सोमवार, 9 जून 2014

स्कूल गए हम [व्यंग्य ]




                                     स्कूल गए हम  [व्यंग्य ]


    आओ स्कूल चलें  हम  --अभियान के प्रचार प्रसार से प्रभावित होकर हम कुछ मित्रों ने स्कूलों  के भ्रमण का प्रोग्राम  बनाया कि  ऐसा क्या है आखिर इतना प्रचार किया जा रहा है और लोग बाग कन्नी काट रहे है ,कुछ तो नया होगा जब  इतना ही  ढोल पीटा जा रहा है सबने  सोचा चलो कुछ   नया अनुभव लें जिससे   अपनी सरकारी स्कूल  के प्रति धारणा  को बदलने में सहायता  मिलेगी ,और  फिर  हम दूसरों की   बदलेंगे --.  कि   कितना  है  दम   " आओ स्कूल चले हम.…… अभियान में l
                           हमारी मित्र मंडली ने एक दिन स्कूल के नाम पर ही समर्पित
कर   दिया कि   फ़टे में टांग अड़ा  फंसा कर ही रहेंगे , क्योंकि शिक्षा हमारी आने वाली पीढ़ी की  नींव है और वे राष्ट्र की अमूल्य सम्पदा  है  हमने कई स्कूलों की खाक छानी  और  कई छात्रों ,शिक्षकों  , व पालको से इस बारे में  चर्चा कर अपने दिमागी जाले झाड़ने  तथा ज्ञान और मत को बढ़ाने की चेष्टा की और उसमे सफल भी हुए l  सत्य हमेशा कड़वा ही होता है और सत्य परेशान हो जाता है पर पराजित नहीं  ,इसी बात को मद्दे- नजर रख कर प्रतिक्रिया देने का मन बनाया l जो किसे कड़वा,या  किसे मीठा लगेगा  क्या पता l हम सभी मित्रो के अनुभव का निचोड़ इस प्रकार है

                       हमने इस  पवित्र अभियान के उदेश्य के बारे में विचार विमर्श किया कि  आख़िर इसकी  जरूरत  क्या  है  ? एक मित्र बोला कि  यह एक कानून है कि हर बच्चे को शिक्षा मिले कोई  अनपढ़  न रहे   ,दूसरा मित्र बोला की स्कूलों  की दशा और दिशा सही कर ले तो भीड़ आ जायेगी , तीसरा बोला आज के महंगाई के युग में कौन   पसंद  करता है बच्चों  को निजी स्कूल में भेजना। पर क्या करें  एक पिता होने के नाते वह अच्छी शिक्षा देकर अपना फर्ज पूरा करता है और सरकार  का  केवल दिखावा मात्र है यह अभियान lजन नेताओं को सरकारी स्कूल से मतलब ही नही  उनके  बच्चे तो विदेश जाते है शिक्षा ग्रहण करने l
                      सरकारी स्कूल तो केवल औपचारिकता  मात्र रह गए है सरकार अपने कर्तव्य की इतिश्री कर लेती है , निजी स्कूलों में भारी भीड़   ,सीट  भी खाली नही है एक -एक सीट के लिए  जद्दोजहद ,प्रवेश बंद का बड़ा बोर्ड लगा है ताकि और डोनेशन की प्राप्ति हो सके और सरकारी  स्कूल खाली और वीरान पड़े है तभी आओ स्कूल चले हम जैसे अभियानों पर सरकार करोड़ो रुपये व्यय कर रही है पर   स्थिति वहीं ढाक  के तीन पात l कभी -कभी डर  लगता है कि कहीं सरकारी स्कूल विलुप्त न हो जाये  नहीं तो आने वाली पीढ़ी के लिए यह  पुरातत्व की सामग्री हो  कर  इतिहास का हिस्सा बन जायेगी , जैसे  हमारे प्रदेश मे से रोडवेज  गायब ही हो गई,उसी तरह  स्कूल  भी गायब न हो जाए l
    मध्यान्ह  भोजन भी सरकार का छात्रों की संख्या बढ़ाने का उपाय  हैं पर  यह भी विफल हो गया और छात्रों और पालकों  का विश्वास उठ गया कब  कौन सा जीव जंतु   निकल जाये खाने में l पालक कहते  है खाना ही सही न दे सके सरकार तो  वह शिक्षा क्या देगी l सरकारी योजनाओं  के नाम मोटे दर्शन खोटे ,हकीकत  से कोसों दूर l
                  स्कूलों की हालत बहुत खराब है गदंगी  की भरमार है भवन है तो शिक्षक नही है ,शिक्षक है तो भवन नही है अगर दोनों हैं तो छात्र नही है l कई जगह जान हथेली पर  रखकर जाना पड़ता है जब तक बच्चा वापस न आये  पालक परेशान रहते है l बेचारा शिक्षक ,सभी सरकारी काम  के बोझ तले दबा हुआ है पढ़ाने  के अलावा  सभी कार्य करना है किसी ने सही कहा  है कि  शिक्षक राष्ट्र निर्माता  होते है तभी तो शिक्षा के अलावा सभी कार्य  करना उसका कर्तव्य है उसका ही है  जहां  शिक्षक  का शिक्षा से कोई वास्ता नही ,पालक कैसे अपने बच्चे को ऐसे स्कूलों में भेजे ,  मूलभूत सुविधा का अभाव,ड्रेस ,किताबों  ,व अन्य सरकारी योजनाओं का लाभ जरूरत मंद को नही मिलना ,पग -पग पर भ्रष्टाचार  ने कइयों  के हक को मारा है यह खेल बदस्तूर चालू रहता  है यह  हमारी विडंबना ही  है और   "जब स्कूल  गए  हम , इस अभियान में नही है दम --,जन -जन का विश्वास हो गया है कम --छात्र, पालक ,शिक्षक को हरदम रहता  भरम ।

गुरुवार, 5 जून 2014

हम है दुश्मन पर्यावरण के …… ? [ व्यंग्य ]

०५ जून पर्यावरण दिवस के उपलक्ष्य में ----------
                           
                             हम है दुश्मन पर्यावरण के     …… ? [ व्यंग्य ]   


        आज विश्व में पर्यावरण दिवस मनाया जायेगा हमारे देश में भी मनाने का दिखावा किया जायेगा l विदेशों  में इसे गंभीर  हो कर असलियत में और हमारे देश में मात्र औपचारिकता की जाएगी ,  मनाना  है  इसलिए मनाते है और जानते है होना जाना क्या ? जो इसे ज्यादा  दूषित कर रहे है और करते रहेंगे वो ही सबसे  ज्यादा  इसका राग  जोर शोर से अलापते है  तथा  इस दिन झूठी शपथ ,लेक्चर ,पोस्टर आदि लगाकर अपने कर्तव्य की इतिश्री कर लेते है l जब तक  हम पर्यावरण को अपना धर्म नही माने  तब तक नई -नई  विपदा और  आपदा को आमंत्रण  देते रहेंगे l प्रकृति से हम सब कुछ  लेना ही जानते है देना सीखा  ही नहीं   क्या करै  अपनी संस्कृति जो भूल गए l बुरे काम का परिमाण बुरा ही होता है l

        एक पर्यावरण प्रेमी ने अपनी व्यथा को कुछ इस तरह व्यक्त किया कि  --हम ही तो है दुश्मन पर्यावरण के l  विकास के नाम पर जितने पेड़ कटवाए उसका कुछ  भी अंश   नहीं लगाया ,केवल वृक्षारोपण के नाम पर अपना नाम चमकाया ,फोटो ,वीडियो क्लिप ,और  समाचर छपने तक ही सीमित रखा जिस पौधे को रोपा उसका क्या  हश्र हुआ किसे चिंता  फिर उसी स्थान पर  किया जाएगा यह क्रम चलता रहेगा और कागज पर वृक्षारोपण  होता रहेगा बड़े बड़े आकर्षक  नाम से ये अभियान पुकारे जायेंगे  इतिहास के पन्नों  पर l पर  ये सब प्रकृति से खिलवाड़ ही  तो है ,हाथी के दांत खाने के और दिखाने के और होते है l

     पर्यावरण  के लिए सर्वाधिक घातक  पोलिथिन बेग ,डिस्पोजल  से हमे विशेष प्रेम हो गया है जीवन इन्ही पर आधारित हो गया दुष्परिणाम के बारे सोचने  की फुर्सत  किसे है ,दुकानदार से पोलिथिन मांगने पर शर्म नही गर्व की अनुभूति होती है l
       पानी चाहत में इस धरा को छलनी  कर  इतना दोहन कर लिया  है कि  ईश्वर  ही जाने l ,केमिकल व गंदे पानी ने जहां पवित्र नदियों को अपवित्र कर दिया  है पानी  तो अब आचमन के लायक भी नहीं   बचा  है सरकार शुद्धिकरण के बड़े -बड़े सपने  दिखाती है और हम देखते है जनता को बेचारी  मुंगेरी लाल बना दिया कि  सपने देखो और मस्त रहो  वाह हम कितने प्रगतिशील होते जा रहे है  सपनों  में l
,     बेचैन है चैन से सांस लेना भी दूभर है हर कोई बीमारी से ग्रस्त है सरकारें  व  जनता  बीमार है विश्व गुरु कहलाने वाला यह देश अपने सांस्कृतिक मूल्यों को छोड़कर विकसित राष्ट्रों द्वारा  अपनी पर्यावरण की सुरक्षा हेतु बंद किये उत्पादनों को बनाकर विदेशी मुद्रा के लालच में जनहित के साथ खिलवाड़ कर रही और निर्यातक बन कर इठला रहे है पर्यावरण का  हाल  बेहाल है फिर भी हम २१ वीं  सदी में जी रहे है यह क्या कम है l
                      पर्यावरण की चिंता करना फैशन  और आधुनिकता की निशानी है   अत; चिंता करते है ,ग्लोबल वार्मिग का रोना रोते है l  देश में कानून  तो है पर भ्रष्टाचार रूपी रावण  ने इन्हे  बौना कर दिया है पर्यावरण संरक्षण हमारा कर्तव्य और धर्म होना चाहिए परन्तु कुछ ने औद्योगिक क्रांति की दुकानदारी के नाम पर इस पावन उदेश्य की बलि चढ़ा दी है l ऊपर से पर्यावरण के प्रति प्रेम दिखाना और हानि पहुँचाना  इस लोकोक्ति को चरितार्थ करते  है कि  "जड़ काटते जाओ और पानी देते जाओ l
              पर्यावरण प्रेमी के  अनुसार इसकी कथा  और व्यथा अनंता है समय कम हैl
कहने लगे की हमें  यह कसम खाना पड़ेगी  हम  सुधरेंगे तभी जग का पर्यावरण सुधरेगा l इस हेतु चिंतन मनन नहीं  , कुछ करने की जरूरत है  और इस  क्षेत्र में कुछ कर गुजरने का मन करेगा उस दिन हम दुश्मन से दोस्त बन जायेंगे  पर्यावरण के .l मैंने कहा आप खामख्वाह  परेशान हो रहे है शासन प्रशासन  और जनता इस और गंभीर नही है तो आप जैसे लोग क्या कर लेंगे  ?आपके प्रयासों की  उनके कान  पर जूं तक नही रेंगती  है फिर वह  तनाव की मुद्रा में कहने लगे हम हमारा काम मरते दम  तक करते रहेंगे और पर्यावरण के दुश्मन की बजाय मित्र बनकर जागृति लायेंगे  l मैंने  उनकी पर्यावरण के प्रति अगाध श्रद्धा के प्रति नत मस्तक होकर प्रण लिया की इस और प्रयास किया जाना जरूरी है और करेंगे l

मंगलवार, 3 जून 2014

----- इमोशनल ब्लेक मेल की कला ---------

                    -----   इमोशनल ब्लेक मेल की कला ---------

     इमोशनल ब्लेक मेल भी एक  कला है इसका कारगर  हथियार की तरह उपयोग किया जाने लगा है ,जो  इमोशन्स को भुनाने  की कला  में जितना  माहिर होता है वह उतना ही सफल होता है  इसे अपने जीवन का   हिस्सा बना लिया है इसमें  मुख्य रूप से डॉ ,बाबा और नेता कदम -कदम पर  ,इमोशनल ब्लेक मेल के सहारे अपना हित साध लेते है वे कहते है की इसमें हमारा क्या दोष  है यदि कोई  भावना के प्रवाह में बह जाये उससे हमारा उल्लू  सीधा हो जाये तो हर्ज क्या है हम तो अपना फर्ज   अदा कर रहे है  फिर चाहे किसी के ऊपर  कर्ज हो जाये।यह एक खतरनाक खेल बन गया है ऐसे कई विज्ञापन जो इमोशनल ब्लेक मेल कर अपना  उत्पाद  खरीदने को मजबूर कर देते है क्योंकि  हम    आसानी से  भावुक  होते है l 
  
       प्रसूति के समय और गम्भीर बीमारी के समय  कुछ डॉ जिस तरह मौके  की नजाकत को भांप कर इमोशनल ब्लेक मेल करते है कि  अच्छे -अच्छे अपने आप को कठोर दिल का समझने  वाले भी पिघल जाते है और इमोशनल ब्लेक मेल की कला से सम्मोहित से हो जाते है और डॉ को कहते है की जैसा आपको उचित लगे वह करिये  खर्चे की चिंता न करे  डॉ सा का काम आसान हो गया और नोट छापने का काम चालू  हो गया यह इमोशनल ब्लेक मेल की कला का  ही  कमाल  है l
    तथा कथित संत बाबा भी इस कला के माध्यम  से लाखों  करोड़ो आसानी से ऐंठ लेते है यह सब इमोशनल ब्लेक मेल में  इतने माहिर होते है कंजूस को भी भावना से  भड़का कर उसे भी  मजबूर कर देते है जैसे सूखे हुए नीबू से रस कैसे निकलेगा  इन्हे महारथ हासिल है l
                   चुनाव में इमोशनल ब्लेक मेल का कार्ड खेलकर वोट हथियाने  की हर नेता और हर दल पुरजोर कोशिश करता है ,जो जितना इसमें निपुण होता है वह उतना ही
सफल होता है ,जीवन में पग -पग पर जो इसकी नौटंकी कर सके वही इस भावनात्मक
महासागर में तैर  सकता है l
                       
                       किसी सरकारी /निजी संस्थान में छुट्टी की इतनी मारामारी रहती है कि कुछ को तो हर बात पर छुट्टी चाहिए क्योकि यह उनकी आदत में शुमार है वे किसी की मौत  या बीमारी बताकर  इमोशनल ब्लेक मेल का सहारा लेकर ,मरे हुऐ को कई बार मार देते है जो इस धरा पर आया ही नहीं  उसका भी उपयोग  कर लेते है   हर मनुष्य भावना से ओतप्रोत  रहता है  जिसका फायदा उठानेवालों  की कमी  नहीं  है l

                   इमोशनल ब्लेक मेल ने जहां  मनुष्य को असवेंदनशील  बनाने में महत्व
पूर्ण भूमिका है l समय -समय पर इमोशनल ब्लेक मेल  का फायदा हर कोई उठाने को आतुर रहता है चाहे राजा हो या रंक ,गरीब हो या अमीर ,संत्री  हो या मंत्री ,छात्र हो या शिक्षक ,मरीज  हो या डाक्टर ,महिला हो या पुरुष। हर मनुष्य की  यह स्वाभाविक प्रवृति है कोई इससे अछूता नही हैl इसका तड़का न हो तो समाज में नीरसता का भाव पनपने
लगता है हम इसके आदि  जो हो गए  हैं l
              
  संजय जोशी 'सजग "[ व्यंग्यकार ]

बुधवार, 7 मई 2014

मॉर्निंग वाक और मोबाइल [व्यंग्य ]


          मॉर्निंग
वाक और मोबाइल
  [व्यंग्य ]

     जब से चलित दूरभाष [मोबाइ ] की क्रांति हुई है  तब से मोबाइ लेकर घूमने की  परम्परा अपने आप शुरू हो गई चलते हुए बात करना फैशन हो गया और ऐसा  करने वाला मानो अपने आप को आधुनिक दर्शाने का उपक्रम करता है सुबह और शाम  के भ्रमण  करने की बात ही कुछ ओर है पैदल घूमना स्वास्थ्य  के लिए लाभकारी है  ऐसा डॉक्टर कहते है खूब घूमो इसलिए घूमता है पर  आदत  से लाचार है इसलिए  बेचारा मोबाइ लेकर घूमता है आजकल  सबका  परम प्रिय जो बन गया है सब उसके बड़े  दास हो गये है कि लगता है उसके बिना पल पर भी नहीं रह सकते क्योंकि  वह उसे यह अहसास कराता है कि  दुनिया मेरी  मुट्ठी में है मुझे भी मोबाइफोबिया हो गया है और हमेशा वह मेरे साथ होता है यह  मेरी .जान से भी  प्यारा   है और सामाजिक  संबधो का पिटारा .इसके बिना जीवन अधूरा सा लगता है l
  
   मैंने एक अनुभव किया कि प्रात:भ्रमण के दौरान सीनियर सीटिजन घूमने
  की पूरी आचार संहिता का पालन करते है वह इस पिटारे को अपने साथ नही रखते वे इसे  बीमारी  की जड़ मानते हैl मुझे .ऐसे ही सीनियर  सीटिजन श्री शर्मा जी .....मिले .मैंने  उनसे पूछा कि  परम श्रद्धेय .शर्मा जी आप  मोबाइल साथ  क्यों  नही रखते वे सुनते ही आग बबूला हो गये में सहम गया मैंने   विनम्रता  से कहा मुझसे क्या गलती हो गई आप खामख्वाह नाराज हो गये ,इसके बाद उन्होंने   प्रात: भ्रमण करने वालो के बारे  में सब कुछ बयां कर  डाला , कुछ इस तरह कि हम तो पूरे वर्ष  ही  प्रतिदिन घूमते  है और यह दिनचर्या का अहम हिस्सा है  हमारी सेहत का भी यही राज है हम जैसे लोग बिरले ही होते है इसी  मॉर्निंग वाक कि वजह से हम आपके सामने है वरना आजकल तो जीवन रेखा छोटी होती जा रही है लोग  दिखावा ज्यादा करते है l

    उनका शाब्दिक प्रवाह  निरंतर जारी था उनके अनुसार कुछ लोग घूमने
 नहीं मोबाइ पर बात करने ही  निकलते है हमारा तो केवल एक सूत्रीय कार्यक्रम है घूमो  और सेहत को चूमो ,जब से मोबाइल क्या आया मॉर्निंग वाक.के उद्देश्य का सत्यानाश कर  दिया मेरे  अनुभव व सूक्ष्म ज्ञान के मुताबिक अब इसका स्वरूप इस कदर बिगड गया .अब आपको मॉर्निंग वाक पर दो और तीन सूत्रीय वाले ही मिलेंगे एक सूत्रीय वाले  हम जैसे बड़ी मुश्किल से मिलेंगे ,द्विसूत्रीय वालों  का  घूमने पर कम मोबाइ पर  ध्यान ज्यादा  होता है वे  किसी से भी टकरा जाते है क्योकि  इस श्रेणी वाला तो मोबाइल से बातचीत में  मशगूल रहता  है और  विशेष टाइप के तीन  सूत्रीय  वाले   होते है उनका तो भगवान ही मालिक है एक हाथ में कुत्ता  और दूसरे  हाथ में मोबाइल इनकी स्थिति विचित्र होती है .दूसरो  को उनसे बचते हुए अपना  ध्यान रखना पड़ता है वह मोबाइल  में मस्त और व्यस्त है  उनका कुत्ता  कहीं काट न  खाए का डर हमेशा बना रहता है पता ही नही खुद घूमने  निकला है, कुत्ते को घुमाने या मोबाइल पर बात करने  .I दिसूत्रीय और त्रिसूत्रीय  एक सूत्रीय वाले के लिए परेशानी का कारण बन इठलाते हैl और कमबख्त चुनाव के समय तो और भी खराब हो जाता है शुद्ध हवा में चुनावी बयार घुलने से एक विचित्र बेचैनी होने लगती है और घूमने का मजा किरकिरा हो जाता है l  
    शर्माजी जी की
  व्यथा की  कथा  निरंतर जारी थी लग रहा  था कि बरसों  की  भड़ास निकाल  रहे हैं .उनकी   व्यथा  बिलकुल सही थी l बारिश और ठण्ड में तो कोई नही आता गर्मी आते ही घूमने  वालो की बाढ़  सी आ जाती है ,बैचारे ट्रेक  सूट और स्पोर्टस  शू  की किस्मत के वे वारे न्यारे   हो जाते है जो साल भर  में दो या तीन महीने ही हवा खा पाते  है फिर कैद कर  दिए जाते है वो भी अपनी किस्मत को कोसते होंगे काश हमारी भी किस्मत ऐसी  होती कि हमेंशा साथ  रहें ..मोबाइल की तरह .जिसे सब अपनी  जान से भी ज्यादा  चाहते है और हमेशा अपने से चिपकाये रहते है l


रविवार, 4 मई 2014

आज विश्व हास्य दिवस है ....आज तो मुस्कराइए ......[व्यंग्य ]








आज तो मुस्कराइए ......[व्यंग्य ]

आज विश्व मुस्कान  दिवस के अवसर पर मुस्कुराना हमारी मजबूरी है औपचारिकता का तकाजा है आज जो हंसने का अभिनय नही करेगा उसे आधुनिक नही माना जायगा .आज सभी इलेक्ट्रानिक संचार माध्यम मुस्कान को बिखेरेंगे ,विश्व मुस्कान  दिवस में अपनी भागीदारी  दर्ज करने में व्यस्त रहेंगे

       सच में हम ईश्वर  प्रदत्त मुस्कान भूल  गये है ऐसे में  दिवस  याद दिलाते रहेंगे कि मुस्कान भी जीवन के लिये  जरूरी है क्योंकि आजकल  नेचरल मुस्कान की  जगह  सांकेतिक मुस्कान का दौर चल रहा है .इंटरनेट ओर मोबाईल .....से  आभास ..होता रहता है ...दिल से हँसना अब बचा कहाँ है 

  कोई जबरन  बनावटी मुस्कुराहट  बिखेरता है  तो कुटिलता की श्रेणी में माना  जाता है मुस्कुराहट जीवन से ऐसे गायब  है जैसे गधे के सिर से सींग योंग ध्यान के महायोगी भी  शरीर के अंदर से मुस्कुराहट खींचने में सफल नही हो पाये है क्योकि तनाव सब पर भारी है उन्मुक्त हंसी  तो अब  सिर्फ . ...टूथ पेस्ट के विज्ञापन में ही नजर आती है

हँसना और मुस्कुराना सामाजिक परिवेश पर भी निर्भर करता है  ,वर्तमान प्राकृतिक राजनीतिक .सामजिक ..व्यथा इसकी अनुमति नहीं देती ..और रही सही कसर हमारे न्यूज़ चैनल्स किसी भी मुद्दे  के चिंता  करने की ठेकेदारी ...इनकी ही तो है ये मुस्कान को  उभरने ही नहीं देते

  बच्चे शिक्षा के बोझ तले उन्मुक्त और सहज हंसी से वंचित है मजे तो हमने खूब किये हमारे जमाने में.ये बेचारे  मुस्कराना ही नही जानते तो ..खिलखिलाहट ....की क्या बात करें हंसने मुस्कराने की क्षमता  भगवान ने केवल मनुष्य  को ही दी अन्य प्राणियों को नही मनुष्य फिर भी न हँसता है न हसंने देता  हैं, इसका मतलब  शायद .हम ..पशुता की और अग्रसर है मुस्कराना भी एक कला है और जो दूसरों को मुस्कराने को मजबूर कर दे वह महा कला है .मुस्कान भी कोटि -कोटि की होती है जो इसे सही पहचाने वह महामानव होता है
     मुस्कान स्वास्थ्य को अच्छा और रक्त संचार नियंत्रित रखती है यह डाँक्टर का काम करती है अत:डाँक्टर मुस्कान कह सकते है मुस्कान एक  अस्त्र का काम भी करती है जो कई को  घायल और कायल बना देती है एक मुस्कान बदले आपकी जिन्दगी ...मुस्कुराते रहिये


मेरे मित्र हंसमुख भाई ..मिले मैंने उनसे कहा . एक बार मुस्कुरा दो वह बोल उठे क्यों मैंने कहा ..भाई ..आज विश्व मुस्कान दिवस है . वे सड़ा सा मुँह बना के बोले कैसे हंसू देश और समाज का सत्यानाश हो गया है दर्द इतने बढ गये की मुस्कान आती नही बाय चांस भी नही आती क्योकि बचपन में दोस्त कहते थे हंसा की फंसा   उसे आज तक मान रहा हूँ मैंने छेड़ते हुए कहा कि  आपका नाम  हंसमुख  किसने रखदिया वह बोले ..नाम में क्या धरा है हंसमुख की व्यथा सही थी कदम -कदम पर जीवन की राह कठिन ,बढती महंगाई, बढ़ते अत्याचार, बलात्कार ,भ्रष्टाचार ,झूठ ,फरेब ऊपर से घोर मंदी गिरते रुपये   के चलते मुस्कराहट न आना लाजमी है
      अपराधी चुस्त ,सरकार सुस्त ..हम कैसे रहे तंदरुस्त  ..ने आम आदमी ..की ख़ुशी और मुस्कान को  ग्रहण लगा दिया है .मुस्कान मांगने पर भी नही मिलती ....फिर भी आज तो मुस्कराइए ......

संजय जोशी 'सजग '

बुधवार, 23 अप्रैल 2014

पराधीन सूख सपनेहूँ नाही [व्यंग्य ]

   पराधीन  सूख सपनेहूँ  नाही [व्यंग्य ]


    हम सब राजनीतिक पराधीनता से ग्रसित और व्यथित है हमे राजनीतिज्ञ जो सपने दिखाते है उसे देख कर हम अपने भविष्य का ताना  बाना बुन लेते हैं और सपने देखने में तल्लीन हो  जाते है और हमारा  मीडिया अपनी निष्पक्ष छवि को कायम रखने में गच्चा खा जाता है या ऐसा अहसास कराता  है क्योंकि  वह भी सच से दूरी बनाकर सपनों  को मसालेदार और चटखारेदार बनाकर परोसने का काम करता है जिससे जन -जन सब भूल कर उन सपनो में खो जाता है और हसीन सपने देखने लगता है l सपने दिखाना राजनीति का हिस्सा है और देखना हमारा प्रकृति प्रदत्त एक गुण है जो केवल  मानव के पास ही है अत; वह इसका पूरा दोहन करता है lचायना के  माल की तरह देश की राजनीति का कोई भरोसा नही है ...देश के विकास के लिए कसमें खाना आसान और निभाना बहुत दुरुह  है ..दूसरों  की गलती का फायदा  ये लोग कब तक उठायेंगे  है तो सभी एक थैली के चट्टे  -बट्टे  I

                    वर्तमान में कई लोग मुंगेरीलाल की तरह हसीन सपने देखने में लगे है कि अच्छे दिन आने वाले है इससे कई लोगों को तो संपट पड़ना बंद हो गया और वे स्वप्न लोक में विचरण करने लगे है ,सब अपने -अपने स्वप्न अपनी कल्पना के आकार  के अनुरूप  हसीन सपने देखने में मशगूल है कुछ ने तो अभी से ही काम करना बंद कर दिया कि सबके  अच्छे दिन आ ही रहे है बाकि सब बाद में देख लेंगे अभी तो खाओ पियो ऐश करो की राह पकड़ ली है युवा तो इस कदर भ्रमित  है कि  नया सोचना ही छोड़  दिया है  कुछ युवा तो सब कुछ छोड कर फेस बुक ,ट्विटर  और वाट्सएप  के  माध्यम से  अपने सपने ढूंढ रहे है युवा शक्ति और युवा जोश से अपना होश खो कर हर हाथ शक्ति और हर हाथ  काम के सपने को अपने दिल में समाये  बैठे  है  तो कोई  है कि  सब चीज फ्री  पाने  की जुगत और बिना मेहनत के जीने के सपने में व्यस्त और  मस्त है सभी दलों ने कुछ -कुछ सपने दिखाए  है l आप और हम जानते  ही हैं कि  सपने कितने सच होते है l एक गाने के बोल भी है सपने तो सपने कब हुए अपने आँख खुली और टूट गए l
                                 
   जिस दिन से  चुनावी महासमर का आगाज हुआ उसी दिन से मीडिया ने भी कमर कस ली , पर हर किसी के बस में नही कि  राजनीति  को इतना  झेला जाये टीवी आँन  करते ही रैली का रेला ,रोड़ शो ,अनाप शनाप बयान  और आकषर्क विज्ञापन जो तरह -तरह से वोट की गुहार कर रहे है  कहीं हवा , कहीं आंधी ,कहीं लहर , कहीं  सुनामी की खबरों ने करीब करीब सबको पका दिया है , आखिरी  दिन तक ऐसा ही चलेगा जिसमें   हर दल स्वहित की बात करेंगे और उन सपनो में जनहित के  मुद्दे इतने शोर में यूँ ही दब जायेंगे  कि  पता नही  चलेगा सपने किस करवट पर बैठेंगे। तुलसी दास जी ने सही ही कहा  है …

              पराधीन सूख सपनेहूँ नाही l
              सोच -विचार देखि मन माहि l l            

सोमवार, 14 अप्रैल 2014

घोषणा पत्र का झुनझुना [व्यंग्य ]

घोषणा पत्र का झुनझुना [व्यंग्य ]

                आम तौर  पर छोटे बच्चे को बहलाने फुसलाने के लिए झुनझुने का प्रयोग
किया जाता है उसकी आवाज और आकृति बच्चे के मन और मष्तिष्क पर इस कदर
प्रभावशाली होती है या यूँ कहे कि वह उससे सम्मोहित हो जाता है और वह  अपनी पुरानी
अवस्था से बाहर निकल कर  सबकुछ भूलकर खुश होकर आशावान हो जाता है कि सब अच्छा होगा l चुनाव में  घोषणा पत्र झुनझुने कि भूमिका में होता है ,हर पार्टी इस झुनझुने के सहारे नैया पार करने कि अभिलाषा रखता है यह केवल आश्वासन का पुलिंदा  मात्र होता है जेसे बच्चो के लिए अलग -अलग डिजाइन और अलग -अलग आवाज वाले झुनझुने होते है उसी की  तर्ज पर घोषणा पत्र भी स्वार्थ के मुताबिक और लोक लुभावन होते है जनता इस झुनझुने से अपने सब दुःख दर्द भूलकर नई  उम्मीद कि किरण खोजती है शॉर्ट टर्म  मेमोरी होने कारण  फिर माया जाल में फंसकर वही गलती कर बैठती  है  हमेशा की तरह , सिर्फ लेबल बदलने से कुछ नही होता है l
                 
                       हर चुनाव में भांति -भांति  के झुनझुने बजाने का काम किया जाता है
आजकल फ्री याने मुफ्त में बांटने कि होड़ लगी है हर कोई इस ब्रम्हास्त्र का उपयोग करने
को उतारू है स्वार्थ  कि भावना  कूट -कूट कर  जो भरी है बस उन्हें तो केवल वोट चाहिए और येन केन प्रकारेण सत्ता चहिये इसलिए घोषणा पत्र का झुनझुना बजाते है और अपने आप को गर्वित महसूस करते है तब यह भूल जाते है कि  देश में खाद्यान्न  का उत्पादन करने वाला किसान आत्महत्या क्यों करता है उत्पादन और  वितरण के बीच में कितनी बड़ी खाई है यह हमारे  देश की  राजनीति कि विडंबना है कि बड़े -बड़े दावे और वादों  के  बीच  उसकी चीख सुनी नहीं  जाती है या उससे कोई सारोकार ही नहीं   है l इस कला में वे इतने निपुण हो गये कि हम  सब को बौना  ही समझते है l
                  अभी तो घोषणा पत्र का झुनझुना बजाकर अपना उल्लू सीधा कर लेते है और हम सबको  अगले चुनाव तक उल्लू बनकर रहना पड़ता  है यह तो उनका चुनाव जीतने का हथकंडा  मात्र है जीतने के बाद में तो आँख दिखाकर कदम -कदम
पर अत्याचार ,शोषण ,भ्रष्टाचार ,वादा खिलाफ़ी के ढोल बजाने  लगेगे और पास के ढोल
हमारे कान पर कहर  बरसाएंगे l बुद्धिजीवियों   और श्रमजीवियों का जुमला  है कि कोई भी जीते कोईभी हारे हमें  क्या फायदा सही भी है इतने सालों  का तजुर्बा सबको  हो चुका है l कितनी सटीक कहावत है कि "कोई नृप होय हमें  का हानि "l