मंगलवार, 1 अगस्त 2017

राष्ट्रीय कविश्री नटवरलाल स्नेही -जन्मशताब्दी [ जन्म ४ जुलाई १९१७ ]

मालवमाटी के




राष्ट्रीय कविश्री नटवरलाल स्नेही -जन्मशताब्दी [ जन्म ४ जुलाई १९१७ ]
समारोह जाने का अवसर मिला - एक राष्ट्र कवि के बारे जाना और यह पाया हमारे देश में साहित्य कारो की उपेक्षा सरकारे हमेशा करती आई है l तिकड़मों से दूर रहने वाले गुमनाम हो जाते है l राष्ट्रीय कविश्री को हार्दिक नमन

मंगलवार, 13 जून 2017

टच से टच में रहना [व्यंग्य ]

टच से टच में रहना [व्यंग्य ]



           टच स्क्रीन मोबाइल का अविष्कार क्या हुआ ,अब समाजिक ताना बाना  टच पर निर्भर हो गया है या हम यह कहे कि मेलजोल की संस्कृति बनाम टच संस्कृति हो गई है हालांकि कुछ गांव  इससे आंशिक रूप से अछूते है l दुनिया  मुठ्ठी में की जगह अब टच स्क्रीन पर सिमट गयी lसामाजिक  संबंध इसी पर निभाए जाने लगे है l जन्म ,.मरण और अन्य किसी भी प्रकार की सूचना पोस्ट करो और भार  मुक्त हो जाओ l  टच से टच में रहने के आदि हो गए हैं l बधाई संदेश और श्रद्धांजलि का कार्यक्रम यहीं निपट जाते है l दोनों और से सूचना का आदान प्रदान टच से हो जाता है l आजकल तो मोबाइल ही सब कुछ है जो हमारे साथ सदैव बने रहते हैं मोबाइल महाराज कब संजय की तरह उवाचने (बोलने) लगे कोई नहीं बता सकता। हमारे महाकवियो  ने ईश्वर के  इतने रूपो का वर्णन नहीं किया होगा तथा उनकी लीलाओं का उदगान नहीं किया होगा, उनसे ज्यादा तो आज के बहुरूपिये  मोबाइल को नये-नये रंगो, डिजाइनो में पेश किया है।नारद जी  के जमाने  में यह सुविधा होती तो उन्हें सब लोको में भटकने से मुक्ति मिलती l 
 इससे पहले हम सब ईश्वर का  ध्यान कर  सोते थे और उठने के बाद भी ईश्वर का ध्यान करते थे अब सोने से पहले  टच के दर्शन करते है और उठते ही पहला काम टच का दर्शन करना  हमारी नियती हो गई है l कब कोनसा मैसेज टपक जाये  यही चिंता सताये रहती है और इसी गुन्तारे  में  थोड़ी -थोड़ी देर में मैसेज देखने की आदत पढ़ गई और हम धन्य हो गये कि  हमारा  चित हमेशा  चैतन्य रहने लगा l कहीं सक्रिय हो या न हो पर टच स्क्रीन पर कई गुना सक्रिय रहने लगे है l वरिष्ठ नागरिक पूर्णतया अपनी आचार संहिता का पालन करते है बाकी की  तो वही जाने l हमारी व्यक्तिगत स्वतंत्रता को छीन लिया है। यानि के जीवन का क्वालिटी टाइम या प्राइम टाइम जिसे हमें अपने परिवार, बच्चों व समाज में बिताना चाहिए वह मोबाइल पर व्यर्थ किया जाता है। नेट डाटा फ्री बांटकर कम्पनियाँ और ज्यादा असामाजिकता का विस्तार कर रही  है इसी में उलझे रहो l  ऐंटी रोमियो स्क्वाड  जब  से सक्रिय  हुआ  ने  टच  से टच में  रहने का चलन और फल फूल रहा होगा l 
                      टच का स्क्रीन  ज्ञान के आदान प्रदान याने  की इधर का उधर चस्पा करने  की होड़ लगी रहती है कुछ तो बिना देखे ही फारवर्ड कर  देते है  lग्रुप में  ऐसी फजीहत आये दिन होती रहती है माफ़ी मांग मांग कर अपने को मिस्टर क्लीन बताने की मशक्त करते रहे है क्या करे  टच से टच  में रहने की आदत जो पड  गई l दिल से नहीं  तकनीकि रूप से जुड़ाव हुआ है l  झूठ के प्रतिशत में बढ़ोतरी इसी से हुई है lटच से टच  में रहना एक कर्मशील  व्यक्तित्व की निशानी बन चुका है ,अपनी -अपनी   हैसियत  के आधार  पर कोई एक तो कोई एक से अधिक  से यह  सामाजिकता  निभा रहा है तथाअपना स्टेटस   मेंटेन करहा है  क्योकि  यह आजकल   स्टेटस सिम्बॉल हो गया है l दिल है कि  मानता ही नहीं  और दिल करता है  टच से टच में रहूं l

शनिवार, 3 जून 2017

है ! वोटरों ,अवगुण चित न धरो [व्यंग्य ]


है ! वोटरों ,अवगुण चित न धरो [व्यंग्य ]

बेताल ने विक्रम से प्रश्न किया कि हैं  राजन ,गुण और अवगुण में कौन श्रेष्ठ है? राजन बोले  हर युग में गुणों  का स्थान सर्वोपरि है।  यह सुनकर बेताल रावण की हंसी की तरह जोर से  हंसा  कहने लगा कि कलयुग में तो  अवगुण  ही गुण  पर हावी है गए जमाने  गुण के  आज में आपको  कलयुग में  गुण -अवगुण के हाल बताऊंगा ,है राजन आप चुपचाप सुनते जाइये --राजतंत्र से लोकतंत्र स्थापित हुआ जबसे  राजनीति अपने चरम पर है  बुद्धिजीवीयों  ने  अपनी आंखें बंद कर रखी है और मनुष्यों में  एक विशेष  तरह की  नस्ल नेताओं  की होती है l इनमें  अवगुणो की खान होती है कलयुगी राजनीति इसके बिना अधूरी है l  गुणों से लेस नेता  भी  अपवाद स्वरूप पाए जाते है इनकी संख्या नगण्य है और दिनों दिन  इनकी संख्या घटती जा रही है lजो लोकतंत्र के लिए  घातक है l  नेताओं के खौफ से हर कोई कुपित  है l इन सबका जिम्मेवार कौन है? और सबसे बड़ी बात यह कि सबसे बड़ा दोषी कौन है? जनता  जो इनको झेलती है वो ,या वोटर ?

                          राजा  विक्रम  चुपचाप  बेताल की  सत्य कथा सुनते जा रहे थे और मन ही मन  कुपित हो रहे थे ये सब क्या हो रिया है ? कब तक चलता रहेगा ?फिर भी बिना ताल के बात सुनना राजन को भारी  लग लग रहा था l भारत वर्ष   में दिल्ली शासन का  एक मुखिया है l जो आदर्श राजनीति  करने के लिए अवतरित हुए थे उनके साथी भी ऐसे ही मिले  ,कहते है ना  अवगुणों  वालो की दोस्ती जल्दी होती है l  चुनाव लड़े , जनता ने भरपूर जनसमर्थन दिया पर समय के साथ उनका समूह विवादो के घेरो  में आ गया  , आपस में लड़ने लगे उन  पर  कई तरह  के आरोप  लगा रखे  है आरोपों के जनक  ही आरोपों के घेरे में आ गये ? उनका पूर्व मंत्री रोज -रोज नए खुलासे  करता है l जिससे वे बड़े खिन्न है  और  अभी तक कोई   प्रति उत्तर नहीं दिया है  प्रजा भी उनके  मुखारविंद से सच  जानने को उत्सुक है ? पर उनके  मुख पर ताले  पड़े   है   l जनता ने ही चाव से उन्हें चुना था अब वे चूना लगा रहे है, जनता ऐसा मानने लगी है जब गलत  नहीं तो डरना क्यों ? सबसे  ज्यादा  आरोप  लगाने ,सब को  गुणहीन, भ्रष्टाचारी समझने  वाला ,सबसे अधिक ट्वीट और प्रेस कांफ्रेंस करने वाला जब अचानक मौन  हो जाता है तो दाल में काला नजर आयेगा   ?जनता भी अवगुणो से परिचित होने लगी है और ठगी सी महसूस करने लगी है l  और वे मन  ही मन अपने पोल खुलने से ,अपने सिद्धांतों की  बलि चढ़ने से अपनी साख को बचाने के गुन्तारे   में होंगे  पर क्या करे ?
बेताल  लगातार राजन को बताये जा रहा था कि वे राजनीति बदलने आये थे  खुद बदलकर उसमे समा  गये ,जनता के  अरमानो पर पानी फेर दिया l धरना दे  दे कर खुद भी धर,ना सिख  गये ,राजनीति  काजल की कोठरी है जो  जाता है काला हो ही जाता है l रेन कोट भी शर्माने लगे है, मुखौटे हटने लगे है ,ऊँची गर्दन करने वाले नीची करने को मजबूर है ,अपनों ने  ही लूटा l  है राजन आप तो न्याय और सत्य के संरक्षक हो , आप ही बताये -ऐसा करना कहाँ  तक उचित है ? वोटरों का विश्वास तोडना ,  चुनावी वादे तोडना ,झूठे सपने दिखाना।एक अच्छे शासक में अवगुण नहीं गुण होना चाहिए l अगले चुनाव में  वोटर के सामने  कहेंगे -है ,वोटरों !अवगुण चित न धरो l वोट हमको ही करो l  राजन कहने लगे  कि जनता तो जनता है सबको सबक सिखाना जानती है l अवगुणों पर ही चित धरती है l 

संजय जोशी " सजग "

मालवी हायकू

मालवी हायकू 
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१ 
झूठो सामान 
हांच री दुकान में 
बिकतो गयो 
==============
2
 
वादरो  रोयो 
म्हारी आँखा में आलो 
पाणी आयो 
===============
गोधूलि सांज 
चंदन जैसो धुरो 
माटी री गन्ध 
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तालाब सुख्या 
चिड़ी हाफडे ,पिये 
कटोरी पाणी 
==============
हाँच कड़वो 
रूपारो लागे झूठ 
बाजी  में जीत 
==============

 तपी धरती 
लाल अंगार बणी 
झाड़का छाँव 
===============
भूल्या तेवार 
आपसी व्यवहार 
करे व्यापार 
================
८ 
तीखो  तड़को  
घणा याद आवेरे 
हरा झाड़का 
=================
 म्हारी मालवी 
अस्तर लागे  मीठी
 गोल री ढेली 
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10 
सबसे न्यारो 
जगत  में रुपारो 
म्हारो मालवो 
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संजय जोशी "सजग "

बुधवार, 24 मई 2017

जश्न पर प्रश्न [व्यंग्य ]

                           जश्न  पर प्रश्न [व्यंग्य  ]

                         
               एक बार एक शिष्य ने अपने गुरु से पूछा कि  जश्न किसे कहते हैं ? गुरूजी बोले -अपने  वादे और सपने पूरे होने  के उपरांत ख़ुशी मनाने के लिए आयोजित  कार्यक्रम  को जश्न   कहा  जाता है   शिष्य ने  फिर प्रश्न  दागा कि  अगर राजा खुश है और प्रजा दुखी,  ऐसे  में जश्न मनाया जाता है उसे क्या कहेंगे  ?गुरूजी बोले  इसे तो ख़ुशी का ढिंढोरा पीटकर प्रजा के दुःख से मुंह मोड़ना कहेंगे ऐसे में प्रजा पर दुखों  का बोझ और बड़ जाता है ,असंतोष  की भावना का विकास होता है ,गुरूजी कहने लगे जश्न तो युगों युगों   से मनाते आ रहे है राजा ,प्रजा का धन पानी  की तरह  बहाते  है ,चमचो और चापलूसों  को उपहार और सम्मान  मिलता है और प्रजा यह सब नौटंकी मूक दर्शक बनकर देखती रहती है,  जश्न अपने परवान पर चढ़ता रहता है  l
   गुरूजी ने जश्न को कुछ इस तरह बताया  कि सामाजिक व पारिवारिक  जश्न  हमें  सुकून देते है वहीँ  राजनीतिक  जश्न   का मतलब ,सजीवता का अहसास है समस्याओं का उपहास है अपने वादों का परिहास है l जश्न से जलवा बिखरता है और झूठ और निखरता है जश्न को नाकामियों का सौंदर्य शास्त्र  कहें , तो भी अतिश्योक्ति नहीं होगी l 
                         शिष्य ने पूछा कि  गुरूजी ऐसे जश्न का क्या लाभ ?गुरूजी कहने लगे बेटा राजा अपनी खोती  चमक  को इससे पॉलिश करने की कोशिश करता है  l शिष्य बोला देश में पानी की त्राहि -त्राहि मची हो ,कर्ज से पीड़ित किसान अपनी जीवन लीला समाप्त  कर  रहे हो  ,गुणवत्ता शिक्षा के अभाव में  छात्र अपनी जान  दे रहे है ,  महिलाये  कदम कदम असुरक्षित महसूस करती है ,खेती  चौपट,छोटे उद्योग आक्सीजन पर ,बड़े उद्योगों को भारी  छूट ,   बेरोजगारी , बड़ते अपराध ,पिटते पत्रकार ,नैतिक मूल्यों की गिरावट का जोर यह सब होते हुए भी जश्न जरूरी  होता है क्या   ?
           गुरूजी भी शिष्य की प्यास नहीं बुझा  पा रहे थे  कहने लगे वत्स राजतन्त्र से प्रजातंत्र हुआ पर 
बाकि कुछ नहीं बदला ,राजा रजवाड़े भी अपनी इच्छा पूर्ति हेतु सब कुछ करते थे ,और प्रजातंत्र में भी वहीं  सब कुछ हो रहा है , और होता रहेगा ,जश्न पहले भी होते थे अब भी हो रहे है और होते रहेंगे जश्न ही तो हमारे विकास का आईना होता है ,अगर जश्न नहीं होगे तो प्रजा में सुखानुभूति का संचार कैसे होगा ?अत ; जश्न  हमे  संदेश देते है कि  जश्न ही तरक्की है ,जश्न ही सेवा , जश्न ही हमारा  फर्ज है l 

           शिष्य गुरु जी को आँखे फ़ाड़ कर  देख रहता ,गुरु जी उसकी जिज्ञासा को शांत न कर पाने से विचलित थे कहने लगे वत्स समय का प्रवाह तुम्हे सब कुछ सिखा  देगा कि  जश्न का कितना महत्व है जब तुम पैदा हुए  थे  तुम्हारे   माता -पिता ने भी जश्न मनाया होगा ,सब मनाते है और बाद में कई पुत्र तो पिता के लिए दुःख का कारण बन जाते है l जश्न अपनी   जगह है ,जश्न और विकास में कोई संबंध नहीं है  l   जश्न हमे वर्तमान में अत्यंत प्रसन्नता देता है , भविष्य में क्या होगा कोई नहीं जानता है l एक लोकोक्ति  के अनुसार  पूत के पांव पालने में ही दिख जाते है l 
 
            गुरूजी कहने लगे कि -राज और जश्न एक दूसरे के पूरक है जहां राजा है वहां जश्न है और जहां प्रजा है वहां प्रश्न हीं प्रश्न है l इन सब के उत्तर  काल  के गर्त में  समाये हुए है  l  हमारा देश जश्न प्रधान देश बनता जा  रहा है ,हम छोटी -छोटी ख़ुशी में जश्न मनाकर यह सिद्ध करना चाहते है कि  हम बहुत खुश है और इसी  में कई गमों  को छुपाने का एक असफल प्रयास करते है ,सुना हुआ सच प्रतीत होता  है --सच्चाई छुप  नहीं सकती बनावट के उसूलों  से और खुशबु आ नहीं सकती कागज के फूलों से l जश्न  पर कई प्रश्न खड़े होते है और यक्ष प्रश्न की भांति रह जाते है l किसी ने कहा  है कि --

 चलिए जिंदगी का जश्न
कुछ इस तरह मनाये
अच्छा-अच्छा सब याद रखे
बुरा जो है सब भूल जाये !!    

आओ अच्छे के लिए नहीं  बुरा  भुलाने का  ही जश्न मनाए l                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                         संजय संजय जोशी "सजग " 

कुतरने वाले बनाम गटकने वाले [व्यंग्य ]


 

                 
 हमारे देश में  एक प्रान्त ऐसा है जहां  मनुष्य चारा  खा जाता है और  चूहें  लाखो  लीटर शराब गटक जाते है यह बात  हजम तो नहीं हुई  है ,पर ऐसे प्रदेश की है  जहां कुछ भी सम्भव है l  गणित के हिसाब से माना कि चूहों  ने शराब गटकी होगी पर   चूहा तो शरीर के हिसाब ५-१०  मिलीलीटर   में ही   टुन्न  हो जाता  होगा  और टुन्न होकर सभ्य मनुष्य की तरह   चूहें कहीं  दुबक गये   होंगे,  तभी  तो  किसी को उनकी हरकत के बारे कुछ  पता नहीं चला ? जब  शराब खत्म होने को आई  होगी  तो  देश में  बवाल   मच  गया और यह खबर  सुर्खियों में  आ गयी l बेवड़े  और ,कलाली वाले और सतर्क हो गए और अपनी  देशी विदेशी  शराब  की हिफाजत में लग गए  कि कहीं ये खबर सुन उनके यहाँ के चूहे भी गटकना शुरू न कर दें ?  
  इस खबर से पियक्क्ड़ इतने दुखी हो गए कि बिना पिये  ही   उनके दिमाग की बत्ती जल गई l बेवड़े धुन के पक्के होते है और  पी पी कर  जिसको कोसना होता है उसे कोसते रहते है ,उन्हें रोकना मुश्किल होता है कहने लगे कि इतने लीटर हमको मिल जाती  तो  वारे न्यारे   हो जाते और कई महीने  यूँ ही पीते पीते  कट जाते ,और वहाँ  की सरकार को कोस रहे थे कि  कैसी सरकार  है  यदि शराब की रखवाली  हम  पीने वाले को ही सौंप देते तो  भी इतनी नहीं पी  पाते l कलाली में यह चर्चा का मुख्य विषय बन गया  , बेवड़े इतने खिन्न थे कि वे चूहों  को पिला  कर  यह जानना चाहते थे कि  चूहा पीता है या  नहीं  और अगर पीता है  तो ,पीने के बाद क्या करता है? बेवड़ो  ने इसके लिए  चूहों को   पिलाकर उन्हें    अंडर  ऑब्जर्वेशन में  रख  कर उनकी   हर गतिविधि  पर नजर  रखने  का प्लान   बनाया  ताकि  इस खबर  की सत्यता की जाँच  की जा सके l चार पांच  बेवड़ो  ने  दो तीन  काले   चूहों पर  प्रयोग किया उन्हें सफलता नहीं मिली शायद वे बुध्दिजीवी  चूहे होंगे l अगले दिन  सफेद चूहों पर  लेकिन  उन्हें भी रास नहीं आयी फिर  एक  जंगली चूहे ने थोड़ी पीकर  ऐसी दौड़ लगाई कि  बेवड़े उसे पकड़  ही नहीं पाए ,एक बेवड़ा बोलने लगा कि  ये तो  नेता निकला , पी कर सरपट भाग गया lबेवड़ा विमर्श  चालू हुआ कि काला  चूहा तो एक भगवान की सवारी है इसलिए पीकर कैसे चलता ? यूँ भी  शराब पीकर  कोई भी वाहन चलाना अपराध की  श्रेणी  में आता है l दूसरा बेवड़ा बोला कि  भैरव जी पर क्या गुजरी होगी ,यह खबर सुनकर l तीसरा बोलता है  अमित दा  की एक पिक्चर में चूहा पी गया  था सारी व्हिस्की इसका  मतलब आरोप सही  होगा  ? चौथा बोलता है कि  सही हो या गलत चूहे कौन से मानहानि का केस  लगाएंगे ?एक बात  से खोपड़ी गर्म होरी है कि  जहां शराब पर  पूर्ण रोक है  वहां आदमी त्रस्त है l घोड़ो को घांस नहीं मिल रही है और चूहे शराब पी  रहे है lलीपा पोती हो जायगी और कौन  पी गया असली बात  दब जायगी l उन्हें मलाल था की वे इस पर किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुंचे कि  चूहा  पीने और नहीं पीने के बाद क्या करता  है उसमे  एक खोजी   टाइप बेवड़ा बोला  मेरा मगज  क़े  रिया है  कि   चूहों पर यह झूठा  आरोप है उसे  कुछ सयाने आदमी  ही पी  गए होगें lरक्षक से भक्षक   हो जाने की परम्परा का  जरूर किसी  निर्वाह किया होगा ? खबर तो यह  भी है कि   दो  पुलिस  अधिकारी रंगे  हाथ पकड़े गए लगता है कि   चूहों पर तो केवल शक है  l  कुतरने वाले को  गटकने  वाले बना दिया ये इस  प्रजाति पर घोर अन्याय लगता है दूसरा बेवड़ा अटक अटक कर   कहने  लगा  कि उस प्रदेश में कुछ  भी हो सकता है अब चारों बेवड़े आपस में भिड़ गए और खबर सच या गलत  जानने के लिए कितनी पी  गये पता ही नहीं चला l कलाली वाले ने अस्पताल में भर्ती करा दिया  l सुबह उनकी ही खबर बन गई कि  चूहों के शराब पीने के गम में चार शराबी अस्पताल में भर्ती l जब उनसे पूछा कि  इतनी क्यों पी  तो कहने लगे कि  गम भुलाने के लिए पी, पर चूहों ने क्यों पी  अभी तक समझ नहीं आया ? यह  बात  हजम नहीं हुई और दिमाग का हाजमा  बिगड़ गया सो अलग l 


संजय जोशी " सजग "

आप का जनमत तो गया [व्यंग्य ]

आप  का जनमत तो गया [व्यंग्य ]


             चुनाव के परिणाम आते ही बड़कू  भिया अपना ज्ञान पेलने में लग गए  और कहने लगे  कि यह पब्लिक है सब  जानती है l वादे नहीं विकास चाहिये l दिखावा नहीं हकीकत चाहिए l गिरगिट की तरह रंग बदलने वाले ,चींटी की   तरह काम करने वाले ,डॉगी की तरह भौकने  वाले को  जनता अब बर्दाश्त   नहीं करती  l अर्श और फर्श दोनों दिखाने की शक्ति से लबरेज जनता हमेशा रही  है  और रहेगी l जनमत के साथ जमानत भी चली जाये  तो उसे क्या कहेंगे ? आप तो ऐसे न थे ? आप का हश्र ऐसा क्यों हुआ ? कौआ हंस की चाल  कैसे चल सकता है ?पहले वोट और फिर  चोंट क्यों ? वोटर सौ  सुनार की एक लुहार की तर्ज पर चोंट करता है ,करेगा   क्यों नहीं ? वोटर की शक्ति तो वोट है  ना , चाहे  ऐवीएम   हो या बैलेट ,दबाना या  ठोकना तो उसे अच्छे से आता है l वोटर आजकल इसी  मौके  की तलाश करता है और मौका देखकर चौका क्या, छक्का मारता है l आप का था बस यही सपना  सभी वोटर  अपना ,सपना टूट गया जनाधार खिसक गया l आप का  यही सिद्धांत है कि  हम तो डूबेंगे सनम आप को भी ले डूबेंगे l 

        बड़कू भिया जो भी कहते  सच कहते है किसी भी विषय पर अपनी राय  रखने में  जरा भी देर नहीं करते और हिचकते भी नहीं है l झाड़ू ने दिल्ली में सबका सफाया किया था और  उसके बाद और गंदगी और बढ़ती गई   l इस ने बाहरी  सफाई अभियान  चलाया पर अंदर की गंदगी  से बाहर और  गदगी बढ़ गई और जनता परेशान होने लगी और जोर का झटका  धीरे से दे दिया l खिचड़ी पकी या नहीं ,  एक चावल  देख कर पता लगाया  जा सकता है उसी  प्रकार आप की खिचड़ी कच्ची निकली l कच्ची या अधपकी का स्वाद तो आप और हम ही जानते है l आम जन को टेंशन  का  डर दिखा -दिखा  कर चुनाव तो जीत लिया पर आप को "अपनों ने ही  लूटा और खूब  लूटा l जनता  जनार्दन है जब जब होता मान मर्दन तो वोट  ही शक्ति बन जाता है l 
  बड़कू भिया रुकने का नाम ही नहीं ले रहे थे और कहने लगे कि  पल्टूराम  नेता जनता   के अरमानो को टॉय -टॉय  फिस्स  कर देते है l ऐड़ा बनकर पेड़ा खाकर फिर चले आते है वोट की गुहार लेकर l आम ने आम की तरह जनता को  रस चूसकर गुठली की तरह फेंक  दिया l आम के आम और गुठली के  दाम  ,आम जनता ने  फिर अपना दम  दिखा दिया है ,और सूचक की तरह   सूचित  भी  कि  दिया मुगालते पालना बंद करो ,कुछ काम करो ,दूसरों  पर कीचड़ उछालना अब बंद भी करो l मुंगेरी लाल के हसीन सपनो से बाहर आओ l आम जनता ने जिसके लिये  चुना है वही  काम करो ,देश को चूना  लगाना बंद करो l जनता शिव की तरह  ही भोली है  विष  भी  पीती है और समय आने पर तांडव भी करती है l 
                       बड़कू भिया तैश  में आकर कहने लगे कि पांच साल  बहुत  ज्यादा होते है परखने के लिए l तीन साल होना चाहिए  ताकि  आम जनता को  कथनी और करनी में  अंतर करने वाले  नेताओ  और दलों से  से जल्दी मुक्ति मिले सके l नहीं तो जनमत और जमानत जब्त होने के बाद भी झेलते रहना लोकतंत्र की मजबूरी  हो गई है lआप के  बखेड़ों से जनता   आखिर कब तक न ऊबेगी  ?आप का भानुमति का पिटारा ऐसे  ढहेगा किसे पता था ?जनता सर आँखों पे जितनी जल्दी बैठाती है  उतनी जल्दी उतारती  भी है इसलिये जनमत तो गया और  कभी -कभी जमानत भी चली जाती है  देखते रहो कि  अब  जनता  काम देखेगी  चाहे  कोई भी  दल  हो ,दलदल  स्वीकार नहीं ये  नसीहत देकर भिया ने अपनी वाणी को विराम दिया l 

 संजय जोशी " सजग "