिंतन बताया है उससे लगता है कि  निंदक नियरे राखिये की बजाय चिंतक नियरे राखिये जिससे कुछ नया ज्ञान प्राप्त  होता रहें  l और आत्म चिंतन पर चिंतन की प्रेरणा का प्रदुर्भाव होता रहें  l
                                   
 
                     
संजय जोशी "सजग " [ व्यंग्यकार ]

गुरुवार, 14 अगस्त 2014

सियासत का बढ़ता डिग्री सेल्सियस

सियासत का बढ़ता डिग्री सेल्सियस
          
      डिग्री -डिग्री के शोर  में सियासत के  तापमान को कई डिग्री सेल्सियस बढ़ा दिया l सियासत में डिग्री का सामान्यतया कोई ज्यादा महत्व नहीं  रहता  है और न  ही कोई जरूरत महसूस की गई  यह व्यथा  डिग्री धारी  अधिकारी की है कि  पंच से लेकर देश के सबसे बड़े पद के लिए आवश्यक शिक्षा और उम्र का  कोई मापदंड नहीं  है और न रहेगा  क्योंकि  बगैर डिग्री,  नेतृत्व देने वाले नेताओं  की एक परम्परा है कोई  इसे कैसे तोड़  सकता है ? सरकार चलाने वाले पर्दे के पीछे  अपना  काम करने वाले  डिग्री धारी अधिकारी कड़वा घूँट पी कर अपनी डिग्री को कोसते है कि  हमसे  अच्छे तो ये है पर इनके  बीच काम करना  हमारी  मजबूरी है हो सकता है कि  हमारे पूर्व जन्म  के  पाप  का नतीजा हो  पर सहना तो पड़ता है  भारी मन से और  हमें लगता  भी है कि  कुछ नहीं  होने वाला है l  पुराने लोग हमेशा यह उक्ति कहा करते थे कि  ,पढ़ोगे लिखोगे बनोगे नवाब ,खेलोगे  कूदोगे बनोगे खराब ,वर्तमान के संदर्भ में -पढ़ोगे लिखोगे बनोगे खराब ,खेलोगे  कूदोगे बनोगे नवाब l ,क्रिकेट में तो यह सच साबित हो रहा है बिना डिग्री के ही कहां  से कहां   पहुँच गये और हीरो  बन गए l सियासत में भी यही हाल है डिग्री की कोई वेल्यू नहीं  है फिर भी सियासत का डिग्री सेल्सियस  डिग्री के कारण चरम पर  है सियासत  में रोज -रोज के तापमान का डिग्री  सेल्सियस उतार चढ़ाव  के नित नए आंकड़े छूता है l
             एक युवा नेता ने कहा कि  थ्योरी और प्रेक्टिकल में भारी  अंतर को समझकर  कबीर दास जी सब डिग्री वालों  को  पहले ही निपटा गए और कह गए पोथी पढ़-पढ़ जग मुआ पंडित हुआ न कोय इसका  सीधा मतलब है कि कितना भी  पढ़ लो सर्वज्ञ नही हो सकते है l और कहने लगे डिग्री तो आपके ज्ञान को सीमित  कर एक ही विषय का विशेषज्ञ  बनाती है हमारे देश के  कर्णधार इस बात को बखूबी  समझते है जब तो डिग्री के पचड़े  में न पड़कर अपने आप को हर विषय का जानकार  याने की   सर्वज्ञ समझ कर किसी भी विभाग का  जिम्मा ख़ुशी -ख़ुशी लेकर देश की जनता की सेवा करना  अपना कर्तव्य   समझते है मैंने  कहा सही फ़रमाया जनता को एक प्रयोगशाला  समझ कर प्रयोगधर्मी हो गए ,अच्छा हुआ तो हमने  किया और बुरा हुआ तो देश की जनता जागरूक नहीं  है l देश में सियासत की डिग्री सेल्सियस को और उच्चतम करने में हमारा दृश्य मिडिया भी कोई मौका नही छोड़ता  है पर जब डिग्री पर ही डिग्री   सेल्सियस बढ़ने लग जाय तो ऐसे में  ए.सी में भी दिमाग काम करना बंद कर देते है l जिनके पास डिग्री नहीं  है वे भी दुखी और जिनके के पास है वे भी दुखी l किस्मत अपनी -अपनी घोड़ो को घांस भी नसीब में नही और गधे गुलाब  जामुन ही नहीं  च्वयनप्राश खा रहे है l कुछ बनियान में इतनी ताकत है कि पहनने से लक बदल जाता है पर यहां तो सरकार बदलने पर भी लक नहीं  बदलता है हमारी विडंबना है l डिग्री कुछ मेहनत व ज्ञान से तो  कुछ जुगाड़ से प्राप्त करते है जब से व्यापम घोटाला बहुत चर्चित हो गया है उसके बाद से बेचारे डिग्री वाले को बुरी नजर से देखते है कि  कहीं  जुगाड़ की तो नहीं  है l डिग्रियों की दुर्दशा यह है कि  डिग्री सही रोजगार देने में बुरी तरह विफल हैl नेता और अभिनेता  दोनों का ही डिग्री से दूर-दूर तक कोई वास्ता नहीं  ,जो चल गया सो चल गया l
                    कब्र में पांव लटकाये एक नेताजी कहने लगे कि  राजनीति में जितना सोशल इंजीनियरिंग का जानकार होगा उतना ही सफल होगा इसकी कोई डिग्री नहीं है फिर अपने आपको डॉ समझने  वाले भी  कम नही है ,सियासत तो तजुर्बा मांगती है और डिग्री  केवल शिक्षा  देती है तजुर्बा नहीं   l तजुर्बे वाला चलता नही दौड़ता है l मैंने कहा कि  कब तक दौड़ेगा और डिग्री धारी कब तक   रेंगता रहेगा l उन्होंने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी और चर्चा का अंत हुआ l

शुक्रवार, 8 अगस्त 2014

पत्र हिंदी के नाम [व्यंग्य ]

पत्र हिंदी के नाम [व्यंग्य ]

   ऋषभ जी  एक  हिंदी के लेखक है जो हिंदी की वर्तमान अवस्था से बहुत पीड़ित और दुखी है अपना दुःख बांटने के लिए राष्ट्र भाषा हिंदी को पत्र लिखने का निर्णय  लिया  और लिखा भी  लेखक लिखने के अलावा कर भी क्या सकता है उनका यह पत्र ----
 
                आदरणीय राष्ट्रभाषा हिंदी    ---शत -शत  नमन
               
                      आपकी सेहत तो दिनोंदिन  बिगड़ती जा रही है  या  फिर बिगाड़ने का प्रयास किया जा रहा है आये दिन समाचार सुनकर,देखकर ,पढ़ कर आपकी गिरती सेहत से आपको चाहने वाले दुखी और हताश है आजादी के लिए आपका भरपूर उपयोग किसी से छिपा नहीं है पर   उसके बाद पर जो सम्मान मिलना चाहिए व आजतक नहीं  मिला  और मिलने के आसार भी नजर नही आरहे है,जिसका मुख्य कारण कथनी और करनी में भारी अंतर   है आप को प्यार करने वालों  को  बुरी  नजरों  से देखा जाना आम बात है तथा उन्हें  पिछड़ा औए अविकसित माना जाता है और आपके सम्मान  के खातिर डंडे खाने और पुलिस के  अत्याचार पर भी  किसी को रहम नहीं  आता है lहिंदी का होता चिर हरण  तब हिंदी के भीष्म पितामह  भी क्यों  मौन हो जाते  है आज भी  है  कृष्ण की  आवश्यकता   l

  
    वादें  और कसमें  खाने में हम सबसे  आगे है   फिर भी स्वतंत्रता के बाद से  हिंदी को गौरवशाली स्थान न दिला  पाना हमारी  कमजोर  इच्छा शक्ति का परिणाम है लगता है प्रयास  हुए पर सिर्फ  रस्म अदायगी  तक  ही  सीमित  रह गए   लगता है दिल और दिमाग से नहीं  किया गया मात्र हिंदी प्रेमी होने का दिखावा किया  जाता रहा है जो आज भी लगातार  जारी है l माता -पिता भी तो मम्मी और डेड हो गए l तभी  हिंदी के सब सपने डेड हो गए है  साथ ही ड्रेस, व खान-पान भी विदेशी जैसे पिज्जा ,बर्गर ,हॉटडॉग ,और नूडल्स के  क्रेजी हो गये l बदली भाषा ,बदले तेवर और रंग ढंग lहम उस देश के वासी है जहां तथाकथित अपने आप को आधुनिक समझने वाले बच्चो के हिंदी में बात करने पर अपने आप को अपमानित समझते है l देश की विडंबना है कि अंग्रेजी  माध्यम के बच्चों  को सौ  तक के अंक भी हिंदी में नहीं  पता  होते है l

            आपके परम भक्त पद्म जी कह रहे थे कि  किसी की ये पंक्तियां  " अपनों ने  ही लूटा गैरों  में कहां दम था ,कश्ती  वहीं  डूबी जहां पानी कम था  " हिंदी की दुर्दशा के लिए सटीक है l कोई सा भी क्षेत्र अछूता नहीं है हर जगह हिंदी को महत्व न के बराबर दिया
जाता है l केवल राष्ट्र भाषा का बोर्ड लगाने मात्र से ही सब कुछ सम्भव नहीं  है दिल और
दिमाग से अपनाने से ही  हिंदी का उत्थान होगा l  हम क्यों आलसी और उदासीन रहते है
अपनी भाषा के प्रति? यह एक विचरणीय प्रश्न  है जिसका  उत्तर कभी भी आसानी से नहीं
मिल सकता उसमे भी आलस आ जायेगा या प्रतीक्षा  करेंगे कि दूसरा कोई दे ही  देगा l
                  एक पेशे से पत्रकार जो आपकी  प्रगति के लिए हमेशा तत्पर रहने वाले
ने अपनी व्यथा कुछ इस तरह बतायी कि  हिंदी समाचार  में "हेड लाइन "ब्रेकिंग न्यूज़ "
जैसे शब्दों का उपयोग करके हिंदी को गर्त में धकेलने में अपनी महत्व पूर्ण भूमिका का
निर्वाह कर रहे है जब तक भाषा के प्रति अपनी जिम्मेदारी नहीं  समझेंगे उसका अपमान करते रहेंगे l
             
            हमें  आशा हीं  नहीं  पूर्ण विश्वास  है कि  अच्छे दिन के आने की बयार  में आपके भी अच्छे दिन आयेंगे  आप चिंता न करें  उम्मीद पर खरे ही उतरेंगे आपके चाहने वाले l
                                                                        आपका अपना
                                                                            ऋषभ
                                                                        हिंदी भक्त और लेखक
                
                          

रविवार, 3 अगस्त 2014

टमाटर की टर्र -टर्र

      टमाटर की टर्र -टर्र
        
                    अभी तो  टमाटर की टर्र -टर्र  चल रही है हर किसी की जुबान पर होकर
भी न होना बड़ी त्रासदी  है चुनाव में नेताओ की टर्र -टर्र आम बात है बारिश में मेंढक  की टर्र-टर्र होना स्वाभाविक है पर अचानक टमाटर के  टर्र -टर्र  होने  की खबर  मात्र से आम आदमी को टमाटर  सेवफल जैसा नजर आने लगता है क्योकि  सेवफल का आहार  तो  वह केवल बीमारी के समय ही डॉ सा के  कहने पर बेमन से  लेता है अब उससे टमाटर भी दूर हो जायेगा इस दुःख से तनाव के कारण वह ब्लड प्रेशर का मरीज हो गया l सबके दिन फिरते है सजीव हो या निर्जीव यह कुदरत  का खेल है जैसे कभी  नाव में गाड़ी तो कभी गाडी में नाव l वैसे ही आजकल टमाटर हर और छाया हुआ है बाजार में इसकी इमेज को चार चाँद लगे हुए है कुछ तो डॉलर और पोंड से ज्यादा कीमत से होने के कारण फुले नही समा रहे है ज्यादा भाव के कारण प्राकृतिक चिकित्सा वाले वाले भी सहम  गए है   कि  अगर टमाटर का प्रयोग बता दिया तो मरीज ही भाग जायेगा l
            निरंतर टमाटर  के  भाव बढ़ने पर  किसान से भाव पक्ष जानने के लिए,अपने  आपको आधुनिक किसान कहने वाले तेजु काका को कहा कि  टमाटर  के भाव ने तो आपके चेहरे  की और चमक और बड़ा दी --मेरा इतना कहना था की कहने लगे जब हमें  टमाटर के उचित भाव क्या लागत  भी नही मिलती  थी  तब हम उन्हें फेंक देते  थे  जब कौन आया था ?कहां थे न्यूज़ चैनल वाले,पक्ष ,विपक्ष के नेता आज तक फसल का उचित मूल्य मिला ही नही किसानों  को कभी। ऐसे ही कभी -कभी  गलती से किसानों  को कुछ फायदा मिल जाता है तो देश में हा -हा कर मच जाता है विधायक ,सांसद और  मंत्रियो के भत्ते तो आये दिन बढ़ते रहते है बेचारे किसान तो प्रकृति पर निर्भर रहते है , और प्रकृति के रुष्ट होने का मुआवजा मिलता ही नही है और बॉयचांस मिल भी जाता है तो ऊंट के मुह में जीरे की  भांति होता है l बेचारा  आम किसान  तो कर्ज में  जन्म लेता है और कर्ज में ही मरता है l
                टमाटर की टर्र -टर्र में  पक्ष और विपक्ष का गुण -धर्म  अलग- अलग  होता  है सबके पास अपना -अपना धर्म निभाकर घड़ियाली आंसू बहाकर सब को बहला -फुसलाकर अपना उल्लू सीधा कर लेने में महारथ हासिल रहती है l न्यूज़  चैनल  ने लोगो पर टमाटर की टर्र -टर्र का  ऐसा प्रभाव डाल दिया कि  टमाटर ही सब कुछ है बेचारी गृहणियों  को  टमाटर युक्त व्यंजन मांग कर  परेशान करने  वालों  कि  कमी नही है आजकल होटलों मे भी ये सलाद से नदारद है मांगने पर ही दिया जाता है   हमारी  प्रकृति ही कुछ ऐसी है जो  चीज महंगी व जिसकी कमी है वही  अच्छी  लगती है l और सरकार भक्तों  का तर्क है कि  टमाटर कुछ दिन न खाओगे तो क्या सेहत पर कुछ अंतर  पड़  जायेगा पर लोगो का दिल है कि टमाटर के बिना मानता ही  नहीं  है l और टमाटर की टर्र -टर्र जोरों  पर है कब तक चलेगी किसे पता ?

सोमवार, 28 जुलाई 2014

ऐ - होमवर्क तूने तो बचपन ही छीन डाला

ऐ  - होमवर्क तूने तो बचपन ही  छीन डाला  
                     

        तकरीबन  पढ़ने वाला  हर  बच्चा ,चुन्नू -मुन्नू हो या गिन्नी -बिन्नी  होमवर्क नाम की बीमारी से ग्रसित है  बच्चों की डिक्शनरी में होमवर्क शायद सबसे डरावना शब्द है। बेताल की तरह यह  भी  इनका पीछा ही नहीं  छोडता घर में प्रवेश करते ही आधुनिक मम्मियों द्वारा यक्ष -प्रश्न कितना होमवर्क दिया ? बेचारा बच्चा हताश होकर बताता है कि  इतना -इतना दिया है उसके बाद उसकी मम्मी की सुपर प्लानिंग चालू  जाती है में एक घंटे सो रही हूँ तुम सब  होमवर्क  पूरा कर लेना नही तो खेलने नही जाने दूंगी बेचारा बच्चा खेलने जाने के मोह में जी तोड़ मेहनत कर होमवर्क पूरा करता है खेलने जाने के लिये मानसिक रूप से अपने आप  को तैयार करता है और  अगला आदेश फिर प्रसारित कर दिया जाता है जल्दी आना....ट्यूशन  जाना है इससे बच्चों की क्रिएटिविटी, सोचने-समझने की क्षमता और कल्पनाशक्ति तेजी  से घट रही है। वे समझने के बजाय रटने का तरीका अपना रहे हैं।यूरोपीय देश तो होमवर्क से इतना ऊब चुके हैं कि उन्होंने इसे पूरी तरह खत्म करने की दिशा में प्रयास शुरू कर दिया है l हमारे देश में और भी कई समस्या है इसके बारे में कौन सोचे ? बच्चा वोट देता है क्या ?हम तो उसकी ही  सोचते हैं जो वोट देता है तुम बच्चो कौन  से खेत की मूली हो ?

 
                     तनाव में खेलने का प्रयास करता है,अगला टारगेट जो उसे पूरा करना है
अब वह मम्मी की गिरप्त से छूट  कर पापा के कटघरे में आ जाता है फिर रिविजन  का
प्रोग्राम चालू  हो जाता है …क्या करे हैरान परेशान है इस होमवर्क ने तो पूरा बचपन ही
धो डाला। समर वेकेशन हो या कोई सा वेकेशन  होमवर्क का खतरा हमेशा मंडराता रहता है  यह होमवर्क नाम  की बीमारी ने बच्चो को क्या माँ और बाप की आजादी के साथ भी कुठराघात कर रखा है l कोर्स से ज्यादा होमवर्क l चुन्नू -मुन्नू हो या गिन्नी -बिन्नी का कहना है कि  होमवर्क नहीं  करो तो पनिश्मेंट  मिलता है और बच्चों और टीचर के सामने
इमेज खराब का  डर सताता रहता है ,हमारा तो बचपन ही छीन डाला सही है बच्चो की व्यथा से मैंने  भी सहमति जताई की सुनहरा बचपन---दुःख भरा हो रहा है l
  एक पीड़ित  आधुनिक  माँ ने अपने भाव प्रकट करते हुए कहा कि बच्चों  पर मानसिक दबाव कम करने के लिए हवाई किले तो बहुत बनाये जाते है इसके लिये  न जाने कितने सेमिनार  और वर्कशाप के आयोजन होते है पर सिर्फ औपचारिक होकर रह जाते है तनाव तो बच्चों  के हिस्से में ही रहता है ,घर वाले सोचते है कि  ज्यादा  देर तक स्कूल  में  रहे ताकि घर में शांति रहे और स्कूल  वाले सोचते है पढ़ाई का काम स्कूल  में कम से कम हो और बच्चे के पेरेंट्स  ही सब करवा दे lआज बच्चों का होमवर्क व  प्रोजेक्ट वर्क पेरेंट्स के लिए सिरदर्द बनता जा रहा है l इसीलिये  तो आजकल एडिमिशन के समय पेरेंट्स की योग्यता  ,और जेब कितनी भारी है यहीं देखा जाता है l
    निजी स्कूल के टीचर  जी का कहना है कि कोर्स तो  आराम से  पूरा हो जाता है होमवर्क तो बच्चो में कैलिबर बढ़ाने के लिए देते है और सरकारी स्कूल के मास्टर जी का  कहना है हमारे यहां तो न स्कूल में कुछ करवाते है और न ही होमवर्क देने का समय है हमारे पास दूसरे सरकारी काम भरपूर है सब  छात्र  तो ईश्वर पर आश्रित है l
                   कई बच्चे तो उच्च शिक्षा प्राप्त करने के पहले ही डिप्रेशन के शिकार हो जाते है l ये होमवर्क ने बच्चो का सुख चैन  सब  छीन रखा है और बच्चे कोसते होंगे  कि
है  होमवर्क का चलन चलने वाले मैकाले ,तूने बच्चों  पर कितने सितम ढहाये,तुझे क्या मिला बच्चों  का बचपन छीनने वाले चेहरे  की हंसी को मत समझ हकीकत-
ऐ होम वर्क  तुझसे  कितने परेशां  है हम सब -----l
                           
                           
संजय जोशी "सजग " [ व्यंग्यकार ]

बुलेट बनाम लेट [व्यंग्य ]

बुलेट बनाम लेट [व्यंग्य ]  

        बुलेट ट्रेन चलने की सुगबुगाहट जोरों  पर है इनकी  गति का भारत में कीर्तिमान बनेगा अब तक की सबसे तेज चलने वाली होंगी ये बुलेट ट्रेनें  ,यह देश की प्रगति  की सूचक बनेंगी  लेकिन  धीरे और लेट चलने वाली लोकल आम आदमी की ट्रेनों   के   हालात तो बद से बदतर  हैं  लेट -लतीफी में  बड़े -बड़े कीर्तिमान है अब बुलेट ट्रेन अपनी तेज गति का  मापदंड  स्थापित करेगी l बहुत बड़ा वर्ग इनसे अछूता ही रहेगा सिर्फ दर्शन मात्र से ही अपने आप को धन्य समझेगा ओर हक्का बक्का  रह जाएगा  और  कुछ मिनट के लिए अपनी सब तकलीफें  त्याग देगा उसे  देख्नने की खुशी में  l सभी लोकल ट्रेनों को बुलेट में बदलना  अगले चुनाव की लालीपाप होगी l
     ट्रेनों में जन सामान्य वर्ग के साथ  अपडाउन करने वाला एक विशेष वर्ग होता है जो नींद मे भी जागता रहता है और हमेशा ट्रेन के लेट होने के  दर्द से विचलित होकर  रेलवे को कोसता रहता है वह रेलवे की  कारगुजारियों  व खामियों के साथ  देश की  समस्त  घटित और अघटित  घटनाओं  का विशेषज्ञ  होता हैं ट्रेनों का लेट होना  उसके ज्ञान में वृद्धि करने में सहायक होता हैl  ट्रेन के लेट होने की महामारी से उसे  ब्लड प्रेशर जैसी गंभीर बीमारी गिफ्ट के रूप में प्राप्त हो जाती है , और  आफिस में रोज -रोज लेट पहुँचने के बहाने बनाकर  तंग आ जाता है ऐसे ही एक महाशय ने अपना अर्जित ज्ञान बुलेट ट्रेन की चर्चा के दौरान उड़ेल डाला की बुलेट जेब पर भारी   होगी और लोकल ट्रेन  लेट होने  से समय पर भारी  है,रेल के लेट होने की  नियति की   कोई  सीमा नहीं जहां  चाहे रोक देतें हैं पड़े रहो घंटो ,  फ़ास्ट ट्रेनों  को निकलते हुए   निहारते रहो ,जिसने लोकल  गाडी  में   और लोकल कोच में यात्रा की हो वहीं   जानें, रेलवे के नीति निर्धारकों को भी लोकल ट्रेन व कोच  में यात्रा   करनी चाहिए तो अनुभव  होगा की क्या जरूरी है और क्या नहीं lबुलेट ट्रेनों की गाज तो  सभी ट्रेनों पर गिरेगी और लोकल ट्रेन व आम आदमी इससे और त्रस्त हो जाएगा अभी क्या कम  है ?लोकल ट्रेनें  लावारिस  सी  लगती हैं और ख़ाने -पीने के  कचरे का ढेर ,बदबू  व  मच्छरों  की भरमार , भीड़ खचाखच ,कर्कश आवाजें  ,गुत्थम  -गुत्था ऐसा होता है आम आदमी  की रेल का  सीन ,यह सब सहकर दिमाग चक्कर घिन्नी होता  हैं और ऊपर से लेट पर लेट l लेट लतीफी और सफाई पहले इस पर काम होना चाहिए फिर बुलेट का सपना साकार करना चाहिये l
                          निरंतर अपनी बात कहे जा रहे थे ओर महाशय जी अब ट्रेन की तरह बेपटरी हो गये  और कहने लगे कि पटरियों का ज़ाल बुलेट ट्रेन को नही सह पायगा और हम जैसे तो जान हथेली पर लेकर रोज घर से निकलते है कि  कोई अनहोनी न हो  जाएं l प्लेट फार्म पर उदघोषणा  सुनकर कि  'ईश्वर आपकी यात्रा सफल करें " भय और बढ़  जाता  है कि   रेलवे भी यात्री को भगवान भरोसे छोड़  देते है ओर समय  पर सुरक्षित पहुंचा दे...... मतलब  रेलवे की सुपर सेवा का क़माल। मैंने  उन्हें रोकते   हुए कहा कि  भाई बस  करो में सब समझ गया  और  आपकी बात का कायल हो गया की बुलेट से पहले लेट पर नियंत्रण जरूरी है आपकी पीड़ा सही है lजब तक है सांस तब तक है आस...यही सोचकर जीते रहो l


संजय जोशी 'सजग "[ व्यंग्यकार ]

बुधवार, 23 जुलाई 2014

मानसून का आना ........... [व्यंग्य ]


                                     मानसून का आना ...........
   [व्यंग्य ]
  

            आजकल मानसून भी बिना बुलाये कहाँ  आता है ?झुलसा देनी वाली गर्मी को सहने , कई मिन्नतों  ,देवी ,देवतओं  को मनाने के बाद  ही आता है और मौसम विभाग कम मानसून की भविष्य वाणी  कर  चिंता में डालने का काम आने के पहले ही कर देता है हर वर्ष इनके अनुमान  गलत साबित हो जाते है क्या  करें ?जैसा भी आये मानसून का आना जरूरी है  यह  समृद्धि  का सूचक है इसके आने से जीवनं में  आशा और उत्त्साह का संचार होता है पानी के लिए तरसती , बिजली के  लिए  परेशान जनता ,व किसानों  के मायूस चेहरों  पर चमक आ जाती है  सूखी धरती  हरियाली की चादर से  ढँक  जाती है सूखे  नदी -नालों में भी जलप्रवाह होने लगता है l
      नये प्रेमी  युगल मानसून की वर्षा में भीगने  का भरपूर आनंद लेते हुए पहली  बारिश तू और में  भीगकर आपनी हसरत पूरी करते है मानसून रोमांस में वृद्धि का  कारक भी है,तभी तो बॉलीवुड ने ऐसे  कई फिल्मी  गाने दिए जैसे - छतरी की छाया में छुपाऊँगा   तुझे , ऐसे  कई गाने है जो रोमांस में वृद्धि के लिए टॉनिक का काम करते है इस मौसम में बस थोड़ा नॉटी होने की कोशिश करनी चाहिए तभी इस मौसम का मजा आएगा ऐसा लगता है  साक्षात प्रेम के देवता इस मौसम में बारिश की बूंदो की जगह  प्रेम बाण छोड़ रहे है बड़े शहरों में तो ऎसे लवर्स पार्क की कोई कमी नही हैl बारिश प्रेमी कवि अपनी लेखनी सक्रिय कर देते है बारिश , सावन और श्रृंगार  पर लिख कर मादकता  बढाने में उत्प्रेरक का काम करते है l प्रेम की झूठी कल्पनायें करना ऐसे कवियों का शौक रहा है लिखने में क्या बुराई है यूँ भी थ्योरी और प्रेक्टिकल में भारी अंतर है....ये इतनी आसानी से मानते कहां  है मान ले तो कवित्व पर दाग लग जाए l
    मानसून का आना तपन से मुक्ति देता है वही बिजली की मांग  व बिल में कमी करता है . मानसून का आगमन .से ..वीरान पड़े ..पिकनिक  स्थलों पर रौनक आ जाती है नदी .तालाबों  ..में  भरा जल जोश भर देता है जैसे  ..इतना पानी ..कभी देखा ही नही और   कभी शायद देखने को न मिले और  कुछ तो जोश में होश  खो देते है और  अनहोनी हो जाती है l ..
  मानसून आते ही तथाकथित समाज सेवी ,वृक्ष प्रेमी ,वृक्षारोपण का अभियान हर वर्ष की तरह पूरे जोर शोर के साथ शुरू करते है पिछले वर्ष के कितने पौधे विकसित हुए इससे उन्हें क्या करना हमारे देश की विडम्बना है बस वृक्षा रोपण करो ,समाचार पत्रों में फोटो .स्थानीय चैनलों  में वीडियो क्लिप आना चहिये प्रसिद्धि पाने का यह भी एक नुस्खा है l अगर हकीकत में यह सब होता तो आज वृक्षों की कमी न होती  l    .सावन तो शिव भक्तों  के लिए  शिव बूटी  का वरदान  लेकर आता है .सब भंग की पिन्नक से सरोबार रहते है बारिश का यह  मौसम में घर में रहकर बारिश का आनन्द लो ..गरमा-गरम  पकोड़े  खाओ, इस मौसम में तेल बिक्री .बड़ना..स्वभाविक ..है .और कुछ का दिल है मानता ही नही और कोलस्ट्रोल बड़ा कर पत्नी को चिंता  में डाल  देते है 
    
  मानसून का आना एक नेक काम ओर करता है की भ्रष्टों  की नीद उड़ा देता है निर्माण कार्यो की परीक्षा जो अपने आप हो जाती है बांध ,स्टाप डेम का बहना ,सरकारी नव निर्मित  भवनों  का रिसना ,सडक उखड़ना सड़के ऐसी हो जाती है सडक में गड्ढे  या गड्ढों  में सडक है ..पता हीं  नही चलता और  घटिया निर्माण की पोल खुल जाती है ..आरोप -प्रत्यारोप का दौर  शुरू हो जाता है मानसून ..पूर्व ..की तैयारी का ढिंढोरा ऐसा   जोर शोर  से पीटते है कि  सब कुछ तैयारी है पर मानसून के आने पर सब टायं-टायं फिस्स  हो जाता है वही ..ढ़ाक के  तीन पात .........
मानसून का कहर जहाँ निचली  बस्ती में तबाही मचाता है भ्र्ष्टाचार का नया अध्याय शुरू हो जाता है .बाढ़  पीड़ितों  के नाम पर मिलने वाली राहत किसे मिलती है भगवान ही जाने बाढ़  पीड़ितों के मासूम  चेहरों ,दया की भीख भ्रष्टाचार ..के सामने बौनी लगती है ...
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मानसून का आना कहीं.ख़ुशी कहीं गम लाता है .......


संजय जोशी "सजग "

मंगलवार, 24 जून 2014

गोल के लिए किक जरूरी है.... [व्यंग्य ]


गोल के लिए किक जरूरी है....
[व्यंग्य ]

                फ़ुटबाल का गोल हो या अपने जीवन का कोई गोल हो किक का अपना महत्व है जिसने भी किक का महत्व नहीं  जाना वह जीवन में गोल हो गया है और किक मारने वाला ही  खिलाडी बाकी सब अनाड़ी समझे  जाते है मानसिकता यह है कि गोल के लिए कुछ भी करेंगे   और तुच्छ भी बन जायेंगे क्योकि  हमारा तो केवल  यहीं  मकसद  है गोल और गोल l किक मारने में शोहरत हांसिल करने के लिए सामजिक बंधन और मर्यादा को तोड़ना,स्वहित की भावना का विकास करना बहुत जरूरी है इनको नीति अनीति से  ,मान अपमान से कोई फर्क नही पड़ता अपना गोल पूरा करने के लिए हर हथकण्डा अपनाने को हमेशा  तत्पर   और चौकस रहते है सामने वाले की मजबूरी ,कमजोरी व सीधेपन  को भुनाने में कोई  कसर नही छोड़ते l
      
  एक नेताजी जो किसी जमाने में फुटबॉल खिलाड़ी थे मैंने  उनसे पूछा की फुटबॉल खेलते -खेलते नेता कैसे बन गए तो नेता जी हसंते हुए बोले किक मारने की  कला का उपयोग राजनीति  में जितने अच्छे से किया जा सकता है उतना फुटबॉल में नहीं  l खेल में तो भाई चारा रखना पड़ता है पर राजनीति में सब सिर्फ दिखावे का चाहिए जैसे हाथी के दांत खाने के और   दिखाने के और  होते है जनता  से वादे करो और  खूब स्वप्न दिखाओ और बाद में सब को किक  मार दो l फ़ुटबाल  में तो खेल भावना होती है पर राजनीति में केवल स्वार्थ की भावना कूट -कूट कर भरी   होती है और यही एक मात्र कारण होता हैं कि  यहां किक मारकर गोल करने की भावना  से कभी संतुष्टि नही मिलती और किक  पर किक  मारने और गोल पर गोल करने के बाद भी जी नहीं भरता l उनका कहना था कि  हर जगह किक मारने  का काम बखूबी होता है इतने  दल-दल में  भी चतुराई से किक मारकर गोल को अंजाम  दे  ही  देते है l इसी  कारण हम राजनीति के  इस जहां में पड़े है l इसलिए तो हम फुटबॉल में पीछे है पर कोई गम भी नही है सिर्फ नाम के लिए टीम भेज देते है
की   हमें  किक मारकर गोल करना आता है सावधान ! हम कहीं भी किक मारकर गोल बना सकते है हमारी आदत में शुमार है l हमारे यहां तो हर सरकारी व निजी संस्थान में किक मारने का रिवाज हैl 


                         नेताजी अपनी बात झिलाये जा रहे थे कि  फ़ुटबाल में तो पता होता है कि  किसके विरुद्ध गोल  मारने   का कितना समय है l  पर राजनीति तो अनिश्चितता का  खेल है कौन  अपने गोल के लिए किसे किक मार दे l जैसे श्री कृष्ण ने अर्जुन को  यह
ज्ञान  दिया  था कि  युद्ध के क्षेत्र में कोई अपना नहीं उसी तरह राजनीति में भी कोई अपना  सगा नहीं  कोई कभी भी दे   जाता  है दगा l नेताजी की बातों  में दम दिख रहा था और उनके किक मारने के अनुभव का निचोड़ का रस मुझे स्वादिष्ट लग रहा था  मैंने  भी उन्हें चने के झाड़ पर चढ़ाते  हुए कहा कि  वाह क्या ज्ञान दिया  आपने  हम  तो आपके मुरीद हो गए l
                किक मारने  की  प्रवृत्ति  राजनीति में  जन्मजात  होती है माँ की गोदी में  भी हम किक मारते रहते थे l  यदि अपवाद स्वरूप किक मारने की प्रवृत्ति नहीं  होती तो    खिलाङी को तो कोच या प्रशिक्षक सीखा देते है पर राजनीति में ठोकर खाकर और अति महत्वकांक्षा यह सब करने को मजबूर करती है और यह किसी भी स्तर पर और किसी भी  स्तर वाले को अपनी गिरफ्त में ले लेती है l

गुरुवार, 19 जून 2014

वाह रे प्याज

शूलिका -------
           वाह रे प्याज
  प्याज का कमाल है बड़ा धाँसू
 राजनीति में भी है घुसपेठ धाँसू
महंगे होतो सरकार बहाती है आंसू
भाव कम होतो किसान के बहते आंसू
बेचारे काटने वाले को भी देता आंसू
महंगे खाने वाले को भी आते आँसू
विपक्ष भी बहाता है घड़ियाली आँसू
सबका है चहेता सबको देता आंसू
                          ----------संजय जोशी 'सजग "------

बुधवार, 18 जून 2014

चाटुकारिता बनाम शिष्टाचारिता

चाटुकारिता बनाम शिष्टाचारिता

                 चाटुकारिता हमारे देश की एक बहुत बड़ी  लाइलाज समस्या है और वह सभी समस्याओं  पर भारी व कई समस्याओं की जड़ है ,हमारी विडंबना  है कि  किसी भी प्रकार से किसी भी स्कूल या विश्व विद्यालय में इसका  कोई  डिप्लोमा या डिग्री कोर्स नहीं  है फिर भी इसके लिए स्किल्ड लोगों  की एक बहुत बड़ी फौज खड़ी है उन्हें हर परिस्थिति में इसका समुचित  उपयोग करने की कला में महारथ हासिल है येन केन प्रकारेण अपना काम बना लेंना या अपना उल्लू सीधा करना इनका प्रमुख गुण होता है इन्हे सिर्फ अपने  काम का टारगेट ध्यान रहता है इन्हे मान अपमान जैसे शब्दों का ज्ञान तो भलीभांति  रहता है फिर  भी  सब नजर अंदाज करने की ईश्वरीय शक्ति से परिपूर्ण होते  हैं lबुद्धि जीवियों  और प्रतिभाशालियों  में यह अवगुण नहीं  पाया जाता है इसलिए  उनकी अलग पहचान होती  है -और वे इस मार्ग पर जाते ही नहीं है कविवर रहीम कहते है कि
पावस देखि रहीम मन, कोइल साधे मौन
अब दादुर वक्ता भए, हमको पूछत कोय

  वर्षा ऋतु आते ही मेंढको की आवाज चारों तरफ गूंजने लगती है तब कोयल यह सोचकर खामोश हो जाती है कि उसकी आवाज कौन सुनेगा। चाटुकारों  की बढ़ती पूछ परख से इसी  तरह बुद्धिजीवी  और प्रतिभाशाली  भी मौन हो जाते है और चाटुकार प्रखर  हो जाते है l हर क्षेत्र में इन्होंने अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया है l  ये ऐडा बन कर पेड़ा खाने का काम करते है और  मानते है कि  -
                     कानून मिले न कायदा l जी हजुरी में ही फायदा l l


   चाटुकारिता में कई तरह की किस्में  पाई जाती है ,पहले झूठी  तारीफों से काम चलते है , विरोधी के दुःख या संकट की खबर देकर ,और यह काम न आवे तो चरण चाटन  के ब्रम्हास्त्र का उपयोग किया जाता है चाटुकार  तो मजबूरी में कुछ पाने की आशा में यह क्रियाकर्म करता है ऐसे लोग कुछ  पाने की लालसा के कारण  धनिकों, उच्च पदस्थ एवं बाहुबली लोगों की और ताकते रहते हैं और उनकी चाटुकारिता  करने के लिये तैयार रहते हैं। उनकी चाटुकारिता में कोई कमी नहीं करते। उन्हें यह आशा रहती है कि यह लोग  उन पर रहम कर उनका उद्धार करेंगे लेकिन यह केवल भ्रम है।  वह अपना काम निकालकर भूल जाते और चाटुकारिता की सेवा बदलें कुछ  दे भी देते है तो वह भी न के बराबर। सच तो यह ऐसे चाटुकारों का जीवन  का इसी तरह गुलामी करते हुए व्यर्थ चला जाता हैं। जो पॉवर  में है वह अहंकार में है चाटुकार  उनकी और ताकता हुआ  ही जीवन गुजारता है और संकट होने पर साथ  छोड़ने में भी कोई परहेज नही करता यह विचित्र प्रकार का मनुष्य होता है दूसरा करे तो चाटुकारिता और स्वयं करे तो शिष्टाचारिता मानने वालों  की कमी नही है l चटुकारिता को पसंद और उसका आनंद लेने वाले जब पद विहीन होजाते है और न मिलने पर अवसाद के शिकार हो जाते है कई बड़े अधिकारी नेता ऐसे पीड़ित मिल जायेंगे  l
     चाटुकार हमेशा शाश्वत सिंद्धांत का पालन करता है और वह केवल उगते सूरज अर्थात
हमेशा जो पॉवर  और सत्ता में है उसी पर केंद्रित रहता है और जैसे तैसे उसका दामन
थाम लेते है l चाटुकारिता करने वाला और कराने वाला दोनों को ही आनंद की अनुभूति होती है जब तक धरा पर ऐसे लोग रहेंगे  तब तक " -चाटुकारिता " अमर बेल की भांति
फैलती रहेगी और बुद्धिजीवी  और प्रतिभाशाली को आत्म ग्लानि को महसूस करते रहेंगे , बेचारे कर भी क्या सकते है l

संजय जोशी 'सजग "[ व्यंग्यकार ]

सोमवार, 9 जून 2014

स्कूल गए हम [व्यंग्य ]




                                     स्कूल गए हम  [व्यंग्य ]


    आओ स्कूल चलें  हम  --अभियान के प्रचार प्रसार से प्रभावित होकर हम कुछ मित्रों ने स्कूलों  के भ्रमण का प्रोग्राम  बनाया कि  ऐसा क्या है आखिर इतना प्रचार किया जा रहा है और लोग बाग कन्नी काट रहे है ,कुछ तो नया होगा जब  इतना ही  ढोल पीटा जा रहा है सबने  सोचा चलो कुछ   नया अनुभव लें जिससे   अपनी सरकारी स्कूल  के प्रति धारणा  को बदलने में सहायता  मिलेगी ,और  फिर  हम दूसरों की   बदलेंगे --.  कि   कितना  है  दम   " आओ स्कूल चले हम.…… अभियान में l
                           हमारी मित्र मंडली ने एक दिन स्कूल के नाम पर ही समर्पित
कर   दिया कि   फ़टे में टांग अड़ा  फंसा कर ही रहेंगे , क्योंकि शिक्षा हमारी आने वाली पीढ़ी की  नींव है और वे राष्ट्र की अमूल्य सम्पदा  है  हमने कई स्कूलों की खाक छानी  और  कई छात्रों ,शिक्षकों  , व पालको से इस बारे में  चर्चा कर अपने दिमागी जाले झाड़ने  तथा ज्ञान और मत को बढ़ाने की चेष्टा की और उसमे सफल भी हुए l  सत्य हमेशा कड़वा ही होता है और सत्य परेशान हो जाता है पर पराजित नहीं  ,इसी बात को मद्दे- नजर रख कर प्रतिक्रिया देने का मन बनाया l जो किसे कड़वा,या  किसे मीठा लगेगा  क्या पता l हम सभी मित्रो के अनुभव का निचोड़ इस प्रकार है

                       हमने इस  पवित्र अभियान के उदेश्य के बारे में विचार विमर्श किया कि  आख़िर इसकी  जरूरत  क्या  है  ? एक मित्र बोला कि  यह एक कानून है कि हर बच्चे को शिक्षा मिले कोई  अनपढ़  न रहे   ,दूसरा मित्र बोला की स्कूलों  की दशा और दिशा सही कर ले तो भीड़ आ जायेगी , तीसरा बोला आज के महंगाई के युग में कौन   पसंद  करता है बच्चों  को निजी स्कूल में भेजना। पर क्या करें  एक पिता होने के नाते वह अच्छी शिक्षा देकर अपना फर्ज पूरा करता है और सरकार  का  केवल दिखावा मात्र है यह अभियान lजन नेताओं को सरकारी स्कूल से मतलब ही नही  उनके  बच्चे तो विदेश जाते है शिक्षा ग्रहण करने l
                      सरकारी स्कूल तो केवल औपचारिकता  मात्र रह गए है सरकार अपने कर्तव्य की इतिश्री कर लेती है , निजी स्कूलों में भारी भीड़   ,सीट  भी खाली नही है एक -एक सीट के लिए  जद्दोजहद ,प्रवेश बंद का बड़ा बोर्ड लगा है ताकि और डोनेशन की प्राप्ति हो सके और सरकारी  स्कूल खाली और वीरान पड़े है तभी आओ स्कूल चले हम जैसे अभियानों पर सरकार करोड़ो रुपये व्यय कर रही है पर   स्थिति वहीं ढाक  के तीन पात l कभी -कभी डर  लगता है कि कहीं सरकारी स्कूल विलुप्त न हो जाये  नहीं तो आने वाली पीढ़ी के लिए यह  पुरातत्व की सामग्री हो  कर  इतिहास का हिस्सा बन जायेगी , जैसे  हमारे प्रदेश मे से रोडवेज  गायब ही हो गई,उसी तरह  स्कूल  भी गायब न हो जाए l
    मध्यान्ह  भोजन भी सरकार का छात्रों की संख्या बढ़ाने का उपाय  हैं पर  यह भी विफल हो गया और छात्रों और पालकों  का विश्वास उठ गया कब  कौन सा जीव जंतु   निकल जाये खाने में l पालक कहते  है खाना ही सही न दे सके सरकार तो  वह शिक्षा क्या देगी l सरकारी योजनाओं  के नाम मोटे दर्शन खोटे ,हकीकत  से कोसों दूर l
                  स्कूलों की हालत बहुत खराब है गदंगी  की भरमार है भवन है तो शिक्षक नही है ,शिक्षक है तो भवन नही है अगर दोनों हैं तो छात्र नही है l कई जगह जान हथेली पर  रखकर जाना पड़ता है जब तक बच्चा वापस न आये  पालक परेशान रहते है l बेचारा शिक्षक ,सभी सरकारी काम  के बोझ तले दबा हुआ है पढ़ाने  के अलावा  सभी कार्य करना है किसी ने सही कहा  है कि  शिक्षक राष्ट्र निर्माता  होते है तभी तो शिक्षा के अलावा सभी कार्य  करना उसका कर्तव्य है उसका ही है  जहां  शिक्षक  का शिक्षा से कोई वास्ता नही ,पालक कैसे अपने बच्चे को ऐसे स्कूलों में भेजे ,  मूलभूत सुविधा का अभाव,ड्रेस ,किताबों  ,व अन्य सरकारी योजनाओं का लाभ जरूरत मंद को नही मिलना ,पग -पग पर भ्रष्टाचार  ने कइयों  के हक को मारा है यह खेल बदस्तूर चालू रहता  है यह  हमारी विडंबना ही  है और   "जब स्कूल  गए  हम , इस अभियान में नही है दम --,जन -जन का विश्वास हो गया है कम --छात्र, पालक ,शिक्षक को हरदम रहता  भरम ।

गुरुवार, 5 जून 2014

हम है दुश्मन पर्यावरण के …… ? [ व्यंग्य ]

०५ जून पर्यावरण दिवस के उपलक्ष्य में ----------
                           
                             हम है दुश्मन पर्यावरण के     …… ? [ व्यंग्य ]   


        आज विश्व में पर्यावरण दिवस मनाया जायेगा हमारे देश में भी मनाने का दिखावा किया जायेगा l विदेशों  में इसे गंभीर  हो कर असलियत में और हमारे देश में मात्र औपचारिकता की जाएगी ,  मनाना  है  इसलिए मनाते है और जानते है होना जाना क्या ? जो इसे ज्यादा  दूषित कर रहे है और करते रहेंगे वो ही सबसे  ज्यादा  इसका राग  जोर शोर से अलापते है  तथा  इस दिन झूठी शपथ ,लेक्चर ,पोस्टर आदि लगाकर अपने कर्तव्य की इतिश्री कर लेते है l जब तक  हम पर्यावरण को अपना धर्म नही माने  तब तक नई -नई  विपदा और  आपदा को आमंत्रण  देते रहेंगे l प्रकृति से हम सब कुछ  लेना ही जानते है देना सीखा  ही नहीं   क्या करै  अपनी संस्कृति जो भूल गए l बुरे काम का परिमाण बुरा ही होता है l

        एक पर्यावरण प्रेमी ने अपनी व्यथा को कुछ इस तरह व्यक्त किया कि  --हम ही तो है दुश्मन पर्यावरण के l  विकास के नाम पर जितने पेड़ कटवाए उसका कुछ  भी अंश   नहीं लगाया ,केवल वृक्षारोपण के नाम पर अपना नाम चमकाया ,फोटो ,वीडियो क्लिप ,और  समाचर छपने तक ही सीमित रखा जिस पौधे को रोपा उसका क्या  हश्र हुआ किसे चिंता  फिर उसी स्थान पर  किया जाएगा यह क्रम चलता रहेगा और कागज पर वृक्षारोपण  होता रहेगा बड़े बड़े आकर्षक  नाम से ये अभियान पुकारे जायेंगे  इतिहास के पन्नों  पर l पर  ये सब प्रकृति से खिलवाड़ ही  तो है ,हाथी के दांत खाने के और दिखाने के और होते है l

     पर्यावरण  के लिए सर्वाधिक घातक  पोलिथिन बेग ,डिस्पोजल  से हमे विशेष प्रेम हो गया है जीवन इन्ही पर आधारित हो गया दुष्परिणाम के बारे सोचने  की फुर्सत  किसे है ,दुकानदार से पोलिथिन मांगने पर शर्म नही गर्व की अनुभूति होती है l
       पानी चाहत में इस धरा को छलनी  कर  इतना दोहन कर लिया  है कि  ईश्वर  ही जाने l ,केमिकल व गंदे पानी ने जहां पवित्र नदियों को अपवित्र कर दिया  है पानी  तो अब आचमन के लायक भी नहीं   बचा  है सरकार शुद्धिकरण के बड़े -बड़े सपने  दिखाती है और हम देखते है जनता को बेचारी  मुंगेरी लाल बना दिया कि  सपने देखो और मस्त रहो  वाह हम कितने प्रगतिशील होते जा रहे है  सपनों  में l
,     बेचैन है चैन से सांस लेना भी दूभर है हर कोई बीमारी से ग्रस्त है सरकारें  व  जनता  बीमार है विश्व गुरु कहलाने वाला यह देश अपने सांस्कृतिक मूल्यों को छोड़कर विकसित राष्ट्रों द्वारा  अपनी पर्यावरण की सुरक्षा हेतु बंद किये उत्पादनों को बनाकर विदेशी मुद्रा के लालच में जनहित के साथ खिलवाड़ कर रही और निर्यातक बन कर इठला रहे है पर्यावरण का  हाल  बेहाल है फिर भी हम २१ वीं  सदी में जी रहे है यह क्या कम है l
                      पर्यावरण की चिंता करना फैशन  और आधुनिकता की निशानी है   अत; चिंता करते है ,ग्लोबल वार्मिग का रोना रोते है l  देश में कानून  तो है पर भ्रष्टाचार रूपी रावण  ने इन्हे  बौना कर दिया है पर्यावरण संरक्षण हमारा कर्तव्य और धर्म होना चाहिए परन्तु कुछ ने औद्योगिक क्रांति की दुकानदारी के नाम पर इस पावन उदेश्य की बलि चढ़ा दी है l ऊपर से पर्यावरण के प्रति प्रेम दिखाना और हानि पहुँचाना  इस लोकोक्ति को चरितार्थ करते  है कि  "जड़ काटते जाओ और पानी देते जाओ l
              पर्यावरण प्रेमी के  अनुसार इसकी कथा  और व्यथा अनंता है समय कम हैl
कहने लगे की हमें  यह कसम खाना पड़ेगी  हम  सुधरेंगे तभी जग का पर्यावरण सुधरेगा l इस हेतु चिंतन मनन नहीं  , कुछ करने की जरूरत है  और इस  क्षेत्र में कुछ कर गुजरने का मन करेगा उस दिन हम दुश्मन से दोस्त बन जायेंगे  पर्यावरण के .l मैंने कहा आप खामख्वाह  परेशान हो रहे है शासन प्रशासन  और जनता इस और गंभीर नही है तो आप जैसे लोग क्या कर लेंगे  ?आपके प्रयासों की  उनके कान  पर जूं तक नही रेंगती  है फिर वह  तनाव की मुद्रा में कहने लगे हम हमारा काम मरते दम  तक करते रहेंगे और पर्यावरण के दुश्मन की बजाय मित्र बनकर जागृति लायेंगे  l मैंने  उनकी पर्यावरण के प्रति अगाध श्रद्धा के प्रति नत मस्तक होकर प्रण लिया की इस और प्रयास किया जाना जरूरी है और करेंगे l