मंगलवार, 7 जुलाई 2015

" दिन" बनाम "डे"[व्यंग्य ]


                    " दिन"  बनाम  "डे
"[व्यंग्य ]

बात -बात में अचानक पत्नी से पूछ लिया अब क्या आयेगा ?.कड़े तेवर के अंदाज में वह बोली जो प्यार दिल से  करते है उनके लिए वेलेन्टाईन डे आने वाला है इस दिन को युवा अपने प्यार का इजहार करते है मैंने कहा जी, हम तो केवल  दिन  ही समझते है क्यों की दिन गिन -गिन कर काटना ही जिन्दगी हो गई है I
             
       दिन और डे....पर हमारी बहस चल  ही रही थी कि  इसी बीच  समाज सेवी वर्मा जी आ टपके और और अपना सामाजिक ज्ञान का पिटारा खोलकर  बहस को 
एक नया मोड़ दे दिया और कहने लगे आजकल हर  तारीख एक स्पेशल डे
होती है दिन और तिथि का  भान किसे रहता है वह तो केवल पंडित,पुजारी व
ज्योतिषी की मोनोपॉली  हो गई है उन्होंने ही  इसे बचाए रखा है वरना आजकल 
डे का चलन जोरों पर है I

               वर्माजी व्यथित होकर कहने लगे कि पश्चिमी  सभ्यता की उपासना  और रंग में इतने रंगीन हो गये हैं कि   हमारी संस्कृति व  परम्परा रंगहीन नजर आने लगी है बसंत पंचमी का प्रेमोत्सव छोड़ कर वेलेन्टाईन डे मनाने को  इस कदर लालायित है शब्दों में  बखान करना नामुमकिन है और इनको हवा देने में तथाकथित  सोशल मीडिया मुख्य भूमिका निभा कर एंटी सोशल बन गये है 

              वर्मा उवाच निरंतर जारी था किसी ने  सही कहा है पश्चिम में ढला तो अस्त हो गया उसी तर्ज पर हमारी युवा पीढ़ी पश्चिम में  ढलने की अधकचरी मानसिकता लिए आतुर है हमारी आदत  रही है जिस  डाल पर बैठो वहीं  काटो ,एसा ही हश्र हो रहा है कहते है दूर के ढोल सुहावने लगते है  और हर चीज इम्पोर्टेड ही अच्छी लगती है I
   
   अब देखो भाई वेलेन्टाईन डे की शुरुआत सात दिन पहले हो जाती है और बाद में सात दिन तक चलती है हम तो हमारा  विरोध केवल एक ही दिन प्रकट कर अपने कर्तव्य की इतिश्री कर लेते है पेपर और न्यूज़ चैनल की खबर बन जाती है ओर जनता में यह संदेश चला जाता है की इसे नापसंद करने वाले भी  बहुत है ,हम करें  तो क्या करें  लुका छिपी के इस  वेलेन्टाईन डे  को पूर्णतया कैसे रोके समझ ही नहीं  आता ,प्रेम की  अपार शक्ति भारी पड़  जाती है रोके नही रुकता प्रेम के वशीभूत होकर तो डाई,विग और नकली बत्तीसी वाले भी अपने आप को रोक नहीं  पाते  फिर युवा तो युवा  ही ठहरे  जैसे तैसे यह डे मना ही लेते है दिल है कि  मानता ही नहीं  ,प्रेम तो असीम  होता है उसकी कोई पराकाष्ठा  नहीं  होती I कबीर दास  ने जी लिखा है  -
                      "प्रेम न बाड़ी उपजी ,प्रेम न हाट बिकाय ,
                         राजा, परजा जेंहि रुचे सीस देई ले जाय I
प्रेम का उदय तो मनुष्य के दिल और दिमाग में होता  है और उसका सौदागर कोई भी  हो भले ही वह राजा हो ,प्रजा हो  शाह हो या तानाशाह या फकीर हो Iऔर चोरी छिपे अपना प्रेम इज़हार  करने में कोई पीछे नहीं  रहना चाहता. कभी -कभी बासी कड़ी में भी उबाल आ जाता है तो युवा पीढ़ी  का क्या दोष ......?प्रेम एक अजूबा है उसमें  कोई नियम नहीं  होता है I

        वर्तमान  की दुनिया में जहाँ चारों  और घृणा और हिंसा की बयार चल रही है 
ऐसे में ये डे कम से कम प्यार के बारे में  कुछ तो माहौल बना देता है और युवा जवाँ दिल जब मर्यादा व सीमा तोडकर प्यार के उत्सव को शक के दायरे में लाकर 
अभिशप्त कर देते है तो हम जैसे सामाजिक लोगों  का प्रयास रहता है कि ऐसे डे मनाने 
से तो  अपने दिन ही अच्छे  जो हमारी संस्कृति की जड़े और मजबूत करते है कितना भद्दा  लगता है जब प्यार इजहार करना भी हम पश्चिम से सीखेंगे, सोचने को मजबूर हो जाते है कि  हम क्या से क्या हो गये दिन को भूलकर डे मनाने में  व्यस्त और मस्त हो गये,हमने शांत चित्त से उनका दिन बनाम डे पर प्रभावी विचार के लिए आभार व्यक्त किया और उन्हें वचन दिया की हम दिन ही मनाएंगे  तब कहीं  जाकर  उनके प्रवचन पर विराम  लगा  I

उदघाटन की शिला [व्यंग्य ]

  उदघाटन की शिला [व्यंग्य ] 
                      हमारे शहर में बांकेलाल जी नाम के जागरूक इंसान है  वह भी 
बुद्धिजीवियों  की बीमारी से ग्रसित है जो जागरूक होने के बावजूद  जाग कर रुक जाते है और व्यथित होते  रहना तो उनकी आदत में शुमार हो गया है  उनके सम्पर्क में  आने वाला भी इससे  अछूता कैसे रह सकता है ?आजकल वे  शीलालेख  के दुःख से दुखी है यह वो शिला  है जिसका उपयोग भूमिपूजन और उदघाटन के समय किया जाता है और बाद में उसे ऐसे भूल जाते है कि  जैसे उससे कोई वास्ता ही नहीं  हो l उनका कहना है हमारे देश में लाखों  ऐसी शिलायें  अपनी दुःख भरी गाथा के लिए मौन  होकर भी बहुत कुछ  कह जाती है उनकी व्यथा का  अहसास कर  शब्दों में यूं  बताते है , जो इस प्रकार है ---
             पत्थर  को साइज़ में काटकर उस पर   लेखन के  बाद मुझे दीवार पर चुनकर सजाया जाता हैं उदघाटन तक पर्दा ढंककर न जाने पवित्र या अपवित्र  हाथों  से  पूजन अर्चन कर तालियों की गड़गड़ाहट के साथ फोटो और वीडियो बनाये जाते है समाचार  पत्र व चैनल्स में एक झलक  दिखाया जाता हूँ उस के बाद से लोगों  की आँख की किरकिरी बन जाता हूं पक्षियों   के बीट और  और कुत्तों   के द्वारा  यदाकदा गीला कर दिया जाता हूँ और बच्चे क्रिकेट खेलते समय स्टम्प का काम भी ले लेते है ,बॉल की मार भी खाना मेरी  ही मजबूरी हो जाती है l 
                     जिस उद्देश्य के लिए में खड़ा हूँ  वह तो पूरा होने में संशय ही रहता है और मुझे स्थापित  करने के प्रथम चरण  से ही भ्रष्टाचार  का आगाज हो जाता है 
और काम शुरू ही नहीं  हो पाता और अगर चांस मिल भी जाता है तब तक तो मेरी हालत इतनी खराब हो जाती है की   मुझे निकाल कर फेंक फिर नया लगा दिया जाता है कई बार तो सरकार के बदलने से मेरा भी बदलाव हो जाता है और कुछ नेताओं  का 
तो यह एक  शौक भी है कि जितने ज्यादा शीलालेख उतना ही विकास का फंडा I इसे ध्यान  में रख कर आये दिन यह काम करना और बाद में फंड का रोना रोकर मुझे उपेक्षा का शिकार बना दिया जाता है और मैं अपनी इस हालत पर आंसू बहाता रहता हूँ आजादी के बाद से  यह निरंतर जारी है यह  कहानी सिर्फ मेरी ही नहीं  मेरे जैसे अभागे पूरे देश में जहां -तहाँ मिल जायेंगे  तो कुछ को फालतू समझ कर उखाड़ फेंक दिया गया होगा या उखड़ने का इंतजार कर रहे होंगे l 
                            शिलालेख की दुःख भरी गाथा  दल-दल की राजनीति  का परिणाम है शिलालेख पर नाम  तो बदल जाते है पर  उद्देश्य धरा का धरा  रह जाता है और काम नहीं  नाम बदलने की परम्परा का निर्वाह चलता रहता है फिर 
एक यक्ष प्रश्न --नाम बड़ा या काम तो उत्तर तो यहीं  मिलता है कि नाम की ही तो सब 
जद्दोजहद है काम तो चींटी की चाल से  पूरे होते रहेंगे , कौन करें इसकी चिंता I 

 
                     

अथ मोबाइलम् कथा [vyangy]

  अथ मोबाइलम्  कथा  [vyangy]

            आज सबेरे -सबेरे  बांकेलाल जी से आमना सामना  हुआ  उनके चेहरे पर चिंता की लकीरें  होने का आभास हो रहा था मैंने पूछा किस चिंता में दुखी हो? तो वे कहने लगे इस मोबाइल ने तो जीना हराम कर दिया लोग बाग  इस कदर इसके दीवाने हो गये  कि  लगता है सम्पट ही भूल गए ,विचलित होकर कहने लगे आज ही एक समाचार पड़ा की एक लड़की वाट्सएप देखते -देखते गड्डे में गिर गई l इसके कारण 
अच्छे भले लोग भी  अंधे और बहरे  सा व्यवहार करने  लगे है l ये जीवन का अभिन्न 
अंग हो गया है चलते फिरते ,उठते -बैठते ,सोते जागते सब जगह इसकी घुसपैठ  है इसकी माया इतनी निराली है कि  लोगबाग मिस काल  देकर अपनी जवाबदारी से मुक्त हो जाते है और  रहते कहां  है, बताते कहां  है?ये  उल्लू बनाविंग का मुख्य साधन हो गया है l
   वे आगे कहने लगे कि इसके मायाजाल ने भ्रमजाल का चोला पहना दिया है और जीवन को एकाकी बना दिया है  हर कोई मोबाईल में मगन रहने लगा है की- पेड और टच के सहारे बार - बार अपनी आँखे उसी में गड़ाए रहता है और अपनी गर्दन और आँखे हमेशा झुकाये रहता है इयर फोन कान में लगा देखकर सचमुच में बहरे आदमी का सीन सामने आ जाता  है l नेट की सुविधा होने के कारण सामान्य सी  चीज के लिए भी गूगल सर्च शुरू कर देता है सभी समस्या का हल गूगल के भरोसे करने वालों की जमात दिन प्रतिदिन बढ़ती जा रही है मतलब की स्मार्ट फोन की तरह सब लोग भी स्मार्ट होते जा रहे है और कुछ तो ओवर स्मार्ट  हो कर अश्लील मैसेज का गंदा खेल तक  खेल जाते है l

  आगे कहने लगे नए माल खरीदने से लेकर बेचने तक सब काम इससे ही होने लगे है lभविष्य दर्शन ,समाचार ,नेट बैंकिंग  ,टिकिट  बुकिंग और भी  न जाने क्या  -क्या होने लगा है और निरंतर इस पर आश्रित होने की खोज जारी है यह  हमारे जीवन पर इस कदर हावी है कि इसके  बिना पल-पल मुश्किल लगता है एक क्या अब  तो दो-दो  मोबाईल  रखने का जमाना चल रहा है l

     उनकी  मोबाइल  कथा  का वाचन  निरंतर  जारी था  वे कहने मोबाइल  के बिना जिंदगी में अधूरापन सा लगता  हैइस कलमुँहे मोबाइल ने  चिट्ठी  ,पत्री और शुभकामना संदेश को इतिहास की ओर धकेल दिया है वहीं प्रेमी -प्रेमिकाओं  की  तो चांदी हो गई जब चाहे तब इश्क लड़ाओं  क्योंकि पल-पल साथ निभाता हैं  ये मोबाईल l 
पहले  एक मैसेज भेजने में कितनी मशक्क़त  होती थी वह तो पुरानी प्रेम कहानी वाला ही बया कर सकता है और आजकल छोटे से बड़े त्यौहारों  पर मैसेज की बहार आ जाती है और अपने मोबाईल से दूसरे मोबाईल में मैसेज फार्वड करे बिना दिल है की मानता नहीं और उसके  बाद एक सुखद अनुभूति होती है l आजकल मैसेज फॉर्वड करने से भगवान को प्रसन्न करने का प्रयोजन भी इसी से होता है इतने लोगों  को भेजो फिर देखो चमत्कार,  चमत्कार तो होता हैं पर बेलेंस कम होने का ,कुछ तो इस भेड़ चाल में चलकर दूसरों  को चलने को मजबूर कर देते है भावनात्मक ब्लेकमेल कर l

             मैंने कहा अब इस कथा को समाप्त करने की मेहरबानी करेंगे तो कहने लगे 
कि  हे  मोबाइल तुझ में सब कुछ समाया  है फिर भी कुछ भक्त ,मिस कॉल ,कवरेज 
समस्या ,अनचाहे मैसेज और लम्बी -लम्बी बातें  करने की पीड़ा भोग कर ,तनाव और 
अनिद्रा की ओर  निरंतर अग्रसर है l यह कई मानसिक और शारीरिक परेशानियों का प्रदाता बन रहा है पर तेरे  बिना गुजारा भी नहीं l

कतार का कहर [व्यंग्य ]

  कतार का कहर [व्यंग्य ]
                 कतार एक गंभीर समस्या है जिधर देखो उधर कतार का ही बोल-बाला है इसका पालन तो केवल ईमानदार ही करते है रंगदारी करने वाले इसे समय की बर्बादी बताते है और इससे बचते रहते है ये अपना काम निकालने के लिए अपने रुतबें  ,पहचान के सहारे येन -केन -प्रकारेण काम निकल ही लेते है l कतार में लगने वाला टुकुर -टुकुर देख अपनी बारी का इंतजार करता रहता है और मन ही मन अपने आप को कोसता रहता है क़ि कतार हमारे लिए ही है क्या ?कतार के कारण अपनी दिनचर्या के तार -तार होने का मातम मनाता रहता है और बिना कतार के काम कराने वाला उनके सामने इठलाता रहता है l 
                             कतार की कहर  से व्याकुल होकर बांकेलाल जी  दुःखी  होकर कहने लगे कि  इस कतार ने नींद उड़ा रखी है हम जैसे कुंवारों के लिए और भी मुश्किल है अगर बायचांस लेडिस की लाइन कम होतो भी हमारे लिए किस काम की हमें तो लगना ही पड़ेगा l पर आजकल उनकी लाइन लम्बी रहने लगी है पुरुष वर्ग अब कतार से बचने लगा है लेडिस के सहारे ही कतार से मुक्ति पाने की युक्ति खोज ली है l कतार एक समस्या बन गई है l वे कहने लगे धार्मिक स्थलों पर भी लम्बी -लम्बी कतारें  ,उनके लिए जो सिद्धांत  का पालन करते है घंटो प्रतीक्षा के बाद दर्शन लाभ ले पाते है l आजकल धनशाली व बलशाली ,के लिए विशेष प्रकार का द्वार जिसे वीआईपी द्वार कहा जाता है लगता है जैसे इन के लिए ही  खोज की गई हो वे उसे शान से उपयोग कर अपने धर्म कर्म को  शीघ्रता से निपटा लेते है उनके पास समय नहीं  है बाकि तो सभी फुर्सती  है l 
          वे आगे कहने लगे एक फिल्म का डायलाग हमेशा खटकता है  जहां से हम लाइन  में लगते है वहीं से लाइन शुरू होती है। इस को पालन  करने वाले इस देश में हर कहीं  पाये जाते है शासन -प्रशासन भी इनका ही  पूर्णतया सहयोगी होता है और अपने आप को धन्य मानता है कि  हमने अपनी ड्यटी बड़ी मुस्तैदी से निभाई l

       आगे कहने लगे कि  कुछ मुख्य  है जैसे   कई  बार कतार में  लगकर जांच कराओ फिर  इलाज के लिए और फिर कतार ,l चुनाव  के समय  बड़े नेताओ और पार्टी कार्यालयों  पर लम्बी कतार  रोजगार कार्यालय में  बेरोजगारों की  लम्बी कतार ,  लोन की कतार में दिवालिये ,थियेटर  में टिकट के लिए दीवानों  की   कतार , रेस्टोरंट में खाने के लिए कतार,, रेल टिकट खरीदने में कतार,  आर.टी.ओ में कतार, पासपोर्ट में कतार, बैंक-पोस्ट-ऑफिस में कतार, नौकरी के इंटरव्यू में कतार, लाइट बिल, टेलीफोन बिल, बीमा आफिस  में  किश्त भरने में कतार, गेस टंकी  के लिए फ़ोन करो, हमेशां लाइन बिजी , नो रिप्लाय. या आप क्यू  में है .. दैनिक जीवन पर कतार का  इतना कहर है  हम  सब पर भारी  है , हर जगह  कतार ही कतार ,इस कतार ने तो जीना  दुश्वार कर दिया है l हमारे  दैनिक जीवन कामों में गड़बड़ी इसी की देन  है और इसने लोगों को   तनाव का पुतला बनाकर रख दिया है जो रोज -रोज जलता है इसके कहर से l इससे मुक्ति सम्भव नहीं  लगती इस 
  जन्म में  तो l 
                मैंने कहा  बांकेलाल जी आपने वो  गाना सुना  जिसके बोल है --लाइन में रहना रे बाबा  लाइन में ,आज  सच साबित हो रहा है l जो बे-लाइन है वे भी लाइन में रहने को मजबूर हो जाते है l दिन प्रतिदिन यह कहर  बढ़ते जाना है और हमे सहते जाना है l कतार ही जीवन है कहते जाना है l

शादी और गणित [व्यंग्य ]

     शादी और  गणित [व्यंग्य ]
                  सीजन प्रधान देश में शादियों का सीजन चल रहा है शादियां   अब कहां  रही सादी, पुराने लोग कहते थे बर्बादी ,सही  आज यह बात सच साबित हो रही है शादी में अंक शास्त्र  की  घुसपैठ पत्रिका गुण मिलान से ही हो जाती है  और फिर  सात फेरे से मजबूत होता है  गठ बंधन l बांकेलाल जी कहने लगे कि   व्यंजनों की संख्या के अंक शास्त्र की होड़ ने अन्न की बर्बादी को चरम पर पहुंचा  दिया है , स्टेट्स दिखाने के लिए  शादी में व्यंजन आकड़ा १००   से १५० तक पार होने  लगा है इतने आयटम रखने लग गए  है कि  एक  एक लेकर केवल टेस्ट करूं   उसमें  ही पेट भर जाए बाकी बचा हुआ तो फेंकना ही  है ना l  कहा  जाता है जूठन  एक राष्ट्रीय समस्या है और अन्न की बर्बादी भी है एक और कितने ही लोग भूखे सोते है और सामजिक हैसियत दिखाने के चक्कर  में यह सब हो रहा है और ये सब वो ही करते है जो अपने आप को समाज सेवक कहते नही थकते l बड़े -बड़े सामूहिक  विवाह के आयोजन करके   ,मितव्ययिता का ढोल पीटते है और अपने घर की शादी में इतना मितव्यय करते  है कि  जिसकी कोई सीमा नहीं  l समाज सेवा और दिखावा  कर दोहरी जवाबदारी को ढोते है और समाज में अपनी धाक जमाते है l 
                       बांकेलाल जी कहने लगे की देखा देखी   की भक्ति में जिनकी 
हैसियत नहीं होती वह भी बढ़चढ़ कर व्यंजन की संख्या में शतक लगाने की कोशिश करते हैं  और सारी उर्जा उसी में लगा देते है मेरे परिवार में भी एक शादी होने वाली है उसी जद्दोजहद में दिमांग खराब चल रहा है सब को खुश  करने के चक्कर में आयटम की गिनती बढ़ती ही जा रही है जिसमे पुरानी पीढ़ी ,युवा पीढ़ी और बच्चे सब की अपनी -अपनी फरमाइश है कि  यह होना जरूरी है उन अंकल के यहां भी तो था ऐसा ही होना चाहिए ,सब को संतुष्ट करने में बजट असन्तुष्ट  हो रहा है और  निमंत्रण की लिस्ट रोज बढ़ती जा रही है समझ  ही नहीं  आ रहा है कि  इस महंगे युग में सब कैसे मैनेज किया जायें काला धन आ जाता तो बहुत राहत मिलती पर कुछ आसार ही नहीं  दिख रहे है सपने दिखाने वाले बाबा और नेता रोज यू - टर्न ले रहे है और विपक्ष इस यू -टर्न को भुनाने में लगा है l पर मैं  तो परिवार के  दबाव के बोझ तले यू टर्न भी नहीं  ले पा  रहा हूँ क्या  करुं ?
                             व्यंजनों  की संख्या और आमंत्रित लोगों का  अंक गणित मेरे तो 
ऊपर  से ही जा रहा है , दोनों की संख्या  कम  करने की बात पर  मुझे व्यवहारिक गणित में हमेशा की तरह  शून्य  मिलता नजर आ रहा है  कोई  भी अपने अंक को छोटा करने को तैयार ही नहीं   है मुझे ही अपना गणित बढ़ाकर बड़ी संख्या से लोहा लेना पड़ेगा ? इसमें गणित में  फेल होना प्रतिष्ठा को चारों  कोने चित्त कर देता है और शादी के बाद भी अलग ही गुणा  भाग चलता  ही रहता है l 

इंतजार का मजा [व्यंग्य ]

इंतजार का मजा [व्यंग्य ]
        एक पुरानी कहावत है कि  जो मजा इंतजार में हैं  वह मिलने में कहां ?यह शाश्वत सत्य है हम इंतजार  में  मजा लेने की मानसिकता से परिपूर्ण है क्योंकि म जानते है इंतजार ही  हमारी भावना को सबंल देने को पर्याप्त लगता है और इस नब्ज को हमारे कथित समाज सेवी नेता  अच्छी तरह समझते है और सपने दिखा -दिखाकर जन -जन को इंतजार का मजा लेने को छोड़ देते है l हमारे शहर में बांकेलाल नाम के  दो पाये वाले  एक प्राणी है उनका कहना है कि  इंतजार की घड़िया समाप्त ही नहीं  होती है  नेतागण नये ख्वाब दिखा कर अपना समय काट लेते है और हम पांच साल का इंतजार करते रहते है ये सोचकर  कि अबकी बार इंतजार का मजा चखा देंगे सफल भी होते है पर फिर हमे इंतजार ही सहना पड़ता है आजादी से आज तक हम इंतजार करते -करते कब्र में पाँव लटकाये बैठे है अब मौत  का इंतजार  है l 
                           बांके लाल जी की इंतजार वाली बात मुझे दमदार लग  रही थी सही है जो मजा इंतजार में वह मिलने में कहां?बांकेलाल जी आगे कहने लगे कि  अच्छे दिन का इंतजार है काला  धन वापस आएगा सबके खाते में  जितना जीवन में नहीं  कमाया  रूपया आएगा ,बुलेट ट्रेन चलेगी ,स्मार्ट सिटी बनेगी एक सासंद एक गांव गोद लेगा ,धारा  ३७० की पहेली  बुझेगी ,लोकपाल आयेगा ,हिंदी  का  मान बढ़ेगा  ,सफाई अभियान से देश की सफाई होगी , गंगा भी निर्मल होगी और न जाने क्या क्या होगा सबका बेसब्री से  इंतजार है l जीते जी देख लूँ  नहीं  तो स्वर्ग या नरक में जहां भी जाऊंगा  वहां भी इन्जार करते हुए मेरी आत्मा यूँ  ही नहीं भटकती रहे इन सबके इंतजार में l है ईश्वर जल्दी मेरे इंतजार को खत्म कर दो ताकि में आराम से मर सकूँ और मुक्ति पा सकूँ l 
             मैंने  कहा बांकेलाल जी आपने कितनी लम्बी सोच रखी है  वर्तमान में जियो जो हो रहा है वह अच्छा है और जो भी होगा अच्छा होगा ,वे इस बात पर तिलमिला उठे और और बोले आप जैसों  की सोच ने ही देश को इस गर्त में धकेला अरे भाई इंतजार की भी सीमा होती है सब अपना भला करते है आप और हम तो वहीं   के वहीं  ,आपकी संपत्ति  बढ़ने की ग्रोथ कितनी कम है और  उनकी जो हमे इंतजार करने का पाठ  पढ़ाते  है उनकी  सम्पत्ति  दिन दूनी और रात चौगुनी बढ़ती है l 
                     मैंने  कहा कि   इस ला -इलाज बीमारी का कोई इलाज नहीं  है झूठ  और फरेब फल फूल रहा है ईमान आंसू बहा  रहा है और बे-ईमान इठला रहा है और हम सब झेल कर दुखी होकर बस  बात ही कर सकते है ,कई बीमारियों  को आमंत्रण देकर उसी में उलझकर  रह जाते है और जीवन चक्र इंतजार की घड़िया गिनते गिनते समाप्त हो जाता है l 
               अंत में बांकेलाल जी कहने लगे सब एक ही थैली के चट्टे -बट्टे है कोई सांप नाथ तो कोई  नागनाथ l दूर के ढोल सुहावने लगते है लच्छेदार बात में हम सब कुछ  खो देते है और स्वप्न लोक में विचरण करने लगते है और फिर वही 
इंतजार।बचपन से उम्र के  अंतिम पड़ाव तक हर कदम ,हर पल बस  कुछ न कुछ इंतजार ही तो है तो लीजिये  इंतजार का  मजा l 

शो ऑफ का जमाना है ..........[व्यंग्य ]

शो ऑफ का जमाना है ..........[व्यंग्य ]


       हमारा देश अभियानों से चलता है अभियान सक्रियता का अहसास दिलाते है कि  देश में इनके माध्यम से कुछ अच्छा कर गुजरने की लालसा प्रकट होती है पर विडंबना यह है कि सब शो ऑफ की चमक में अपने  मूल उद्देश्य से कोसों  दूर हो जाते है और शो ऑफ बनाम शो गेम बन कर मीडिया का भोजन बन जाते है और इन अभियानों के लाइव दर्शनों को को इतना दिखाया और झिलाया जाता है कि  अभियान की मूल भावना उपेक्षा की शिकार हो जाती  है और शो ऑफ सबसे ऊपर आ जाता है l
                               सुबह-सुबह मेरे घर की कॉल बेल बजी मैंने दरवाजा  खोला तो सामने एक समाज सेवी कम नेता अधिक जो कॉलोनी में रहते है व मित्र भी है अपने  बेग में से  निकालकर दो तीन तरह की  ड्रेस दिखाते हुए बोले मैं  और मेरी घरवाली ड्रेस तय नहीं कर पा रहे है  तो हेल्प कीजिये प्लीज l मैंने कहा यह तो निजी मामला है वे बोले नहीं  इक अभियान में जाना है इस लिए तो समस्या है ,फोटो और वीडियो क्लिप में  कुछ  अलग दिखना चाहिए ताकि  अपने चाहने वाले अलग से पहचान लें  l मैंने उन्हें कहा कि आपको क्या कमी है ?हर अभियान के लिए नई ड्रेस बनवा लिया करें  ,वे बोले  कितनी बनवाये देश में सब काम अभियान के तहत ही होते है  कुछ -न कुछ रोज ही चलता रहता है , मैंने  पूछा कि अभियान महत्वपूर्ण है या ड्रेस वे बोले अभियान तो लोग बाग़ चलाते रहेंगे  ,सब काम हम ही कर लेंगे  तो जनता को कन्फ्यूज करने का महाअभियान कौन करेगा ?, और ये फोटो शोटो ,वीडियो क्लिप हमारी तरक्की में योगदान देते है यह नहीं  हो तो हम क्या दिखाए ,जब सीट मांगने जाए हम भी जनता से जुड़े हुए है ,मैंने कहा  सही है यह सब ही तो सीमेंट  गारे  का काम करती है 
जोड़ने के लिए l जितना शो ऑफ  करेंगे उतना ही तो हम ऊपर जाने  जायेंगे।मैंने कहा कि  मुझसे पूछने आये और संम्मान दिया उसके लिए मैं  आपको ब्लू कलर वाली ड्रेस का सुझाव देता हूँ इसलिए कि  इसमें फोटो अच्छा आएगा l वे अति प्रसन्न होते हुए जाने लगे और कहने लगे कि  अब इसके अनुरूप जूते ,चश्में  का जुगाड़ करना पड़ेगा क्या करें ?  हमारे दल में  ही  शो आॅफ़ करने की प्रतियोगिता  का  माहौल है  यहां जैसे खरबूजे को देख कर खरबूजा  रंग  बदलता है और हर कोई अपने आप को  अनूठा समझता है l जब अच्छे -अच्छों  के फोटो बिगड़ जाते है पर अपन तो इसमें फरफेक्ट हैं  या यूँ कहे कि  हम फोटो छाप है हमारा तो आना ही है l 
          
  उनके जाने बाद मैंने सोचा कि  वाकई शो ऑफ का जमाना है जिसने नहीं  किया 
उसने जीवन में क्या किया ?जिसने नहीं  किये   ये  करम उसके फूटे करम l आजकल 
 शो ऑफ   करना  एक कला है करने वाला  कलाकार है  नहीं  करता ,बेकार है या कलमकार है ,बचपन से पचपन तक शो ऑफ करने  की होड़ मची है l माहौल देख  कर लगता है, चाहे हम कुछ नहीं  करेंगे हम केवल शो ऑफ करेंगे ,शो ऑफ  करेंगे l