सोमवार, 22 अक्तूबर 2018

अधजल गगरी छलकत जाय [व्यंग्य ]

अधजल गगरी छलकत जाय  [व्यंग्य ] 

                                     
       आखिर कब तक चलेगा ये सिलसिला   ? बिना सिर पैर के कुछ भी बको  ?  लल्लन जी आये दिन  नेताओ के उल्टे पुल्टे बयानों से  परेशान होकर कहने लगे कि  गीता मे भी कहा गया है ।" न हि ज्ञानेन संदृशं पवित्र मिह विद्यते " अर्थात् - ज्ञान से अधिक पवित्र संसार में कुछ भी नही है ।कलयुगी गीता में  अज्ञानी  और ज्ञानी के बिच में  तथाकथित महाज्ञानी का पाया  जाता है l वह  कबाब में हड्डी और प्यार में सेंडविच की तरह खटकता है l वो सब कुछ  जानता है पर आधा  अधूरा  ज्ञान बात का बतंगड़ बना देता है अपने अज्ञान को मनोरंजन और  की धकेल देता है  जिससे न्यूज़ चैनल तो अपनी  टीआरपी बढ़ा लेता है और  सोशल मीडिया पर टाइम पास का एक नया  विषय मिलजाता है l अच्छे -अच्छे की किरकिरी करने में सोशल मिडिया पर मोजूद   तथाकथित ज्ञानवान कोई कसर नही छोड़ते lजिस स्थान पर नदी गहरी है, वहां का जल शांत होगा। इसके विपरीत जहाँ पानी कम होता  है हमेशा शोर करने वाला होगा।  यह  शाश्वत  सत्य है !   ज्ञानशील  मनुष्य हमेशा  शान्ति लिए रहता है  औए  अज्ञानी  शोर करता है  l
                    उनकी बात बिच में  काटकर वर्मा जी कहने लगे   "अधजल गगरी छलकत जाय  "पूरा भरा घड़ा कभी छलकता नही है परन्तु घड़ा जब आधा भरा हो तो वह छलकने लगता है । यही  हाल आजकल हमारे नेताओ का है l किसी भी विषय पर अध कचरे  ज्ञान से उलूल जुलूल बोलना राजनीति में फैशन सा हो गया है जनता भी चटखारे लेती है l बची कुछी कसर  डिजिटल  युग में विडियो से छेड़छाड़ कर उसे अगल ही दिशा में मोड़ दिया जाता है पूरा ही अज्ञानी बना दिया जाता है l  जो बोल दिया वो ही सही है उससे  टस में मस नही होते है अपनी बात पर अडिग रह कर यह  यह शोआफ़ करना चाहते है में सही सही हूँ l तर्क नही कुतर्क करता है  और सामने वाला सतर्क हो जाता है l अज्ञानी  से ज्यादा  खतरनाक होते - जबरन के  ज्ञानी बनने वाले l जबरन के ज्ञानी एक विशेष प्रकार के प्राणी अधिकतर  स्थान पाए जाते है जो  ज्ञानियों के स्पीड ब्रेकर का काम करते है l
यह इनका एक विशेष प्रकार का जूनून होता है --जबरन ज्ञान  बघारने का मोह छुटे नाही  इनसे l
                                     मैंने   कहा आप दोनों सही कह रहे है बड़बोले समझते है की उनके ज्ञान के आगे सब कुछ गलत है और इर्द- गिर्द मंडराने वाले  चमचे उनके झूटे ज्ञान पर वाह वाह करके चने के झाड़ पर चढाते और उसके मुगालते में और  वृद्धी करके उसे कहीं का नहीं छोड़ते है l जोश खरोश से वह अपने स्वयम अपने ज्ञान का कायल हो जाता है और उसमे महारथी हो जाता है l वह इतिहास बदलने से लेकर देश में विज्ञान के चमत्कार की तरह  कई चमत्कारिक  ज्ञान देता  फिरता है l वह ज्ञान बाटना  अपना अधिकार  समझता है  और  कोई ग्रहण करे या  न करे , हंसी का पात्र बनकर भी बेशर्म की तरह खीसे निपोरता है और अपने ज्ञान के  अहम में अँधा  होकर जीता है lरावण   , दुर्योधन  को भी को अपने ज्ञान का  घमंड था  पर   हश्र  क्या  हुआ ? सबको पता है  घमण्ड कांच के बर्तन की तरह होता है कभी चटक सकता है l  एक लोकोक्ति है कि बिना सोच विचार के जो बोलता है  वह अन्त में  दुखी होता है  पर इधर कुछ ऐसा नही है  l बोलना है तो  बोल दिया , हम तो बोलेंगे lइनका   कर भी क्या सकते हो  ?-जब अधजल गगरी छलकत जाय l

संजय जोशी "सजग "

विकास दिखता क्यों नहीं -- [व्यंग्य ]

विकास दिखता क्यों नहीं -- [व्यंग्य ]

                                         विकास दिखता  क्यों नहीं ?  महसूस होता नहीं  ?तो आखिर विकास क्या है  ? मैंने अर्थ शास्त्री से पूछा  तो उन्होंने बताया कि  देशों, क्षेत्रों या व्यक्तिओं की आर्थिक समृद्धि के वृद्धि को आर्थिक विकास कहते हैं  रोनाल्ड रीगन के अनुसार -विकास की कोई सीमा नही होती, क्योंकि मनुष्य की मेधा, कल्पनाशीलता और कौतूहूल की भी कोई सीमा नही है।वे आगे कहने लगे कि विकास तो एक सतत प्रक्रिया है पर राजनीति  के अन्धो को विकास दीखता ही नहीं है या यूँ कहे की पक्ष -विपक्ष को एक दूसरे का विकास सुहाता ही नहीं है l  जहाँ भूख से मरने वाले हो , भूखे सोने वाले हो सिर पर छत न  हो ,हाथो को काम न हो , ,शिक्षित बेरोजगारों की बड़ी फौज हो ,और किसान को अपनी उपज   का सही मूल्य न मिले ,ऐसे  विकास को  क्या कहेंगे ?
                     वे आगे कहने  लगे कि -योजनायें  कागज  तो पर बन पर  क्रियान्वयन में भ्रष्टाचार रूपी दीमक योजनाओं को चट  कर जाती है और विकास धरा पर यूँही धरा रह जाता है और वहीं यक्ष   कि प्रश्न कुछ विकास  हुआ ही नहीं?विकास की गंगा  बहा देंगे पर विकास  की गंगा सूखने लग जाती है और सिर्फ सूखा ही सूखा नजर आता है l रोड़ो का विकास तो दीखता है  पर बाकी  क्षेत्र रोड़े ही रोड़े अटकाए जाते है lअफसर और अधिकारी स्पीड ब्रेकर का रोल निभाते हैंl
   कल्लू बाबा से पूछा की विकास  दिखाई देता है तो  मुँह बिचकाकर और कंधे उचकाकर कहा कि 
पेट खाली हो तो कोई विकास क्या ,कुछ भी नहीं दीखता हैं  सिर्फ रोटी दिखती है l भूख और विकास का गहरा संबंध है  जिसकी  भूख  शांत नहीं  होती है उसे विकास देख  क्या  मिलेगा ? सबकी अपनी -अपनी भूख है   वह   उसे ही शांत करने में लगा है किन्तु एक कटु सत्य है कि भूख कभी मिटती नहीं है और भूख के अंधे  को हर और भूख और भूख ही नजर आती है l विकास भी एक भूख ही है जो   कभी संतुष्ट नहीं होती है और सही भी है संतुष्टि ही मृत्यु है l 
           हमारे  मोहल्ले  में राजू भइया है जो बेरोजगारी से परेशान है जब उनसे पूछा की  विकास हो रहा है दीखता है की नहीं तो कहने जब हमरा विकास होगा जब देखेंगे और  समझेँगे  की विकास किस बला का नाम है l अभी तो सब देख कर भी अनदेखा करते है  आप ऐसे प्रश्न पूछकर दिमाग की घंटी बजा देते हो l मार्निग वाक  पर सीनियर सिटीजन  से पूछा विकास दीखता है कि नहीं तो वे कहने लगे आम जनता से ज्यादा विकास तो नेताओं का  का हो रहा है  ,रोड़पती पार्षद ही करोड़पती बनकर इठला रहे है और बड़े नेताओं का क्या कहना आप सब उनका विकास तो जानते   ही हो l  और विकास  वहीं  का वहीं  रेंग रहा है और रेंगता रहेगा l व्यक्तिगत विकास और सर्वागीण विकास अलग अलग बात है l
 नगर के समाज सेवी   बांकेलाल जी जो पर्यावरण प्रति , बहुत जागरूक है उनसे जब जब पूछा तो कहने लगे विकास तो हो रहा है पर पर्यावरण तो ताक में रखकर किया गया विकास ,विकास नहीं विनाश है प्रकृति से खिलवाड़  की सजा जब वह देती है तो विकास डरावना लगता है सोचने को मजबूर करता है  कि आने वाली पीढ़ीको हम रसातल ले जारहे तो विकास को क्या कहेंगे l


                                मैंने कहा की विकास तो हो रहा है दिन   दूनी और  रात चौगनी रफ्तार से हो रहा है  दिखना या न दिखना दृष्टी दोष हो सकता है  नजरे  बदलने से नजारे बदल जाते है और विकास  ही  विकास दिखने लगता है पर कोई अपनी नजर तो बदले पर कोई बदलने को तैयार ही नहीं है इसलिए विकास दीखता नहीं है और दिखेगा भी नहीं lमैंने  अपने मित्र से प्रश्न  दागा  कि विकास क्या होता है तू  क्या जाने -----l तो वह कहने लगा जानना भी नहीं -मुझे क्या करना विकास से मेरा विकास तो तेजी से हो रहा है l विकास होता तो निरन्तर है पर दीखता नही सब की समस्या है l बाप द्वारा किया विकास  ओलादो को  गले नही उतरता है  तथा सरकार द्वारा किया गया जनता को l  और चाहिए का सिंद्धांत कभी पूरा नही होता है l असंतृप्त प्राणियों की भीड़ बढती जा रही है इस धरा पर -----विकास को अनदेखा करने वालो की l

संजय जोशी "सजग " [ व्यंग्यकार ]

प्यारे लगे बंगला --- (व्यंग्य)

प्यारे लगे बंगला ---   (व्यंग्य)



                             सरकारी महकमे में उच्च पद पर आसीन थे  शिखर जी  l उन्हें सरकारी क्वाटर  मिला हुआ था , उससे असंतुष्ट थे , वे बंगले के शौकीन थे l वे एक अदद सरकारी बंगले की जुगाड़ में लगे रहते थे l अपने कर्तव्य से ज्यादा समय बंगले को  हतिया कर  बीबी के सपने को पूरा करने के लिए जी जान से जुटे रहते थे l जिस पर उनकी निगाह होती थी ,उस बंगले पर  उनके साहब  डेरा डाल देते थे ,l वे  बेचारे ठन ठन गोपाल  बने  रहते  l बीबी बच्चो के ताने सुन सुन कर हताश और निराश रहते थे ,l इस टेशन में  कार्य  में गलती की अधिकता से  वे बड़े  साहब  को अप्रिय और खलने लगे  थे ,इसी कारण वे बंगले से दूर  होते  गये l  जब  भी मौका आता बड़े सर अपने  परम् प्रिय को  अलाट करवा देते  l शिखर जी को  मिलता बाबाजी का ठुल्लू l सरकारी बंगला क्यों लगता है इतना प्यारा ? तो वे कहते बिजली पानी और भी सुविधा  फ्री और झांकी  दिखती सो अलग ,  मैंने  कहा वाह रे झांकी बाबू   सलाम l 
                                   देर है पर अंधेर नहीं आखिर उनका सपना पूरा होता है  उन्हें नए साब की कृपा के  पात्र  हो जाते है , एक बंगला मिल जाता है  l  उसकी हालत देख कर उनका मन मसोस जाता है l अब वे उसे दुरुस्त और रंग  रोगन के  लिए सरकारी जुगाड़ में लग जाते है l येन केन प्रकारेण सफलता पा  ही लेते है l   शुभ मुहर्त में  "बंगला  प्रवेश "कर  जाते है l परिवार  में हंसी ख़ुशी का माहौल रहने लगता है l  उनके ऑफिस  के  छोटे बड़े अधिकारी जब उस बंगले में आते है तो जी भर के तारीफ करते है , वे  ऊपर से फुले नहीं समाते और अन्दर  ही अन्दर भय भीत होते रहे कि राजनीती चाल  चल कर  कोई इसे हतिया न ले l  सरकारी तंत्र ऐसे ही दाँव चलते  रहते है एक बंगले के लिए l नौकर शाही और लोक शाही सरकारी बंगले  का विशिष्ट  स्थान है l सबकी चाहत  सरकारी  बंगला  मुझे पर्मनेन्ट मिल जाये l इतना  प्यारा लगता सरकारी बंगला   मोह छूटे नाही l 
                            राजनीति में  चुने हुए और हारे हुए  प्रतिनिधियों में बगंला दवंद एक रूटीन  प्रक्रिया है  तू हटे तो में   फंसू  l पद मुक्त होने वाले नेता भी बंगले पर  कुण्डली  मार कर अंगद के पांव जैसे  डटे रहते है जब तक को सख्त  आदेश  न हो l सरकारी बंगले से इतना  प्रेम क्यों ? नियम कानून  है तो पालन  क्यों  नहीं करते ?बाद किरकिरी जरूरी लगती है ? केंद्र से लेकर राज्यों तक ऐसे  ही हालत क्यों है ? सरकार और जनप्रतिनधि दोनों ही   जिम्मेदार  है ?नैतिकता को ताक  में क्यों रखते है  ?उत्तर प्रदेश के बंगले रोज सुर्खियों में है l इसका सीधा साधा कारण यह है जनता और  सबको  फ्री फोकट का जो मिलता है उसी में सुकून मिलता है l आप का घर/बंगला  कितना भी अच्छा हो पर सरकारी बंगले का सुख  तुम क्या जानो रमेश बाबू  ? इस लिए सबको अच्छा लगता है सरकारी बांगला l इसीलिए तो सब कहते है सरकारी  बंगला ही मोहे प्यारा लगे l 

संजय जोशी 'सजग 

कदम का दम [व्यंग्य ]

कदम का  दम [व्यंग्य ]
                              
                        फूँक फूँक कर कदम ' रखने  के बाद भी  कदमो को पीछे करना कदमो की तोहीन है  ? ,जिसके कदम में दम  है  उसका क्या ? कदम का ही दम  निकल जाए तो कदम बढ़ाने वाले  दोष क्या ?,जरूरी ही नहीं की हर कदम  ठोस हो जो  टस से मस ही न  हो ,कड़े  और ठोस कदम कभी आगे पीछे नहीं होते l इसलिए  कड़े कदम उठाने की रिस्क  बिरले लोग ही उठाते है l आगे कुआं  और पीछे खाई हो  , तो कदम सहम जाते है l दोनो  हाथो में लड्डू हो तो कदम लचर हो जाते है l ये तो अच्छा है  कि  हमारे कदमो  में ट्यूब लेस टायर ईश्वर की देंन है नहीं तो उनके कदमो  की हवा  तो रोज निकलती है वैसे ही  हमारी  भी निकलती रहती l हमारे कदम  मार्निगवाक्  लायक भी नहीं रहते l जहां कदमो और मुकदमो की भरमार हो वहां कदम  ठहर जाते या बहक  जाते है l बढ़ते  कदम " कदम चूमना " की और अग्रसर हो जाते है l   खर्राटे   लेने वालो की  नीद उड़ा  देती है,  कुछ कदमों की  आहट l 

                              अब प्रश्न ये उठता है  कि कदम किसके इशारे से चलते  है ?मन की शक्ति कदमो को आगे और भय पीछे हटाता है l सीधे  सरल कदम मंजिल तक आसानी से पहुंचते है l शराबी के कदम लड़खड़ाते है उसे गटर में धकेल  देते है l  कदमो के प्रति ईमानदारी कदमो को  थकने नहीं देती है l चोपाये और दो पाये के कदमो का उदेश्य अलग अलग होता है  स्वार्थ अपना - अपना l चोपाये के कदम जब दौड़ लगाते है तो हमला और बचाव दोनों समाहित होता है l दोपाये  के कदमो  की दौड़ सिर्फ होड़ के लिए होती है l कुछ तो सिर्फ दुबला बने रहने के लिए अपने कदम बढ़ाते है l राजनीति में अपने  कदमो  की अपनी अपनी व्यख्या दी जाती है चाहे वे  उलट -पलट दिखे l इनके कदम कभी थकते भी नहीं है और मंजिल पर भी  पहुंचते  नहीं है l मुक्ति बोध के शब्दों में --
मुझे कदम-कदम पर
चौराहे मिलते हैं
बाँहे फैलाए !! 


 इसी तरह   कदम कदम पर  मुँह  फाड़े  खड़ी है समस्याएं  ,को दूर करने के लिए समय  समय पर कई तरह के कदम उठाये जाते है एक साथ   उठाये गए कदमो की ताल में  वे बेताल हो जाते है l  बेताल कितना उलझाता  है विक्रम को चक्रम  बना देता है ,तो जन सामान्य  का  क्या ?वह  पहले ही उलझा हुआ है l  कदमो की ताल के  शोर जनहित के मुद्दे  यूँ ही  दब जाते है l किस्म किस्म के कदम है जैसे -कड़े कदम,  बड़े कदम ,तेज कदम ,भरी कदम ,ठोस कदम ,पहला  कदम ,आखरी  कदम ,असरदार कदम ,सोचा समझा कदम  और साहसिक कदम आदि , छोटे कदम आदि ,ऐसे कदमो का कोई अंत नहीं  है  कदम दर -कदम चलते रहते और कब उनका  दम निकल बेदम हो कर  ये निरीह हो जाते है और हम ठगे  से रह जाते है l 
              एक कविता के बोल है कदम कदम बढ़ाये जा, खुशी के गीत गाये जा यही उसूल होना चाहिए ,जीवन में बढ़ते कदम का बहुत महत्व है l निरशा या  डर में ही आदमी  अपने कदम पीछे करना मजबूरी  हो सकता है  या कोई  नई  खुरा  पात   ही हो  l कदमो का   चलना जगागरूकता का  संदेश देता है l जाग  कर  रुक जाना ही  जागरूकता है क्या ?

संजय जोशी 'सजग 

ओस चाटने से प्यास नहीं बुझती---[व्यंग्य ]

ओस  चाटने से प्यास नहीं बुझती---[व्यंग्य ]
                                      ओस चाटने से जिस प्रकार प्यास नहीं बुझती उसी प्रकार एक पैसा कम करने से बुझती नहीं आस l जब रूपये का ही  अवमूल्यन हो गया तो बेचारे पैसे की क्या औकात होगी ? दो कौड़ी के आदमी से बदतर हालत तो एक पैसे ने  कर दी,इतनी कम कीमत तो sms  भेजने की भी नहीं है l जो अर्थ का ज्ञान रखता है  वह जरूर हताश और निराश हुआ होगा कि  एक पैसा कम करके हमारी इज्जत को ही बट्टा लगाया, पर क्या करें ? पैसा बाजार से गायब,अब तो रूपये का जमाना है lआज तो दादाजी भी फॉर्म में आ गए कहने लगे हमारे समय का गाना  है" एक पैसा दे दे बाबू" अब तो  भिखारी भी भीख रूपये में मांगने लगे है और यहाँ   एक पइसे की लालीपॉप देकर हम सबके मंसूबो पर पानी फेर  दिया है  एक तरफ तो  भीषण गर्मी में   मानव के साथ -साथ मशीनों को भी लू  लग रही है और सरकार पानी फेर कर पानी की बर्बादी कर रही है l इस एक  पइसे  के चक्कर  सोशल मीडिया और मीडिया पर कितने लोगों  ने अपनी कितनी ही कैलोरी ऊर्जा का नाश किया होगा इसकी कल्पना मुश्किल है  l पढ़ने वालों को पसीना  आया पर पर फिर भी   कानों  में जूं  तक नहीं रेंगी न कोई उत्तर आया कि एक पइसा गलती से कम  हुआ या जनता के दिल में  लगी आग में और  तेल डाला l 
           सबसे  बड़ी  उपलब्धि यह रही कि  एक पैसे का सिक्का नई पीढ़ी को  देखने को मिला की एक पैसे का सिक्का  भी होता था जो अब पुरातत्वीय सामग्री  बन चुका है अचानक इसकी किस्मत  चमकी  जिधर देखो और सुनो  एक पैसा ही दिखने और सुनाई देने  लगा l हमारी बचपन की बहुमूल्य  मुद्रा को समाचार पत्रों  की हेडलाइन  बनता देख दिल आज बाग  बाग़  हो गया l  गर्मी में भी ठंड का एहसास हुआ l 

इस एक पैसे की कमी से देश में  हताशा के माहौल को कुछ  दिलदार लोगों  ने मनोरंजक ना  दिया -कुछ ने तो इस बचत से म्यूचल फंड में निवेश करने तो कुछ ने इस राशि की  एफडी बनाने का मन बना लिया  तो किसी को फिल्म  का डायलॉग  याद आने लगा -एक पैसे की कीमत क्या  समझो  रमेश बाबू ,एक महाशय ने लिख  डाला कि  - 1 पैसा पेट्रोल सस्ता करना वैसा  ही है,जैसे-"तूने " काजल लगाया और रात हो गयी। परेशानी भी बहुत है इस बचत को  कहाँ इन्वेस्ट करे सीए  भी नहीं  बता पा  रहे है l 

अर्थशास्त्री  हक्के बक्के है अनर्थ शास्त्री भी भौचक्के  है कि  आखिर गलती से इतनी  बड़ी 
छूट देने की गलती कैसे हो गई चुनाव के पास  आते आते कच्चे तेल के भाव का बढ़ना ,जिससे ऐसी आग लग जाती है अच्छे -अच्छे  झुलस जाते हैl जो भी हो किस्मत तो  जनता की ही खराब रहती है दूध की जली  छाछ को फूंक -फूंक  पीती है फिर भी जल ही जाती है ,तेल की आग हो या मंहगाई की आग l 
              यह गाना जनता को  मुँह  चिढ़ाता है पैसा पैसा  क्या करती है पैसे पे क्यों मरती है ? और  जमाने  के  लिए -न बाप बड़ा न भईया सबसे बडा  रुप्पया l तो फिर जनता के साथ भद्दा मजाक क्यों ?एक पैसे का क्या हिसाब ?

  संजय जोशी 'सजग "

होमवर्क का हेडेक [ व्यंग्य ]

होमवर्क का हेडेक  

 [ व्यंग्य   ]



      होमवर्क  का हेडेक गर्मी की  छुट्टियां  में भी भी पूरी  की -पूरी छुट्टी में बच्चो को बेचैन करता है  l  तकरीबन  पढ़ने वाला  हर  बच्चा ,चुन्नू -मुन्नू हो या गिन्नी -बिन्नी  होमवर्क नाम की बीमारी से ग्रसित है  बच्चों की डिक्शनरी में होमवर्क शायद सबसे डरावना शब्द है। बेताल की तरह यह  भी  इनका पीछा ही नहीं  छोडता घर में प्रवेश करते ही आधुनिक मम्मियों द्वारा यक्ष -प्रश्न कितना होमवर्क दिया ? बेचारा बच्चा हताश होकर बताता है कि  इतना -इतना दिया है उसके बाद उसकी मम्मी की सुपर प्लानिंग चालू  जाती है में एक घंटे सो रही हूँ तुम सब  होमवर्क  पूरा कर लेना नही तो खेलने नही जाने दूंगी बेचारा बच्चा खेलने जाने के मोह में जी तोड़ मेहनत कर होमवर्क पूरा करता है खेलने जाने के लिये मानसिक रूप से अपने आप  को तैयार करता है और  अगला आदेश फिर प्रसारित कर दिया जाता है जल्दी आना....ट्यूशन  जाना है इससे बच्चों की क्रिएटिविटी, सोचने-समझने की क्षमता और कल्पनाशक्ति तेजी  से घट रही है। वे समझने के बजाय रटने का तरीका अपना रहे हैं।यूरोपीय देश तो होमवर्क से इतना ऊब चुके हैं कि उन्होंने इसे पूरी तरह खत्म करने की दिशा में प्रयास शुरू कर दिया है l हमारे देश में और भी कई समस्या है इसके बारे में कौन सोचे ? बच्चा वोट देता है क्या ?हम तो उसकी ही  सोचते हैं जो वोट देता है तुम बच्चो कौन  से खेत की मूली हो ?

  
                     तनाव में खेलने का प्रयास करता है,अगला टारगेट जो उसे पूरा करना है 
अब वह मम्मी की गिरप्त से छूट  कर पापा के कटघरे में आ जाता है फिर रिविजन  का 
प्रोग्राम चालू  हो जाता है …क्या करे हैरान परेशान है इस होमवर्क ने तो पूरा बचपन ही
धो डाला। समर वेकेशन हो या कोई सा वेकेशन  होमवर्क का खतरा हमेशा मंडराता रहता है  यह होमवर्क नाम  की बीमारी ने बच्चो को क्या माँ और बाप की आजादी के साथ भी कुठराघात कर रखा है l कोर्स से ज्यादा होमवर्क l चुन्नू -मुन्नू हो या गिन्नी -बिन्नी का कहना है कि  होमवर्क नहीं  करो तो पनिश्मेंट  मिलता है और बच्चों और टीचर के सामने 
इमेज खराब का  डर सताता रहता है ,हमारा तो बचपन ही छीन डाला सही है बच्चो की व्यथा से मैंने  भी सहमति जताई की सुनहरा बचपन---दुःख भरा हो रहा है l 

  एक पीड़ित  आधुनिक  माँ ने अपने भाव प्रकट करते हुए कहा कि बच्चों  पर मानसिक दबाव कम करने के लिए हवाई किले तो बहुत बनाये जाते है इसके लिये  न जाने कितने सेमिनार  और वर्कशाप के आयोजन होते है पर सिर्फ औपचारिक होकर रह जाते है तनाव तो बच्चों  के हिस्से में ही रहता है ,घर वाले सोचते है कि  ज्यादा  देर तक स्कूल  में  रहे ताकि घर में शांति रहे और स्कूल  वाले सोचते है पढ़ाई का काम स्कूल  में कम से कम हो और बच्चे के पेरेंट्स  ही सब करवा दे lआज बच्चों का होमवर्क व  प्रोजेक्ट वर्क पेरेंट्स के लिए सिरदर्द बनता जा रहा है l इसीलिये  तो आजकल एडिमिशन के समय पेरेंट्स की योग्यता  ,और जेब कितनी भारी है यहीं देखा जाता है l 
    निजी स्कूल के टीचर  जी का कहना है कि कोर्स तो  आराम से  पूरा हो जाता है होमवर्क तो बच्चो में कैलिबर बढ़ाने के लिए देते है और सरकारी स्कूल के मास्टर जी का  कहना है हमारे यहां तो न स्कूल में कुछ करवाते है और न ही होमवर्क देने का समय है हमारे पास दूसरे सरकारी काम भरपूर है सब  छात्र  तो ईश्वर पर आश्रित है l 

                   कई बच्चे तो उच्च शिक्षा प्राप्त करने के पहले ही डिप्रेशन के शिकार हो जाते है l ये होमवर्क ने बच्चो का सुख चैन  सब  छीन रखा है और बच्चे कोसते होंगे  कि 
है  होमवर्क का चलन चलने वाले मैकाले ,तूने बच्चों  पर कितने सितम ढहाये,तुझे क्या मिला बच्चों  का बचपन छीनने वाले चेहरे  की हंसी को मत समझ हकीकत-
ऐ होम वर्क  तुझसे  कितने परेशां  है हम सब -----l 
                            
                            
संजय जोशी "सजग " [ व्यंग्यकार ]

गधे और गुलाब जामुन [व्यंग्य ]

गधे और गुलाब जामुन [व्यंग्य ]


                    बात भी अब सही लगने लगी है कि घोड़े को घास नहीं  और गधे गुलाब जामुन और च्यवनप्राश खा रहे है l घोड़ों  और गधों  की अपनी अपनी किस्मत है l घोड़े  के पिछाड़ी और बॉस के अगाड़ी नही आना चाहिए,गधे के बारे में ऐसा  नही कहा है जबकि दुल्लती तो गधा घोड़े से ज्यादा  ही मारता है फिर भी  घोड़ा  ही बदनाम है l जो है नाम वाला वही तो बदनाम है l शहरों में  असली गधे तो विलुप्त से हो गए है लेकिन फिर भी इसकी प्रजाति के लोग बहुतायत में पाए जाते है कालिदास के शहर  में गधा पुलिया है और  आज भी इस  नाम से जाना जाता  है यह पुल l कितनी ही ,नगर सरकार  आयी और चली गई पर किसी  ने इस नाम को बदलने की हिम्मत नही जुटाई और गधों  की याद में आज भी प्रसिद्ध है और तो और गधो का मेला भी लगता है जिसमे  नेता, अभिनेता के नाम के गधे  बिकने आते है ,उनकी फोटो शॉप  होती है और समाचारों और न्यूज़ चैनल की हेड लाइन बनती है l मनुष्य और  गधों  का गहरा  नाता है ,हर मनुष्य में गधे  का अंश हो सकता है पर  मनुष्य का अंश गधे में नही l 
  गधे हमारी प्राचीन  धरोहर है  होली में इसका  विशेष महत्व रहता है  बिना इसके होली खेलने वालों  को मजा नही आता हैl  होली में आदर्श की तरह  कोई अपने आप में   गधा  होने में संकोच नही करता है l ज्ञानवान का प्रतीक रावण भी गधे के मोह से  अछूता नही था उसके सर पर गधे का मुँह इठलाता रहता था l अपने आपको  शेर मानने में शर्म नहीं  आती है तो गधे  जैसे कर्मशील प्राणी से परहेज क्यों ? प्राइवेट  सेक्टर में काम करने वाले को, बेचारे को गधा  समझ लिया जाता है  बस काम और काम l राजनीति  में  भी कार्यकर्ता को यही प्राणी समझा  जाता है और जनतन्त्र में जनता को गधा माना  जाता है जो सिर्फ वोट दे बाकि हम है ना l 
  कभी -कभी लगता है कि काश गधे नही होते तो लोकोक्ति और मुहावरे की कमी हो जाती -
जैसे -काबुल में गधे नही होते,ज्ञान तो दिया नहीं लेकिन गधे का उपनाम देकर जीवन भर के लिए उपकृत भी  कर दिया। झगड़े में एक दूसरे को कहने में नही चूकते की गधा समझ रखा है मेरे दोस्त के पिताश्री हमेशा यह कहते पाए जाते है कि गधे   ही रह जाओगेl गायब होने लिए -जैसे गधे के सिर से सींग लोकोक्ति ठोक दी जाती हैl एक और नाइंसाफी देखिये- जरूरत के समय गधों को भी बाप कहना पड़ता है। एक  सीरियल में  गधाप्रसाद  भी हैl  शिक्षा ,संस्कार , मनोरंजन  और राजनीति  में भी यह अपनी गहरी  पैठ रखता है l गधा सबसे भारी  शब्द है शेर  से नही आजकल गधे से डर  लगने लगा है l  
 इस बार  गधा छा गया और भूचाल आ गया गधे की ताकत का अहसास हो गया सब मुद्दे धराशयी हो गए और चल पड़ी गधों  पर बहस मतदाता  टुकुर टुकुर देख रहा है  हो सकता है इस बार गधा न बने गधो की बहस ने आँखे खोल दी होगी ?
        गधे की महिमा अपरम्पार है इसके बिना जीवन अधूरा है माड़साब व मास्टरनियों का तकिया कलाम है बच्चे उन्हें गधे ही नजर आते है l गधा एक निरीह बोझ तले दबने वाला प्राणी  है  कदम कदम पर इस बिरादरी के गुण  वाले पाए जाते है स्त्रिलिग़ और पुर्लिग दोनों में ही  इसके गुणों का समावेश रहता हैl  यह प्रकुति प्रद्दत गुण है किसी में  बोझ सहने की अपार क्षमता होती है तो किसी में बोझ देखकर दुल्लती और  ढेंचू  ढेंचू  करने लगते है l बॉस को बोझ सहने वाले गधे ही पसन्द आते है ढेंचू  ढेंचू करने वाले नहीं l 

संजय जोशी 'सजग