मंगलवार, 7 जुलाई 2015

अप्रेल फूल और नेताजी [व्यंग्य ]

           अप्रेल फूल और नेताजी  [व्यंग्य ]

                     एक अप्रेल को अंतर्राष्ट्रीय   मूर्ख दिवस याने कि अप्रेल फूल मनाया जाता है वेलेंटाइन  डे  के बाद अप्रेल फूल का आना यह सोचने को मजबूर करता है कि शायद यह प्यार की  परकाष्ठा ही है जो इस  दिवस कि उत्पत्ति  हुई, ढाई अक्षर के इस  शब्द में गजब की  शक्ति है यह मूर्ख बनने  और बनाने में उत्प्रेरक का कार्य करता हैl मूर्खता हमारा जन्मसिद्द अधिकार है जब तक  धरा पर मनुष्य प्रजाति विद्यमान रहेगी तब तक मूर्ख भी l पढ़ा लिखा मूर्ख एक अनपढ़   मूर्ख से ज्यादा खतरनाक होता है l 

                     थ्री इडियट फ़िल्म जबसे हिट क्या हुई सभी मूर्ख ,अपने आप को सम्मानित महसूस करने लगे है और इस पर कालिदास ने भी स्वर्ग  में जश्न मनाया होगा अप्रेल फूल हास्य और व्यंग्य का महापर्व है जब  सभी मूर्ख और महामूर्ख सक्रिय हो जाते है और जिनको अपनी अवस्था का भान नहीं  है उन्हें अवगत कराने का ठेका इनके पास ही है और मूर्खो का यह पर्व चुनावी वर्ष में आ जाये तो फिर क्या कहना जनता और नेता दोनों एक दूसरे को मूर्ख ही समझते है जनता वोट देकर पूरे पांच  साल के लिए मूर्ख बन जाती है और नेता पूरे पांच साल तक मूर्ख बनाने  का लायसेंस लेकर  झूठे वादे ,आश्वासन और सुनहरे सपने दिखा जाता है l 

                        एक नेताजी चुनावी रंग में पूरी तरह डूबे हुए थे। मैंने उन्हें मजाक में 
"अप्रेल फूल  क्या कह  दिया ,चुनाव के समय में  उन्होंने उसे गंभीरता से लेते हुए कड़े तेवर में  कहा कि नेता नहीं  जनता मूर्ख है वो हमें  चुनती है हमारी क्या गलती है मैंने उन्हें चिढ़iने के अंदाज में  कहा  कि ये सही फरमाया आपने जनता  कभी सांपनाथ और कभी नागनाथ को चुनती है ,आपका कोई दोष नहीं  हैl चमचों  से घिरे नेताजी में से एक स्मार्ट सा चमचा परिस्थिति  को भांपते हुए  --अप्रेल फूल फ़िल्म का गाना गाने लगा  नेताजी को खुश करने क लिए। ……
             अप्रेल फूल बनाया तो उनको गुस्सा आया 
             इसमें मेरा क्या कसूर जमाने का कसूर 
              जिसने दस्तूर बनाया
चमचे ने नेताजी को कहा ठीक हैं दादा ..चलता है . नेताजी  ने उसकी पीठ थपथपाने लगे और जहरीली मुस्कान फेंक कर …कहा कि ये मूर्ख बनाने का उसूल  हमनें   तो नही बनाया .हम तो केवल फालो करते है। मैंने  कहा  कि किसी ने  सही कहा  है कि मूर्खो पर शासन करना आसान होता है ,जनसेवा तो बहाना है सिर्फ  मेवा खाने मे ही सिद्ध हस्त होते है तो …जैसे तैसे पिंड छुड़वाया नेताजी ने ।
           जाने -अनजाने में मूर्खता करना हमारा प्रकृति प्रदत्त  एक लक्षण है अप्रेल फूल तो  फ़िल्म का टाइटल मात्र है और जब मूर्खता  खुलेआम करने का दिन मुक़रर्र  किया है तो आईये  क्यों न मिलकर मूर्खता के महान  दिन हम मूर्खता जरुर करें अपने आप को इससे वंचित न रखें  और अपनी बहुमुखी प्रतिभा का परिचय दें  l
                              
   क्योंकि मूर्ख ही महान है जिनके  कण -कण में मूर्खता   रची-बसी है इसके   कई उदाहरण भरे-पड़े है अत: महानता के लक्षण को बनाये रखें आओ मिलकर  अप्रेल फूल बनाए l




हार की भड़ास [व्यंग्य ]

 हार की भड़ास [व्यंग्य ]
          वर्ल्ड कप क्रिकेट के सेमी फाइनल मैच की  हार का ठीकरा सोश्यल साइटों  पर अनुष्का पर ही फोड़ा जा रहा है जैसे वो ही  टीम की कप्तान हो ११खिलाड़ियों  की कोई जबावदारी ही नहीं बैट्समेन और बॉलरों  ने काफी निराश किया l सोश्यल साइटों  पर 
न जाने क्या -क्या बकवास चल रही है हर कोई अपने -अपने तरीकों  से उस एक मात्र महिला मित्र को जवाबदेह घोषित कर भारत की हार का  जिम्मेदार बता रहे हैं  l 
                       कईयों  ने तो बीमारी का बहाना बनाकर छुट्टी  ली होगी ,आज  हार का  गम और  बीबी की लताड़  तथा कल बॉस के यक्ष प्रश्नों का सामना भी तो  करना है l अनुष्का का सिडनी जाना जैसे गुनाह हो गया वाट्स एप  पर भी हर  मैसेज में उसे पनौती बताकर  धिक्कार रहे है l 
                     क्रिकेट हो या राजनीति हार का ठीकरा फोड़ने की पुरानी परम्परा है राजनीति  में तो हार का ठीकरा सर पर रखने की होड़ लगी  रहती है l जो हार का ठीकरा अपने सर पर रखेगा वह पार्टी का अनुशासित पदाधिकारी कहलाता है उसे  लगता है यह नौटंकी  ही पार्टी में भविष्य का निर्धारण करेगी l कुछ तो ठीकरा लेने में इतने उतावले होते है की  एक्जिट पोल के आंकड़े देख कर  ठीकरा ढोने की तैयारी कर लेते हैं कि कहीं बहती गंगा में दूसरा हाथ नहीं  धो जाए l 
      ठीकरा  फोड़ने की कला  में पत्नी भी कम नहीं होती ,अच्छा किया तो मैंने किया बुरा किया  तो आपका सर है ना ,चाहे टाट गंजी हो जाये अगले सात  जन्म तक चलता रहता है l  बच्चों  के परीक्षा परिणाम गिरने का ठीकरा बच्चे और पालक शिक्षक पर और शिक्षक शासन पर फोड़ते है 
    असफलता का ठीकरा फोड़ना कला है इसमें सब माहिर होते है हार की भड़ास निकालना भी एक कला है क्रिकेट एक जन सामान्य खेल हो गया है जिसने कभी बेट बॉल को छुआ तक नहीं  वे भी  इस कदर बहस करते नजर आयेंगे कि  कभी -कभी तो  लगता है एक टीम बनाकर उनको भी कहीं खेलने भेजना चाहिए  ताकि हकीकत समझे टीवी पर प्रश्न पर प्रश्न दागना आसान है। मैदान में बॉल की स्पीड और बाउंसर  देख कर पतलून गीली होने तक का खतरा रहता है ये तो खेलने वाला ही जान सकता है l 
            हारना जीतना खेल का हिस्सा रहता है जीतने पर तो  सर आँखों पर उठा लेते है और हारने पर  ठीकरे फोड़ने की गतिविधि शुरू हो जाती है  खिलाड़ियों  को कोसना और बिना सर पैर की टिप्पणी , ख़ेल भावना को आहत करती है l

मूर्खता करना हमारा जन्म सिद्ध अधिकार है[१-अप्रेल फूल ] [व्यंग्य ]

                                  
मूर्खता करना हमारा  जन्म सिद्ध अधिकार है[१-अप्रेल फूल ] [व्यंग्य ]

मेरे मित्र जो पेशे से सरकारी स्कूल में हेड मास्टर के पद पर पदासीन है ,चर्चा ही चर्चा में अप्रैल फूल यानि मूर्ख दिवस 1 अप्रेल को ही क्यों मनाया जाता है इस विषय ने तगड़ी बहस को जन्म दे दिया और  बहस चल पड़ी , मै सहजता से पूछ बैठा की मूर्ख की क्या परिभाषा है? आपके दैनिक जीवन में इस शब्द का महत्व पूर्ण स्थान है ,कहते ही मास्टर जी बगले झांकने लगे और कहने लगे कि  कभी गम्भीरता  से इस पर  चिन्तन नहीं  किया, मैंने कहा यूँ  भी  क्या चिन्तन का आपके पेशे से दूर-दूर तक वास्ता नहीं है  या वक्त ही नही मिलता है सरकार के अधिकारी  है जो कहे वो ही तो करना है आपको I मास्टर जी को जब  पता नहीं  तो बाकि का क्या हाल होगा ,बेचारे बच्चे क्या जाने ,रोज सुनते है सुनना उनकी नियति है I

आपना खुद का सामान्य ज्ञान भी कहाँ ज्यादा  है सोचा थोडा बड़ा लिया जाय .,मेरे पास उपलब्ध पुस्तकों  को उल्टा-पलटा तो विदुर नीति  से सूक्ष्म ज्ञान प्राप्त हुआ ,आप तो जानते ही  है महाभारत काल का  हश्र।फिर भी मुझे तो मास्टर जी को अपना किताबी ज्ञान बाँटना  ही था सो उन्हें विदुर नीति के अनुसार मूर्ख किसे कहते है  बताने लगा मास्टर जी ने  जिज्ञासा भरी नजरों  से मुझे घूरा  ..मैंने  उन्हें कहा की विदुर नीति के अनुसार ...ऐसे लोगों  को मूर्ख कहते है - जो शास्त्र शून्य होकर भी अति घमंडी है ,बिना कर्म के धन प्राप्त करता हो ,अपने कार्य को छोडकर शत्रु के पीछे दौड़ता हो ,मित्र के साथ कपट व्यवहार ,मित्र से द्वेष, विश्वास घात ,झूठ बोलने वाला ,गुरु ,माता ,पिता और महिला का अपमान करता हो,आलसी हो ,बिना किसी काम का  हो  वह मूर्ख की श्रेणी में आते है I स्वयं दूषित आचरण करता हो और दूसरों  के दोष की निंदा करता हो वह महामूर्ख कहलाता है I मास्टर जी बोले इस प्रकार  धरा पर कोई भी इससे अछूता  नही है, ,हम बेचारे छात्रों को अपमानित करते रहते है पढ़ा लिखा मूर्ख अनपढ़ मूर्ख से अधिक मूर्ख होता है , हमारा देश मूर्खो और महामूर्खो से भरा पड़ा है I 

हमारे देश में एक जुमला प्रसिद्ध है की मूर्ख मकान बनाते है और बुद्धिमान उसमे रहते है एक बार मकान किराए पर लेकर जिन्दगी भर मकान मालिक को मूर्ख बनाते  रहते है  और कोर्ट तक चप्पले घिसवाते है Iचुनाव में वोट  के लिए चापलूसी कर फिर जनता को पांच साल तक  मूर्ख बनाते है और हम सहते रहते है , मंदी की मार का खौफ़  बताकर और  कीमतें  बड़ाकर  सरकार जनता को आये दिन मूर्ख बनाती है ईमानदार टैक्स चुकाता  है और मूर्ख  न चुका कर उसका आनन्द लेते  है I मूर्खता की भांग देश में घुली पड़ी है हर एक दूसरे को मूर्ख बनाता है ओर समझता भी है I

मास्टर जी  को हताश होते देख कर उन्हें बताया कि  देश में कुछ बुद्धि जीवी है जो  अपने आप को  कालिदास के वशंज मानते है वे फिर अपने तेवर में आ गये ,और देश के नेताओं  और सरकारी तन्त्र के सरकारी अफसरों को कोसने लगे इन्हीं  सबने मिलकर देश का बंटाधार   कर दिया ,मूर्खता पर नोबल पुरुस्कार यदि होता हो तो देश के किसी  नामी गिरामी मूर्ख   को ही मिलता ,उनका आवेग देख कर उन्हें रोकने के लिए "थ्री इडियट "फिल्म का उदाहरण देकर सामान्य करने की   कोशिश करने का  प्रयास किया कि  इस फिल्म ने यही धारणा को उजागर किया की मूर्ख महान होते है वे ईश्वर की सर्वोतम कृति है देश में यह किस्म बड़ी तादाद में  पाई जाती है 

मूर्खता करना हमारा  जन्म सिद्ध अधिकार है जब तक सूरज -चाँद रहेंगे मूर्ख ओर मूर्खता जिन्दा रहेगी ,मास्टर जी गर्वित होकर बोले हम तो बचपन से ही ऐसी  प्रतिभा को पहचान लेते है और मूर्ख कह देते है बनना तो निश्चित है हम  भावी पीड़ी  के  जनक  जो ठहरे इनकी नींव  स्कूल ,कॉलेज  ..से ही शुरू होती है हम जैसे  बुद्धि जीवी इसके दाता है I मैने कहा धन्य है मास्टर जी मुझे आज पता चला है कि  आप मूर्ख प्रदाता है इस देश को I मुझे मूर्खता से इतनी तकलीफ नहीं  होती ,जितनी इसे ही अपना गुण समझने वालों  से ,केवल मृत व्यक्ति और मूर्ख  ही अपनी राय नहीं  बदलतेIमूर्खता  के अलावा कुछ  पाप नही होता है Iमूर्खता सब कर लेगी पर बुद्धि का आदर कभी नहीं  करेगी ,अत: मास्टर जी सोचो हम कहाँ है ?

मूर्ख और मूर्खता को  सहेजने के लिए देश में कई मंचो ने  अनेक कार्यक्रम लांच कर रखे है जो मूर्ख और मूर्खता को स्वीकार करने में नही हिचकते और पूरी मुस्तैदी  से वर्ष भर अंजाम देकर एक दिन उसको अभिव्यक्त करते नही थकते जेसे मूर्ख ,महामूर्ख .टेपा खांपा,कबाड़ा गुलाट , आदि  ऐसे कई  प्रकार सम्मेलन है  इनका जन्म भी  इसीलिए  हुआ  जो अपने आप को मूर्ख मान कर उपहास करने  का उपक्रम करते है .मूर्खता का अंत सम्भव नही लगता है और हम एक अप्रैल  को अप्रेल फूल यूँ   ही मनाते रहेंगे I जो मूर्ख की श्रेणी में आते हो और अपने दिल से माने ..उन सभी को..अप्रैल  फूल की बधाई .....I


  
  

नकल के नशे में है जहान [व्यंग्य ]

   नकल के नशे में है जहान   [व्यंग्य ]

                                 

          बांकेलाल जी समाचार  पत्र  में   नकल की खबर पढ़ आहत हुए जा रहे थे और बार बार  पेपर  जोर -जोर से झटक  रहे थे मैंने पूछा कि  सुबह -सुबह  क्या संकट आ गया  बहुत विचलित  दिख  रहे हो वे कहने लगे एक पुरानी लोकोक्ति है नकल में  भी अकल लगानी पड़ती है पर फिर भी अच्छे -अच्छे  धरा जाते है तो यह दर्शाता है कि  यह तो  बेअकल है और यदि  अक्ल का काम करने की कूबत होती तो नकल  ही क्यों करते ? अपनी  अकल का सदुपयोग करते पर क्या करें  हमारी अकल तो गई घांस चरने जब से मनुष्यता पर पशुता हावी है और नकल पर  नकल  जारी है कौन  असली है कौन नकली है भेद करना किसी भी  साधारण  मनुष्य के  बस की बात नहीं l  परीक्षा के समय में नकल का समाचार पड़कर मन दुखी होता है कि  मेहनत करने वाले का क्या कसूर रहता है कि  नकल को अपना जन्म सिद्द अधिकार समझने वाले प्रतिभाओं  के लिए 
स्पीड ब्रेकर  बनकर इठलाते है और वे बेचारे मायूस हो कर सब सहते है l 
                     वे आगे कहने लगे इस कला को बढ़ावा  देने  में अर्थ  की अहं भूमिका है अर्थ बिना सब व्यर्थ  समझने वालों के लिये   इसकी  आड़ में रोज नए  तरीकों  पर रिसर्च करने
की कमी नहीं   है  तभी तो  व्यापम जैसे  घोटाले  के कारण  प्रतिभाओं  का दमन हो जाता है और अरमान दफन l रोज रोज नए  तरीके समाने  आ रहे है मतलब नकल में अकल लगाने वालों  की कमी नही है फिर भी चोर की दाढ़ी में  तिनका रह ही जाता है और अपराधियों  की पहचान कर सजा मिलने में वर्षों  लग जाते हैं और नकल में अकल लगाने वाले अपना काम निरंतर जारी रख कर समाज में नासूर तरह काम करते रहते है l 
                          बांकेलाल जी कहने लगे कि  शिक्षा ही क्या  हर क्षेत्र में इसका बोलबाला है 
पाश्चात्य  सभ्यता की नकल  तो भारतीय संस्कृति का क्षरण कर शर्मसार कर ही रही है 
इस  नकल से राजनीति भी अछूती नहीं   है एक दूसरे के मुद्दे ,वादें  और प्रोग्राम की 
  नकल  कर फूले नहीं  समाते हैं  हमने  नकल के दलदल में फंस कर जीवन शैली को  बर्बादी की ओर धकेल  दिया है खाने -पीने ,रहन सहन ,आचार विचार, व्यवहार ,समाजिक ताने बाने  को विदेशी रंग में रंग कर आधुनिक और विकास शील होने दम्भ  भर रहे है l 
                              नकल की प्रवृति ने कुछ इस तरह जकड़ रखा है कि  हर चीज 
नकली और बनावटी लगने लगी है रिश्तों   को निभाने की मजबूरी में ,अंदर से कुछ और बाहर से कुछ और नजर आते है और नौटंकी की नकल कर अपने आप को धन्य 
मानते है l नकल की इस लाइलाज बीमारी और  मानवता के दुश्मनों  ने दवाइयों को भी नही छोड़ा वहां भी  नकल की भरमार है l

                                   हर कोई नकल पर है फ़िदा
                                   इसलिए तो है नकल जिन्दा
                       मैंने कहा  बांकेलाल जी आपकी चिंता जायज है पर इसके पीछे 
अति धन कमाने की लालसा ,एक दूसरे से ऊँचा दिखना और बिना मेहनत के बहुत कुछ पाने की तमन्ना ही  इसकी  जड़ है और जड़ काटने का नाटक कर उसे पानी देकर 
जनता की आखों में धूल झोंकना ही तो चल रहा है l 
                                            नकल के नशे में है जहान 
                                            अपने आप को कहते महान … 

जहां सोच नही वहां,,,,,,,?"[व्यंग्य ]

  जहां सोच नही वहां,,,,,,,?"[व्यंग्य ]
        
         बांकेलाल जी जो हर  समय कुछ -कुछ सोचते रहते है यह जानते हुए कि  ज्यादा सोचना दुखों  का कारण होता है फिर भी सोचते है आज वो एक सरकारी विज्ञापन के पीछे पड़ गए और उसका  शल्य चिकित्सक   की तरह आपरेशन ही कर डाला  वे कहने लगे कि विज्ञापन की दुनिया में  होड़ मची  है कैसे -कैसे  विज्ञापन  दिखाए और सुनाये जाते है एक विज्ञापन देख -देख कर दिमाग सठिया गया है वह कभी किसी भी समय टपक जाता है और जब खाने के समय आ जाता है तो लोगों  के चेहरों पर शिकन सी उभर जाती है  वह है ही कुछ ऐसा मुंह  से पेट तक का माहौल ख़राब कर जाता है और सोचने को मजबूर कर जाता है की जहां सोच है वहां शौचालय और जहां सोच नही वहां क्या ?यह बहस चल रही थी कि  वे कहने लगे  वेरी   सिंपल   जहां  सोच नही वहां से  राजनीति शुरू होती है l 
                 बांकेलाल जी जब बोलना शुरू करते है तो सब की बोलती बंद कर देते है कहने लगे कितनी घटिया हो गई ये कलमुंही राजनीति ,चुनाव के पहले तो सेवा के बड़े -बड़े वादे और चुनाव जीतने के बाद कौन? आम और आम ख़ास और ख़ास हो जाते है 
और नेता  पद कि लालसा अपने चरम पर होती है और यहीं  सोच राजनीति 
का दल -दल बन जाती है और आप हम अरमानों   के पूरे होते  देखने  को तिल-तिल घुटते रहते है और फिर  यह अहसास होने लगता है कि  कुछ नहीं  बदला सब वैसा ही तो है जो सब्जबाग दिखाए थे वो तो केवल चुनाव जीतने के लिए थे पहले की सोच और बाद की सोच का अंतर ही तो समस्या बन जाती है क्या करें ? जनता यह जानते हुए कि  कुछ नहीं  होना है फिर भी विकल्प  में से अच्छा चुनती है पर राजनीति  की धारा ही कुछ ऐसी है कि  जो जीता वह अपने को सिकंदर मानने  लगता है l 
                           जहां  जनता के हितों  की सोच नहीं वहां,,,,,, चुनावी वादों  को जुमला कह  दिया जाता है और जुमलों पर जुमलों का कहर चलता रहता है और जनता दो पाटों के बीच पिसती रहती है और पांच साल यहीं सोच कर सोचती रहती  है की हमने  क्या सोच कर वोट दिया इससे नाटो ही अच्छा था l         
    जहां सोच नही वहां  बंटाधार होने लगता है और सोच का सर्कस देखते  रहो और मन बहलाते  रहो l अगर सोच सही रूप से काम कर जाये तो क्या कुछ नही हो सकता 
पर सोचने  और करने के बीच का अंतर ही सोच को खत्म कर देता है और स्वार्थ की सोच चालू हो जाती है अपनी खिचड़ी अलग पकाना चालू हो जाती हैऔर  जैसे कुएँ में भाँग  घुली हो  सभी  एक जैसा व्यवहार सभी करने लगते है। जन हित की सोच में जमीन आसमान का संबंध हो जाता है और आशा पर कुठाराघात हो जाता है सभी एक ही थेली के चट्टे-बट्टे है    जहां सोच नही वहां,,,,,,,जनता की दुखो का अम्बार तय शुदा हो जाता है l

---- इमोशनल ब्लेक मेल की कला ---------"[व्यंग्य ]

     -----   इमोशनल ब्लेक मेल की कला ---------"[व्यंग्य ]

     इमोशनल ब्लेक मेल भी एक  कला है इसका कारगर  हथियार की तरह उपयोग किया जाने लगा है ,जो  इमोशन्स को भुनाने  की कला  में जितना  माहिर होता है वह उतना ही सफल होता है  इसे अपने जीवन का   हिस्सा बना लिया है इसमें  मुख्य रूप से डॉ ,बाबा और नेता कदम -कदम पर  ,इमोशनल ब्लेक मेल के सहारे अपना हित साध लेते है वे कहते है की इसमें हमारा क्या दोष  है यदि कोई  भावना के प्रवाह में बह जाये उससे हमारा उल्लू  सीधा हो जाये तो हर्ज क्या है हम तो अपना फर्ज   अदा कर रहे है  फिर चाहे किसी के ऊपर  कर्ज हो जाये।यह एक खतरनाक खेल बन गया है ऐसे कई विज्ञापन जो इमोशनल ब्लेक मेल कर अपना  उत्पाद  खरीदने को मजबूर कर देते है क्योंकि  हम    आसानी से  भावुक  होते है l 
 
       प्रसूति के समय और गम्भीर बीमारी के समय  कुछ डॉ जिस तरह मौके  की नजाकत को भांप कर इमोशनल ब्लेक मेल करते है कि  अच्छे -अच्छे अपने आप को कठोर दिल का समझने  वाले भी पिघल जाते है और इमोशनल ब्लेक मेल की कला से सम्मोहित से हो जाते है और डॉ को कहते है की जैसा आपको उचित लगे वह करिये  खर्चे की चिंता न करे  डॉ सा का काम आसान हो गया और नोट छापने का काम चालू  हो गया यह इमोशनल ब्लेक मेल की कला का  ही  कमाल  है l
    तथा कथित संत बाबा भी इस कला के माध्यम  से लाखों  करोड़ो आसानी से ऐंठ लेते है यह सब इमोशनल ब्लेक मेल में  इतने माहिर होते है कंजूस को भी भावना से  भड़का कर उसे भी  मजबूर कर देते है जैसे सूखे हुए नीबू से रस कैसे निकलेगा  इन्हे महारथ हासिल है l
                   चुनाव में इमोशनल ब्लेक मेल का कार्ड खेलकर वोट हथियाने  की हर नेता और हर दल पुरजोर कोशिश करता है ,जो जितना इसमें निपुण होता है वह उतना ही 
सफल होता है ,जीवन में पग -पग पर जो इसकी नौटंकी कर सके वही इस भावनात्मक 
महासागर में तैर  सकता है l
                        
                       किसी सरकारी /निजी संस्थान में छुट्टी की इतनी मारामारी रहती है कि कुछ को तो हर बात पर छुट्टी चाहिए क्योकि यह उनकी आदत में शुमार है वे किसी की मौत  या बीमारी बताकर  इमोशनल ब्लेक मेल का सहारा लेकर ,मरे हुऐ को कई बार मार देते है जो इस धरा पर आया ही नहीं  उसका भी उपयोग  कर लेते है   हर मनुष्य भावना से ओतप्रोत  रहता है  जिसका फायदा उठानेवालों  की कमी  नहीं  है l

                   इमोशनल ब्लेक मेल ने जहां  मनुष्य को असवेंदनशील  बनाने में महत्व 
पूर्ण भूमिका है l समय -समय पर इमोशनल ब्लेक मेल  का फायदा हर कोई उठाने को आतुर रहता है चाहे राजा हो या रंक ,गरीब हो या अमीर ,संत्री  हो या मंत्री ,छात्र हो या शिक्षक ,मरीज  हो या डाक्टर ,महिला हो या पुरुष। हर मनुष्य की  यह स्वाभाविक प्रवृति है कोई इससे अछूता नही हैl इसका तड़का न हो तो समाज में नीरसता का भाव पनपने 
लगता है हम इसके आदि  जो हो गए  हैं l 
               

होली हुई हाई टेक "[व्यंग्य ]

  होली  हुई हाई टेक "[व्यंग्य ]
जब से नेट ने अपने पाँव  पसारना चालू किये तब से सोश्यल मीडिया ने हम सबको  जकड़  कर अपने   मोहपाश  में बाँध लिया है त्यौहारों का मजा आजकल  यहीं  आने लगा है शुभकामनाओं  और बधाई की बाढ़ सी आने लगती है बेचारे पंडितो की तो शामत आ गयी है अब  उनको कोई नहीं  पूछता है की कौनसा त्यौहार कब आयेगा ?नेट पर हर त्यौहार को  इतने  धूमधाम से  मनाया जाता है कि   उसकी ख्याति अंतरराष्ट्रीय  हो जाती है lनेट की आभासी दुनिया में सब आभास करते नहीं  थकते है ,फोटो वीडियो के माध्यम से ही होली तक  खेल ली जाती है और अपनी आत्मा को संतुष्टि देकर  आभासी होली मना ही लेते है l 
           एक मित्र व्यास  जो कि  रंगीन मिजाज  के है और होली  आने पर  उनकी मस्ती  और धूम  बढ़   जाती थी उन्हें  होली खेलने और  खिलाने का बहुत शौक है  होली के रंग में इतने  रंग जाते थे कि  रंग के   साथ भांग और मिठाई  की पुरजोर तैयारी करते थे , वे एक दिन दुखी होकर कहने लगे नेट ने  होली को हाई टेक कर लिया और चायना ने इसे हाई जेक कर लिया  है  कहां  गए हमारे प्राकृतिक रंग ,गोपियों वाली पिचकारी l अब शरीर को ख़राब करने वाले रंग और हथियारनुमा पिचकरियों  से लगता है   जैसे होली खेलने नहीं  युद्ध लड़ने जा रहे है l मेड इन चायना  को अपनाकर  मेक इन इंडिया की कसम  खाने  वालों  की कोई  कमी नहीं  है l मैंने उन्हें कहा  समय -समय की बात है जब होली दिल से खेली जाती थी  उत्साह   और उमंग की  बहार होती थी ,होली के आगमन की प्रतीक्षा रहती थी वे  मेरी बात काट कर कहने लगे की सब नेट ने  ही चौपट किया है हमारी संस्कृति और मूल्यों को 
इस तरह उलझा कर रख दिया कि  सब कुछ भूलकर अपने व्यवहार और त्यौहार सोश्यल मीडिया 
पर ही निभाने लगे  है नकली फोटो और नकली मुस्कान के सहारे सब कुछ चल रहा है पिचकारी की जगह लाइक और  लट्ठ  मार   होली याने की  टैग  पर टैग  कर  मनाने  लगे है l मैंने कहा गीता को ध्यान में रख कर सोचो जो हो रहा है अच्छा है और जो होगा और अच्छा होगा ,क्यों व्यर्थ चिंता करते हो ?
    हमारी चर्चा चल ही रही थी कि  एक मित्र  शर्मा जी  आ टपके कहने लगे की व्यास जी इस बार क्या आयोजन है?  तो वे तुनककर बोले सब आयोजन तो फेसबुक और वाट्सएप पर होगा आप वहीं  अपने इष्ट मित्रों  के साथ सादर आमंत्रित है l तैयारी कर लीजिये नेट पैक और   ब्राड बैंड चेक कर लीजये कहीं  धोखा  नही दे जाये  नहीं  तो होली का मजा किरकिरा  हो जायेगा   और आभासी दुनिया के आपके सामजिक मित्र  की कारगुजारियों से वचिंत रह जाओगे l व्यास जी   की बात सुनकर शर्मा जी टेंशन में आ गये कि  रंगीले व्यासजी को  आभासी दुनिया में कौन रंग गया कि  इनकी मानसकिता में क्रा न्तिकारी परिवर्तन हो गया l मैंने कहा ये आजकल हाईटेक हो गए है इसलिए नेट पर ही होली मनायेंगे l शर्मा जी  संपट  भूल  गए कहने लगे कि  भांग,मिठाई ,  पानी का  टैंकर   और  ढोल  की व्यवस्था  कौन करेगा मतलब गयी भैंस पानी में और होली  भी अब नेट  की हो ली l 

शर्मा जी कहने लगे कोई कुछ भी करे हम तो होली देशी अंदाज में  रंग के साथ भांग के साथ ही मनायेंगे लालू जी ठेठ तरीके से अब व्यास  जी भी ख़ुशी के मारे  झूम उठे और कहने लगे वर्मा जी से भी बात कर लेना अपनी तरंग में आकर बोले जहां मिले चार यार कैसे न बने जोरदार  होली का त्यौहार l लाल,गुलाबी,पीले और हरे रंग दिल नहीं बहला पाते जितना उससे अधिक दोस्तों की अदाओं के रंग अधरों पर मुस्कान बिखेर जाते हैं  और असली आभासी  दुनिया दिखने लगती है पर  इस तरह मनाये जब