दायित्व,कर्त्तव्य और अधिकार के प्रति रहो हमेशा सजग.... [इसको व्यक्त करने का माध्यम मेरे लिए ---शूलिका(किसी बात को कम शब्दों मे कहना और उससे मन मे चुभन का अहसास हो) एवं व्यंग्य]
शुक्रवार, 29 अगस्त 2014
शुक्रवार, 22 अगस्त 2014
मूड़ है की मानता नहीं [व्यंग्य ]
जिस प्रकार चायना के मॉल का कोई भरोसा नहीं रहता है फिर भी इसका
उपयोग करना हमारी जिन्दादिली है ,उसी तरह आजकल मूड़ का कोई भरोसा नही कब खराब हो जाये यह एक गंभीर समस्या बन गई है किसका मूड़ कब खराब हो जाये कुछ भी कहा ही नहीं जा सकता l वैज्ञानिकों का भी खोज -खोज करते -करते मूड खराब हो जाता है कि इसे टेंशन की एक अवस्था कहा जाये या इसे मानसिक विकार की श्रेणी में रखा जाये इस पर चर्चा करते -करते मूड खराब हो जाने के कारण अन्तिम निष्कर्ष बार बार टल जाता है l जिसको देखो उसका मूड खराब है यह एक तकिया कलाम सा बन गया है ,किसी हँसते हुए से यह पूछ लिया और क्या हाल है ?उत्तर मिलेगा मूड़ ख़राब है न जाने वायुमंडल में क्या ऐसा प्रभाव हुआ की मूड़ ख़राब रहना मनुष्य का स्वाभाविक गुण हो गया है l
उपयोग करना हमारी जिन्दादिली है ,उसी तरह आजकल मूड़ का कोई भरोसा नही कब खराब हो जाये यह एक गंभीर समस्या बन गई है किसका मूड़ कब खराब हो जाये कुछ भी कहा ही नहीं जा सकता l वैज्ञानिकों का भी खोज -खोज करते -करते मूड खराब हो जाता है कि इसे टेंशन की एक अवस्था कहा जाये या इसे मानसिक विकार की श्रेणी में रखा जाये इस पर चर्चा करते -करते मूड खराब हो जाने के कारण अन्तिम निष्कर्ष बार बार टल जाता है l जिसको देखो उसका मूड खराब है यह एक तकिया कलाम सा बन गया है ,किसी हँसते हुए से यह पूछ लिया और क्या हाल है ?उत्तर मिलेगा मूड़ ख़राब है न जाने वायुमंडल में क्या ऐसा प्रभाव हुआ की मूड़ ख़राब रहना मनुष्य का स्वाभाविक गुण हो गया है l
मूड़ खराब होने की गुत्थी मेरे दिमाग में बार
-बार उलझती जा रही थी इसे सुलझाना तो बहुत दूर यह समझ से परे थी l
मैं सोच ही रहा था कि क्या किया जाय तब अचानक मेरे दिमाग में कौन बनेगा
करोड़पति में लाइफ़ लाइन के एक ऑप्शन फोन अ फ्रेंड का विचार आया कि क्यों न
किसी मित्र को फोन लगाकर जानकारी ली जाए अब किसे फोन लगाया जायें ? फिर
एक प्रश्न खड़ा हुआ ,मैंने मन बनाकर मनोचिकित्सक डॉ साहब को फोन लगाया
और पूछा की सर जी क्या हाल है
डॉ ,साहब बोले -क्या बताऊँ मूड़ बहुत खराब है
मैने पूछा क्या हो गया ?
डॉ साहब का उत्तर था-बस यूँ ही क्या कहूँ दिमाग काम नहीं कर रहा है l
मैंने सर पीटते हुए कहा गई भेंस पानी में l
और पूछा की ऐसा क्यों होता है कि किसी का कहीं भी कभी भी मूड़ खराब हो जाता है ? डॉ साहब के बोलने का लहजा अब रुखा होता जा रहा था और मैं बैचेन था मैंने कहा डॉ सा.कृपया मेरी सहायता करिये--वे बोले समय हो तो इधर ही आ जाओ l मैंने कहा आता हूँ ,मैंने तो कमर कस ली थी इस मूड नामक बीमारी को समझने की l मैं उनके घर जा धमका l मुझे देख कर गंभीर होकर डॉ साहब ने थोड़ी तेज आवाज में पूछा कि बोलो क्या काम है ?
मैंने जिज्ञासा भरे लहजे में कहा कि सर जी आजकल मूड खराब होना बचपन से पचपन और उसके आगे भी ,संत्री से मंत्री ,छात्र से लेकर अध्यापक ,मरीज से लेकर डॉ तक सब इसी बीमारी से ग्रस्त है कहीं यह महामारी न बन जाए ,सरकारें भी इस बीमारी से अनभिज्ञ है इसके लिए तत्काल सर्वे की जरूरत न पढ़ जाए l डॉ साहब अपना मूड़ संभालते हुए बोले कि आये दिन इस अज्ञात बीमारी के मरीज निरंतर बढ़ रहे है वे कहने लगे कि क्या इलाज करूँ ?मैंने कहा यह तो आपका क्षेत्र है l वे मूड़ खराब होने का ज्ञान बांटने को तैयार हो गए और मैं मौन धारण करके सुनता रहा क्योंकि बीच में बोलने से डॉ साहब के मूड़ ख़राब होने का खतरा मंडराता हुआ नजर आ रहा था l
और पूछा की ऐसा क्यों होता है कि किसी का कहीं भी कभी भी मूड़ खराब हो जाता है ? डॉ साहब के बोलने का लहजा अब रुखा होता जा रहा था और मैं बैचेन था मैंने कहा डॉ सा.कृपया मेरी सहायता करिये--वे बोले समय हो तो इधर ही आ जाओ l मैंने कहा आता हूँ ,मैंने तो कमर कस ली थी इस मूड नामक बीमारी को समझने की l मैं उनके घर जा धमका l मुझे देख कर गंभीर होकर डॉ साहब ने थोड़ी तेज आवाज में पूछा कि बोलो क्या काम है ?
मैंने जिज्ञासा भरे लहजे में कहा कि सर जी आजकल मूड खराब होना बचपन से पचपन और उसके आगे भी ,संत्री से मंत्री ,छात्र से लेकर अध्यापक ,मरीज से लेकर डॉ तक सब इसी बीमारी से ग्रस्त है कहीं यह महामारी न बन जाए ,सरकारें भी इस बीमारी से अनभिज्ञ है इसके लिए तत्काल सर्वे की जरूरत न पढ़ जाए l डॉ साहब अपना मूड़ संभालते हुए बोले कि आये दिन इस अज्ञात बीमारी के मरीज निरंतर बढ़ रहे है वे कहने लगे कि क्या इलाज करूँ ?मैंने कहा यह तो आपका क्षेत्र है l वे मूड़ खराब होने का ज्ञान बांटने को तैयार हो गए और मैं मौन धारण करके सुनता रहा क्योंकि बीच में बोलने से डॉ साहब के मूड़ ख़राब होने का खतरा मंडराता हुआ नजर आ रहा था l
डॉ साहब अब अच्छे
मूड़ में दिख रहे थे कहने लगे -आजकल सुबह की शुरुआत ही बेड हो जाती है
उठते ही
बेड टी की आदत जो हो गई है फिर हाथ में आता है बलात्कार,खून अपराध
,भ्रष्टाचार ,बढ़ती महंगाई से भरा अख़बार मूड खराब करने को काफी है मूड़
खराब करने की दूसरी बड़ी समस्या या वजह जाम का आम होना ,और यह लेट
पहुँचने से बॉस की आँख की किरकिरी बनकर हमेशा तिरस्कार का भागी
बनकर मूड़ खराब होने की यातना को भोगता है साथ ही हर जगह चमचों के
हमलों का
प्रकोप, काम का दबाव ,कम मेन पॉवर में ज्यादा काम भी मूड खराब के
सूचकांक में वृद्धि करता है l शाम को फिर
वही जाम फिर बुरा अंजाम और अब घर वालों की अपेक्षा पर
खरा उतरने की जद्दोजहद क्या करें कोई कितना ही बुलंद हो फिर भी मूड़
खराब हो ही
जाता है,l मूड़ खराब का साइड इफेक्ट से मानसिकता कमजोर हो जाती है और
गुस्से
की उत्पत्ति हो जाती है जैसे आये दिन सदन में भी ऐसे दृश्य देखे जाते
है मुद्दे से हटकर बोलने लगते है इन सबकी जड़ तो मूड़ ही है मैने बीच
में टोकते हुए कहा कि डॉ आपने इसकी महिमा का
गुण गान किया है अब कोई उपाय तो बताइये तो -डॉ साहब ने टालते हुए कहा की
मित्र अगली बार l मैंने मन ही मन कहा कि खुद ही इससे पीड़ित है क्या
बताये इलाज ?मूड अच्छा करने के लिए लोगबाग क्या-क्या जतन करते है पीने
वाले को पीने का बहाना चाहिये है कुछ तो नेट पर चेट और मोबाइल से ही
चिपके रहते
है मूड़ को ठीक करने के लिए l
दिल क्या करे मूड है कि मानता नहीं और हम
डूबेंगे सनम आप को भी ले डूबेंगे खराब मूड़ में --- मेरा मूड़ खराब है तेरा
खराब न कर दूं तो मेरा नाम नहीं l
गुरुवार, 21 अगस्त 2014
आत्म चिंतन पर चिंतन [व्यंग्य ]
आत्म चिंतन पर चिंतन [व्यंग्य ]
किसी भी विषय पर चिंतन करना समाज और देश के लिए बहुत जरूरी है पर देश में
चिंतन का वातावरण ही नहीं है सब के सब चिंता में ही लगे हुए है चिंता और
चिता में एक बिंदी का ही अंतर है जो हर मनुष्य के लिए घातक है चिंता की
बजाय चिंतन को बढ़ाने के प्रयास बहुत जरूरी है l एक न्यूज़ की कटिंग लेकर
भटकते हुए एक चिंतक आये और कहने लगे कि थोड़े दिन में देश में चिंता को छोड़
कर चिंतन करने वाले बढ़ जायेंगे तो मैंने कौतूहलवश पूछ लिया कि ऐसा क्या
चमत्कार होने वाला है
तो वे कहने लगे सब को आत्म चिंतन केंद्र की सुविधा जो मिलेगी ,
संजय जोशी "सजग " [ व्यंग्यकार ]
तो वे कहने लगे सब को आत्म चिंतन केंद्र की सुविधा जो मिलेगी ,
मैंने फिर पूछा-यह क्या होता है ?
वे बोले आपको नहीं मालूम कि शौचालय को हिंदी में "आत्म चिंतन केंद्र" कहते है
वे सबके लिए बनाये जायेंगे जिससे चिंतन को नई गति मिलेगी , अभी जिनके पास है
वे
अपने आप को अच्छा और विकसित मानते है और जिनके पास नही है उन्हें तुच्छ
और पिछड़ा माना जाता है वे कहने लगे अधिकतर मनुष्य नाम के प्राणी अपने आप
को ज्यादा तनाव मुक्त वहीं पाते होंगे I देश की हर समस्या का चिन्तन
उसी आत्म चिन्तन केंद्र में करते होंगे शायद तभी विवादित बयानों की
इतनी बौछार होती है बेचारा वह क्या चिंतन करेगा जिसके पास चिंतन केंद्र
ही नही है उसके लिए तो यह अभिशाप है वैसे यह चिन्तन केंद्र आजकल बहुतायत
में पाए जाते हैं पर सबका स्वरूप भिन्न
-भिन्न होता है जेसे वी . आई .पी .लोगों .का पांच सितारा , .जन सामान्य
का साधारण .गरीबों का सार्वजनिक ,और बाकी बचे हुए लोग खुले स्थान की
और रुख करने को मजबूर है l खुले में चिंतन करने में प्रकृति के दृश्य
विघ्न पैदा करते है ,और जीव जंतु का भय सताता सो अलगl
अत: चिंतन का दायरा भी अलग अलग होता है एक मंत्री ,नेता ,कवि ,लेखक ,पत्रकार ,व्यापारी ,अधिकारी और सबका अपने चिन्तन का विषय अपने कार्यानुसार होताहै I मैंने कहा बेचारा गरीब आदमी ...तो अपनी रोजी -रोटी और बढती महंगाई का चिन्तन कर दुखी होता है और चारा ही क्या है,आजादी की बाद से ही यह मुख्य मुद्दा रहा है सबने भुनाया और बाद में भुलाया , फिर भी ढाक के तीन पात l लगातर उनका चिंतन का बखान जारी था उनका कहना थी कि सरकारें केवल चिंता करती है और ठोस योजना का अभाव ही रहता है , इस समाचार के मुताबिक सबको यह सुविधा मिलेगी ऎसी आशा अधिक व विश्वास तो कम ही है कि ऐसा हो पायेगा बायचांस अगर हमारे देशवासियों के पास १०० प्रतिशत ऐसे केंद्र हो तो सब चिंतनशील हो जायेंगे और सरकार के हर कदम का चिंतन करेंगे ओर जिससे कर्णधारों को सबसे ज्यादा नुकसान होगा वे इस दर्द को समझते है लेकिन इसके प्रति चिंता को दर्शाना उनका कर्तव्य है और चिंता की रस्म अदायगी कर अपने कर्तव्य की इति श्री कर लेते हैं l
अत: चिंतन का दायरा भी अलग अलग होता है एक मंत्री ,नेता ,कवि ,लेखक ,पत्रकार ,व्यापारी ,अधिकारी और सबका अपने चिन्तन का विषय अपने कार्यानुसार होताहै I मैंने कहा बेचारा गरीब आदमी ...तो अपनी रोजी -रोटी और बढती महंगाई का चिन्तन कर दुखी होता है और चारा ही क्या है,आजादी की बाद से ही यह मुख्य मुद्दा रहा है सबने भुनाया और बाद में भुलाया , फिर भी ढाक के तीन पात l लगातर उनका चिंतन का बखान जारी था उनका कहना थी कि सरकारें केवल चिंता करती है और ठोस योजना का अभाव ही रहता है , इस समाचार के मुताबिक सबको यह सुविधा मिलेगी ऎसी आशा अधिक व विश्वास तो कम ही है कि ऐसा हो पायेगा बायचांस अगर हमारे देशवासियों के पास १०० प्रतिशत ऐसे केंद्र हो तो सब चिंतनशील हो जायेंगे और सरकार के हर कदम का चिंतन करेंगे ओर जिससे कर्णधारों को सबसे ज्यादा नुकसान होगा वे इस दर्द को समझते है लेकिन इसके प्रति चिंता को दर्शाना उनका कर्तव्य है और चिंता की रस्म अदायगी कर अपने कर्तव्य की इति श्री कर लेते हैं l
ऐसे केंद्र समाज और देश के विकास का आयना होते है मैंने उन्हें कहा कि
आपने
जो अपना चिंतन बताया है उससे लगता है कि निंदक नियरे राखिये की बजाय
चिंतक नियरे राखिये जिससे कुछ नया ज्ञान प्राप्त होता रहें l और आत्म
चिंतन पर चिंतन की प्रेरणा का प्रदुर्भाव होता रहें l
संजय जोशी "सजग " [ व्यंग्यकार ]
शुक्रवार, 15 अगस्त 2014
गुरुवार, 14 अगस्त 2014
सियासत का बढ़ता डिग्री सेल्सियस
सियासत का बढ़ता डिग्री सेल्सियस
कब्र में पांव लटकाये एक नेताजी कहने
लगे कि
राजनीति में जितना सोशल इंजीनियरिंग का जानकार होगा उतना ही सफल होगा
इसकी कोई डिग्री नहीं है फिर अपने आपको डॉ समझने वाले भी कम नही है
,सियासत तो तजुर्बा मांगती है और डिग्री केवल शिक्षा देती है तजुर्बा
नहीं l तजुर्बे वाला चलता नही दौड़ता है l मैंने कहा कि कब तक दौड़ेगा और
डिग्री धारी कब तक रेंगता रहेगा l उन्होंने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी और
चर्चा का अंत हुआ l
डिग्री -डिग्री के
शोर में सियासत के तापमान को कई डिग्री सेल्सियस बढ़ा दिया l सियासत में
डिग्री का सामान्यतया कोई ज्यादा महत्व नहीं रहता है और न
ही कोई जरूरत महसूस की गई यह व्यथा डिग्री धारी अधिकारी की है कि पंच
से लेकर देश के सबसे बड़े पद के लिए आवश्यक
शिक्षा और उम्र का कोई मापदंड नहीं है और न रहेगा क्योंकि बगैर
डिग्री,
नेतृत्व देने वाले नेताओं की एक परम्परा है कोई इसे कैसे तोड़ सकता है ?
सरकार चलाने वाले पर्दे के पीछे अपना काम करने
वाले डिग्री धारी अधिकारी कड़वा घूँट पी कर अपनी डिग्री को कोसते है कि
हमसे अच्छे तो ये है पर इनके बीच काम करना हमारी मजबूरी है हो सकता
है कि हमारे पूर्व जन्म के पाप का नतीजा हो पर सहना तो पड़ता है भारी
मन से और हमें लगता भी है कि कुछ नहीं होने वाला है l पुराने
लोग हमेशा यह उक्ति कहा करते थे कि ,पढ़ोगे लिखोगे बनोगे नवाब ,खेलोगे
कूदोगे बनोगे खराब ,वर्तमान के संदर्भ में -पढ़ोगे लिखोगे बनोगे खराब
,खेलोगे कूदोगे बनोगे नवाब l ,क्रिकेट में तो यह सच साबित हो रहा है बिना
डिग्री के
ही कहां से कहां पहुँच गये और हीरो बन गए l सियासत में भी यही हाल
है डिग्री की कोई वेल्यू नहीं है फिर भी सियासत का डिग्री सेल्सियस
डिग्री के कारण चरम पर है सियासत में रोज -रोज के तापमान का डिग्री
सेल्सियस
उतार चढ़ाव के नित नए आंकड़े छूता है l
एक युवा नेता ने कहा कि थ्योरी और प्रेक्टिकल में
भारी अंतर को समझकर कबीर दास जी
सब डिग्री वालों को पहले ही निपटा गए और कह गए पोथी पढ़-पढ़ जग मुआ पंडित
हुआ न कोय इसका सीधा मतलब है कि कितना भी पढ़ लो सर्वज्ञ नही हो सकते है l
और कहने लगे डिग्री तो
आपके ज्ञान को सीमित कर एक ही विषय का विशेषज्ञ बनाती है हमारे देश के
कर्णधार इस बात को बखूबी समझते है जब तो डिग्री के पचड़े में न पड़कर अपने
आप को हर
विषय का जानकार याने की सर्वज्ञ समझ कर किसी भी विभाग का जिम्मा ख़ुशी
-ख़ुशी लेकर देश की जनता की सेवा करना अपना कर्तव्य समझते है मैंने कहा
सही फ़रमाया जनता को एक प्रयोगशाला समझ कर प्रयोगधर्मी हो गए
,अच्छा हुआ तो हमने किया और बुरा हुआ तो देश की जनता जागरूक नहीं है l
देश में सियासत की डिग्री सेल्सियस को और उच्चतम करने में हमारा
दृश्य मिडिया भी कोई मौका नही छोड़ता है पर जब डिग्री पर ही डिग्री
सेल्सियस बढ़ने लग जाय तो ऐसे में ए.सी में भी दिमाग काम
करना बंद कर देते है l जिनके पास डिग्री नहीं है वे भी दुखी और जिनके के
पास
है वे भी दुखी l किस्मत अपनी -अपनी घोड़ो को घांस भी नसीब में नही और गधे
गुलाब जामुन ही नहीं च्वयनप्राश खा रहे है l कुछ बनियान में इतनी ताकत है
कि पहनने से लक बदल जाता है पर यहां तो सरकार बदलने पर भी लक नहीं बदलता
है हमारी विडंबना है l डिग्री कुछ मेहनत व ज्ञान से तो कुछ
जुगाड़ से प्राप्त करते है जब से व्यापम घोटाला बहुत चर्चित हो गया है उसके
बाद से
बेचारे डिग्री वाले को बुरी नजर से देखते है कि कहीं जुगाड़ की तो नहीं
है l
डिग्रियों की दुर्दशा यह है कि डिग्री सही रोजगार देने में बुरी तरह विफल
हैl नेता और अभिनेता दोनों का ही डिग्री से दूर-दूर तक कोई वास्ता नहीं
,जो चल गया सो चल गया l
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