मंगलवार, 31 दिसंबर 2013

नव वर्ष की शुभकामनाए

नव वर्ष की शुभकामनाए
     १
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सुख समृद्धि
मिले जग प्रसिद्धि
यही कामना
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     २
नूतन  वर्ष
उम्मीद और हर्ष
बड़े उत्कर्ष
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   ३
बदला साल
संकल्प हो विशाल
बने मिसाल
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      ४
अभिनन्दन
नव वर्ष वन्दन
शुभकामनाए
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        ५

बढे सम्मान
नव बर्ष मंगल
छाए खुशिया
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------------संजय जोशी "सजग "

शनिवार, 21 दिसंबर 2013

टेंशन का भूत

                             
                                                  
                                                               टेंशन का भूत
   
       मनुष्य प्राणी मात्र  के चारों ओर टेंशन के भूतो का डेरा लगा हुआ है सही  भी  है सभी टेंशन में मग्न रहते   है और एक दूसरे को टेंशन में देखकर सुख की अनुभूति करते है  अगर गलती से अपनी ख़ुशी का  इजहार कर भी दिया तो आपकी ख़ुशी को दमन करने का षड्यंत्र रच दिया जाता है वे अपने ही होते है जो  टेंशन के इतने आदि है कि न खुश रहेगे और न दूसरो को  रहने देगे  यह सब  आदत बन चुकी है दिल है की मानता ही नही ..बिना टेंशन के I

                         अपुन तो सामजिक प्राणी होने के नाते अपना फर्ज अदा कर मिलने वालो के हाल चाल   यदा-कदा पूछ लेते है हमेशा  की तरह यही सुनने को मिलता है बहुत टेंशन में हूँ क्या करे ,यह  सब राजनीतिक, सामजिक ,राष्ट्रीय .,अंतराष्ट्रीय समस्या की चिंता करने की मानसिकता जो बन गई  है  I

                            टेशन आजकल चर्चा का मुख्य विषय बनता जा रहा है इसके बिना
न कोई चर्चा शुरू होती है न खत्म I यह एक राष्ट्रीय समस्या बन गई है इसकी की न कोई सीमा ,न कोई आकार  बस टेंशन तो टेंशन है I कंप्यूटर , इंटरनेट .और मोबाईल के विस्तार ने जहाँ दुनिया को छोटा किया वहीं टेंशन को  बहुत  बड़ा कर दिया I
               हमारी कालोनी में तथाकथित बुद्दिजीवियो की भरमार है यहाँ सब टेंशन लेने और टेंशन देने  में पारंगत  है ,एक महाशय से मैंने पूछ लिया  की भाई सा क्या हाल चाल है वह तुनककर बोले बहुत टेंशन है और क्या होगा  कलियुग में , मेने सहज होकर कह कि क्यों टेंशन लेते हो क्या होगा इससे ,अपने स्वास्थ्य पर ध्यान दीजिये इस पर गम्भीर  होकर बोले की रोज यही सोच कर सोता हूँ कि कल से टेंशन बिलकुल  नही पालूंगा पर वह सुनहरा कल कब आएगा पता नही ..सुबह उठते ही कमबख्त न्यूज़ चेनल और अखबार फिर टेंशन में धकेल देते है ..उनका भी क्या दोष है देश में हत्या, अपहरण ,बलात्कार , भ्रष्टाचार,रिश्वत , दुर्घटना ,पेट्रोल व डीजल के भाव .महगाई,रूपये व शेयर का गिरना और आजकल यौन उत्पीडन के बढ़ते मामले जीवन को सुकून नही टेंशन  ही देते है समाज में उच्च स्थान रखने वाले ..नेता .संत और पत्रकार लोग ऐसा करेंगे तो आम जन  का टेंशन बढना लाजमी है I हमारे शरीर में कोई सेफ्टी वाल नही है ..जो ..प्रेशर कुकर की तरह ...ज्यादा प्रेशर होने पर अपना काम करता है और दुर्घटना नही होती . मनुष्य नाम के प्राणी  तो  इश्वर को प्यारे हो जाते है
 
    पहले के जमाने में बीमार होने के बाद अस्पताल जाया करते थे आजकल बीमारी के पहले ही प्री.मेडिकल चेकअप..कराना पड़ता है  अब रिवाज बन चुका है है जो न कराये वह   आधुनिक नही कहलाता ..यह सब टेंशन का कमाल है आधुनिक जीवन शैली में हम
चारो तरफ से मशीनों से घिरे है अपने हाथ -पाँव हिलना भी बंद होगये है और शरीर जाम सा हो गया है   जिसका आलम तनाव  Iफास्ट फ़ूड खाकर जीरो फिगर के लिए संघर्ष करना हमारी प्रवृति और इससे निवृति टेंशन देता  है
           आजकल राजनीति में कुछ ज्यदा ही टेंशन चल रहे है ...कोई "आप" की जीत से
विचलित है तो कोई काग्रेस की हार से तो कोई दिल्ली में सरकार न बनने से मिडिया वाले
का बस चलता तो ..शपथ  ..करा चुके होते क्या करे बेचारे ..चीख -चीख कर ही खुश है और कर भी क्या सकते है आप ने इतना टेंशन दे दिया है अच्छे -अच्छो की  नींद व होश उड़ा रखे है राजनीति के शुद्धिकरण का  प्रयास जारी   है कितना सफल होगा यह तो वक्त बतायेगा
             मानसिक शांति हेतु .ध्यान  योंग ,प्राणायम के कई बिजनेस चल रहे है
फिर भी ढाक के तीन पात Iटेंशन का यह भूत एक नयी  भावनात्मक  बीमारी को जन्म दिया वह  है  'मूड"खराब है  कोई टेंशन में है इसलिए मूड खराब है और कुछ मूड खराब है इसलिए टेंशन में है  यह माजरा रिसर्च  का  हो गया है और जिनको ये दोनों मे से कुछ भी  महसूस नही होता लोग उसे आगरा की याद दिला देते है तुम उसके लायक हो  आपको कुछ भी नही होता..याने मानसिक समस्या से ग्रसित लगते हो और उसे भी टेंशन देकर अपना पुनीत कर्तव्य करने से बाज नही आते टेशन युक्त समाज के निर्माण में अपनी अहम  भूमिका का निर्वाह करते है ऐसे  समाजिक प्राणी बहुतायत में पाये जाते है
उनका एक ही सपना सब पालो टेंशन अपना ..बिना टेंशन के जीने  में कोई जीना है


मानवता पर टेंशन या टेंशन पर मानवत हावी है I टेंशन .कहीं भी .कभी भी किसे भी अपनी गिरफ्त में ले लेता  है और भूत सवार हो जाता है I

बुधवार, 20 नवंबर 2013

वोटर देवो भव: [व्यंग्य ]

                            
                      
                                       वोटर देवो भव: [व्यंग्य ]

        चुनाव का मौसम आते ही वोटर सभी  दलों और नेताओ के लिए  मुख्य  हो जाता है वोटर लोकतंत्र की महत्वपूर्ण कड़ी है ,देश की सरकार बदलने वाले वोटर की दशा नही
बदलती है फिर भी वोट देकर अपना फर्ज निभाता है जिसको दिया वोट उसने ही किया हम सबको बोट ,यह राजनीति की परम्परा है जनता की सेवा और विकास के नाम पर
वोट मांग कर   बस अपने  कुनबे का विकास और खुद ही मेवा खाते है चुनाव के समय
वोटर  हर दल और हरेक उम्मीदवार को  भगवान  सा नजर आता है याने की वोटर देवो भव:

                  वोटर भी सोचता है की कभी तो पूछ परख होती है,चुनावी समर में हम
जेसे वोटर को मान सम्मान मिलता है झूठा  ही सही ..चार दिन की चादनी फिर अँधेरी रात या वोटर मन ही मन सोचता  है  की अब आया ऊँट पहाड़ के नीचे ......सभी उम्मीदवारों को  लाली पाप देता है ..और सभी को वोट देने का  भरोसा देता है राजनीतिक
दल और नेता वोटर का मूड समझने में माहिर हो गये है ..वोटर सेर तो.नेता सवा सेर हो गये है फिर भी वोटर में भगवान की मूरत देख कर एक वोट की मांग करता है उससे
न जाने कितने झूठे वादे करता है ..हर समस्या का समाधान करने का वादा करता है
वोटर को उम्मीदवार  अंदर से कुछ ओर बाहर से कुछ ओर नजर आता है ...वोटर तो उसका अंजाम जानता है ...वोट करना हर वोटर का मौलिक कर्तव्य है देश और समाज हित
में करना चाहिए ...तभी तो वोटर और शक्ति शाली होगा ....तभी  नेता कहेगा ,,,,है वोटर
 तेरी सूरत भगवान से अलग नही होती ...सिर्फ चुनाव तक ..उसके बाद तो हम सब बता देंगे  की कौन भगवान  है और  कौन नही ..सिर्फ चुनाव जीतने तक ही हम .अपने आप को मनुष्य माने हुऐ है वरना हम भी किसी से कम नही  है I....आजकल राइट टू रिजेक्ट वोटर को और  प्रभावशाली बनाएगा .

                   एक वोटर बोलता है ....झंडे ,प्रवचन .माइक का शोर .फ्लेक्स बेनर ,सभाए  वोटरों देवो भव: को खुश ..करने का  महा आयोजन  सभी दल और सभी उम्मीदवार जोर -शोर से करते है ..तभी  तो वोटर देवता प्रसन्न होते है जितना शोर .जितना दिखावा करेगे उतना वोटर खुश होगा यह राजनीति का फंडा है पर आजकल तो  स्टार प्रचारक भी भीड़ जुटाने में असफल  सिद्ध हो रहे है . पर क्या करे
 और दिखावा कैसे करे , आचार सहिंता .का पालन ...जो करना है .आचार सहिंता को भी पीछे छोड़ देने वाले नेता भी अभी  धरा पर विराजमान है जो कुछ नया रास्ता निकालकर  चतुराई से सबको धता बताने  का दमखम रखते है .पर पब्लिक है सब जानती है ......जैसे  को तैसा करना उसे आता है अच्छो -अच्छो को ठिकाने लगा देते है

       
    मैंने एक सीनियर सिटीजन से कहा की वोटर देवो भव तो आप तो बड़े वाले वोटर हो देवो के भी देव है .आपका क्या विचार ..वे बड़े चिन्तन की मुद्रा में कहने लगे ..आजकल
राजनीति में मानवता ही नही बची दानव  जैसी हो गई  है ..हमे अच्छे इन्सान ही रहने दो
देव बनकर जो हम यह नही देख सकते कम से कम मनुष्य बनकर  सह सकते है पर
सत्याग्रह  के गाने ने हम सब की नींद खोलदी है  की .है इश्वर ,,,इतनी शक्ति मत देना की सहते-सहते जाय .....मतलब सहने की हद भी पार हो चुकी है ..किसे चुने सभी एक ही
  थैली के चट्टे -बट्टे है वोटर देवो भव को सिरे से ख़ारिज कर रहे थे खूब मतदान करो
पर अपना मत -भ्रष्ट ,दागी .....को मत -दान करो क्योकि जो आपके सामने है उसमे से
सर्व श्रेष्ट चयन करो ...I सीनियर सिटीजन का कितने ही छोटे बड़े  चुनाव का कटु अनुभव रहा है ..और उनकी बातो से सहमत होकर वोटर देवो भव: का भ्रम दिमाग से निकल दिया I

  वोटर का एक -एक वोट कीमती होता है ...पर चार दिन   की चांदनी और फिर अँधेरी रात ......यह एसी रात होती है की ...सुबह होने मे पांच साल लगते है ..ऐसे में वोटर देवो भव:
कैसे  कह सकते है I वोटर सबकी सुनता है ..करता अपने मन की ....आजकल मतदान
भी   मशीन  से  होने लगा है मोहर की जगह बटन दबने लगा, हवा चलेगी अफवाहे फैलेंगी  फिर भी वोटर अपने आत्म चिन्तन और आत्म प्रेरणा से ही वोट
करेगा .आखिर उसका हक है अपने हक का सही उपयोग ही असली वोटर की पहचान है


संजय जोशी 'सजग "

मंगलवार, 12 नवंबर 2013

सजग-शूलिका

सजग-शूलिका

इतिहास
भूगोल के
बदलने की
बहुत हो
चुकी बहस
वर्तमान और
भविष्य की
बात करो
उसे न करो
तहस -नहस

---- संजय जोशी 'सजग "

गुरुवार, 7 नवंबर 2013

बागी और दागी



                          बागी और दागी


   बागी और दागी राजनीति की शब्दावली में महत्वपूर्ण शब्द है दोनों ने राजनीति को अभिशप्त कर रखा है यूँ तो दोनों शब्द बहुत छोटे है पर बड़े खोटे है राजनीति को दागी से मुक्त करना नामुमकिन लगता था पर  जागृति आई और दागियो वाले  अध्यादेश पर भूचाल आया था  तब, सबने अपनी -अपनी रोटियां सेकी..कुछ की जली कुछ की कच्ची रही सबने खाई ..कुछ को हजम हुई और कुछ को अजीर्ण हुआ ये तो वो ही जाने ..दृश्य मिडिया ने खूब झिलाया और पकाया ,तिल का ताड बनया .....इससे लगता है की दागियो से मुक्त होने का समय आ गया पर इतने दागी है कि ...क्या इससे मुक्ति सही अर्थो में सम्भव है ...? राजनीति का चेहरा धवल होगा ?ऐसे कई प्रश्न है जिनका उतर मिलेगा या नही .संदिग्ध लगता है ...पर ठीक है देर से सही पर दुरूस्त हो ...Iबागी भी एक बहुत बड़ी राजनितिक समस्या है जिसने अपने पैर मजबूती से जमा लिए है ..बागी होना नैतिक अधिकार है  इससे कौन  रोक सकता है ...दागी जैसी  जागृति ....बागी तक आने में २१ वी सदी भी बीत जाये ...तो आश्चर्य नही होगा .......I


                  बागी हर दल और हर उम्मीदवार के लिए खतरे की घंटी बन जाता है और उसका खौफ अंतिम दिन तक राजनीति  में मंडराता  रहता है अपने दल से बगावत कर बागी होना याने  न घर का न घाट का रहना है .फिर भी बागी ..बनते है यह उनके लिए जरूरी  भी है या  समर्थक भी बागी बनने को मजबूर कर देते है और .चने के झाड पर चढ़ाने वाले समाज में बहुतायत  पाये जाते येवो ही लोग होते है जो  एक बार चढाने.के बाद .गिरने  का .मजा  लेते है .यह उनकी आदत  में  शुमार है ..I....

एक बागी लाल जी से आमना सामना हो गया मैंने कहा की आपने क्यों बगावत कर दी ..आपका नाम  .पद और रुतबा भी बहुत था ..अचानक ..मोह भंग क्यों हो गया ...वह द्रवित होकर बोले .पूरी जिन्दगी खपा दी ....मेने पार्टी के लिए क्या नही किया सब धरारह गया ..सारे अरमानो पर पानी फेर दिया ..अब हमारे दल में अच्छे और समर्पित लोगो केलिए कोई सोचने वाला बचा ही नही , किसने क्या किया .किसकी छवि केसी है
पार्टी ..के  लिए सीट बाँटने वालो को क्या मालूम ,भाई भतीजावाद .ही ..चलता रहेगा तो बगावत का सिलसिला यूँही चलता रहेगा ...अब मेरे सब्र की सीमा नही बची और "सत्याग्रह "पिक्चर के गाने को आदर्श मानते हुए ...सहते -जाओ -सहते जाओ ..इतना भी धीरज मत देना   भगवान और यह ...कदम उठाकर ..पार्टी के उम्मीदवार के विरुद्ध पर्चा भरा और ताकि हम ..हमारी ..ताकत का अहसास करा सके .हम भी किसी से कम नही ....सामने वाले में दम नही ....हमारे बचपन का भूत जाग गया ....जब छोटे थे ...खेलते समय अक्सर हम एक दूसरे को बोला करते थे की ..खेलेगें नही तो खेल बिगाड़ेगे..वोही दिन अब देखना  पड़ रहे है आत्म विश्वास के साथ उनकी बात निरंतर जारी थी  , हम   ही  जीतने वाले है ..देखो कैसे पसीना लाते है जनता की नब्ज तो मैं जानता हूँ क्योकि जमीन से जुड़ा हूँ मैंने कहा भाई आजकल ..तो हवा में उड़ने वालो का जमाना है .मेरी बात काटते बोले मेरे केस में उल्टा  होगा .जमीनी..हकीकत जानने में उन्हें छटी का दूध याद आ जायेगा .जनता और कार्यकर्ता  में पकड़  तो मेरी है .अभी तक पार्टी में था अब नही हूँ...सब मेरे साथ है .मेने कहा दादा लोग पार्टी का साथ देते है व्यक्तिगत  का नही तेष में आकर कहने लगे ..मेरे साथ जो धोखा करेगे एक -एक से निपट लूगाँ...मेने मन ही मन सोचा बहुत मुगालते में है क्या करे मुगालते में रहना हर मनुष्य की छुपी हुई ताकत है इसी के सहारे ..अपने सपने बुनता है .जेसे सोने की खोज की लिए  सपने देखे कोई ओर और उसे पूरा करने की लिए उकसाने वालो की कमी नही है ...सपने .लालसा ..अहम आत्मस्वाभिमान ,बदले की भावना ...ऐसे कई कारक है बागी बनाने के लिए जब तक समाज और व्यक्ति में ये गुण मौजूद रहेगे ..भगवान भी ...बागी होने से  नही रोक सकते तो  बेचारी..पार्टी .की  क्या ताकत हर चुनाव में ऐसा होता है ..ऐसा हो रहा है और होता रहेगा .बागी .एक ऐसा समझदार किन्तु खूंखार  जन्तु है जो दीमक की तरह काम करता है .लोकतंत्र और  राजनीति दोनों कोही खोखला करता है यह ऊँचे आदर्श और आत्म सम्मान का पक्ष धर होता है .यह गिरगिट की तरह ..रंग बदलने में माहिर होता है I

                   बागी ....किसी भी पार्टी का बाग़ उजाड़ने की क्षमता से परिपूर्ण होता
हर दल में एसा ही दलदल ...बागी ही बाग़ लगाने वाला भी होता है .उस बाग़ को सीचता  है उसकी सुरक्षा करता है ...जब फल लगने का समय आता है ..तो उसे फल नही मिलता ...उसी प्रकार राजनीति में बागी ....एक समस्या नही ..पर दबी आवाज को मुखर करने की कोशिश और बगावत .उसके लिए बागी का  सेहरा  बाँध देती है समय करवट लेता है ..बागियों की संख्या में इजाफा हो  रहा है अगर बागी ..अपना दल बनाये तो बागी  पार्टी ..[अ]...[आ.]...[.ई.]...तो भी ..कम पड़ेगी .बागी की संख्या में निरंतर वृद्धि बड़ते असंतोष के ग्राफ़ को रेखाकित करता है राजनीति में यह गम्भीर घाव बन गया है  I.
.

  बागी होना राजनीतिक महत्वकांक्षा को दर्शाता है बागी के तेवर धीरे-धीरे ..बोगी होने लगते है फिरभी घर का भेदु लंका ढहाने की क्षमता रखता है  मतलब आने पर .."गरल सुधा रिपु करही मीताई"याने रजनीति में दो विरोधी स्वभाव वालो का मिलन भी हो जाता है और बागी क भूत  का डर चुनाव के परिणाम तक पीछा नही छोड़ता.एक बागी एक राजनीतक समस्या है जिसका समाधान .कठिन है .I...

      बागी बनकर कोई अपना प्रभाव बचाता है या खोता है  या अपना अस्तित्व मिटाता है  समय लिखेगा इसकी गाथा ,कथा  और व्यथा   लेकिन .बिन बागी राजनीति  सूनी-सूनी  लगती है I

                  
      बन बागी दिखाता या  खोता अपना प्रभाव ..बचता /मिटता अस्तित्व .....यह तो
समय.लिखेगा  उसकी गाथा ...कथा और व्यथा..I..बिन बागी राजनीति सुनी लगती है I
        
नोट - यह मेरी मोलिक  एवम अप्रकाशित रचना है ...कृपया स्थान  देकर प्रोत्साहित
करे ..आभार और धन्यवाद

संजय जोशी 'सजग "
७८,गुलमोहर कालोनी रतलाम [म.प्र]
   ०९८२७०७९७३७

बुधवार, 30 अक्टूबर 2013

लक्ष्मी माता से विनती



शूलिका ----50

जय हो लक्ष्मी माता
सर्व सुख की हो प्रदाता
हमारी विनती है सुनो
इमानदार को ही चुनो
धन भ्रष्टो के पास जाता
हमे यह समझ नही आता
मेहनतकश को है सताता
कोई उपाय नही है पाता
शरण में आपकी आता .
हमारी भी सुन लो माता


संजय जोशी ""सजग ""

मंगलवार, 29 अक्टूबर 2013

शूलिका ---------

 ----  १---


हर दल करता
करता भ्रष्टाचार
मिटाने का
शिष्टाचार
मिलते ही मोका
भरपूर करता
भ्रष्टाचार ......

----------२-------

कोई नही
दुध का धुला
किसी ने नही
किया देश का भला
पद मिलते ही
सब को है छला
देश की प्रगति
का सूरज यूही ढला

---------३--------
गठबंधन
याने .जुगाड़
कभी भी हो
सकता दोफाड़
है सत्ता की होड़
देश की राजनीति में
आयगा नया मोड़
अब न और भाती
गठबंधन की निति
जनता हो गई बोर
दीखता नही कोई छोर

---------------- ४--------


जाग कर
रुक जाना
ही जागरूकता
का है नमूना
इस लिए देश को
लगते है चुना
वे जिनको
हमने ही चुना


------------५--------


लोकतंत्र
बनाम
जुगाड़ तंत्र
भीड़ तंत्र
भ्रष्ट तन्त्र
___________________________________
---- संजय जोशी "सजग "


७८ गुलमोहर कालोनी  रतलाम [म.प्र.]

मोब.  09827079737